संस्करण: 21सितम्बर-2009

 

''जल : अमृत या विष ?''
 

स्वाति शर्मा

तिवृष्टि से बाढ़, अनावृष्टि से सूखा, चक्रवात, भूकंप, भूस्खलन, ज्वालामुखियों के माध्यम से धारती का आग उगलना जैसी प्राकृतिक आपदाएं सदा से जन धन का विनाश करती आई हैं। मनुष्य ने इनसे बचने अथवा इनके प्रभावों को कम करने के लिऐ अनेक उपाय भी ढूंढ निकाले हैं। इसी के साथ विरोधाभास भी है कि मानव ने ही इन प्राकृतिक आपदाओं को बढ़ाया है। आज जंगलों के काटे जाने से अनेक जंगली जीवों की जातियां विलुप्त होने के कगार पर पहुंच गई है और कुछ तो विलुप्त भी हो चुकी हैं। मानवीय गतिविधियों के कारण मौसम भी तेवर बिगाड़ चुका है। बाढ़, सूखा, मरूस्थलों के विस्तार की मार पहले की अपेक्षा कहीं अधिक सहनी पड़ रही है। आज जिस हवा में हम सांस लेते हैं, जिस जल का प्रयोग हम पीने और अन्य कार्यों में करते हैं, जिस धरती पर हम निवास करते हैं और तो और अंतरिक्ष भी अब प्रदूषण की चपेट में आ गए हैं।

लकड़ी, कोयले, पेट्रोल के वाहन से निकली विषैली गैसे कार्बन डाइ ऑक्साइड, कार्बन मोनो ऑक्साइड, नाइट्रोजन के ऑक्साइड आदि से वायु प्रदूषण बढ़ा है। कैंसर सहित अनेक चर्म और श्वासरोग बढ़ रहे हैं। यही गैंसे जब वर्षा जल के संपर्क में आती हैं, तो अम्ल वर्षा के रूप में जीवधारियों के साथ ही साथ कला स्मारकों को भी हानि पहुंचाती है। भारत का ताजमहल इसका जीता जागता उदाहरण हैं। कल-कारखानों, उद्योगों का विषैला कचरा जिसमें अनेक हानिकारक धातुओं के अंश होते हैं, अनुपचारित रूप से नालों के माध्यम से नदियों में प्रवाहित कर दिया जाता है। इसके अलावा खेतों में अधिक फसल उत्पादन के लिए रासायनिक खादों का प्रयोग भी कम हानिकारक नहीं है। अनेक रसायन जो विषैले होते हैं, पानी के साथ मिट्टी और नदियों में पहुंच जाते हैं। इससे भारत की सभी नदियां प्रदूषित हो चुकी हैं। लगभग 80 प्रतिशत रोग दूषित जल के प्रयोग से होते हैं। भूजल के अधिक उपभोग की वजह से जल स्तर लगातार नीचे जा रहा है। पानी का अतुल भंडार सागर भी प्रदूषण से नहीं बच सका है।

पीने के पानी की समस्या विकराल रूप ले चुकी है। पानी की समस्या एक देश की न होकर सारे संसार की है, किंतु भारत जैसे विकासशील देश में पीने के पानी की समस्या कुछ अधिक ही है। भारत के पंजाब से मिली सूचना चौंकाने वाली है। वहां अनेक क्षेत्रों में उद्योग के अनुपचारित कूड़े-कचरे जैसे अपशिष्ट पदार्थों को जल स्रोतों में प्रवाहित करने से जल अत्यंत दूषित होकर घातक रूप से विषैला हो चुका है। कुछ लोगों के डीएनए क्षतिग्रस्त हो गए हैं और इसका कारण उद्योगों से अनुपचारित अपशिष्ट पदार्थों का उनकी जमीन और अंतत: उनके जीवन में प्रविष्ट हो जाना है। अत्यधिक दूषित जल द्वारा खेतों की सिंचाई वाली प्रदूषित मिट्टी के नमूनों की रासायनिक जांच से ज्ञात हुआ है कि क्रोमियम, निकिल और जिंक की सूक्ष्म मात्राएं मिट्टियों में पाई गई हैं। किंतु परिणाम जानलेवा हैं। उद्योगों का अनुपचारित जल संभवत: डीएनए में विरूपता उत्पन्न करके कैंसर और प्रदूषित जन्मजात रोगों की संख्या में वृध्दि कर रहा है।

चिकित्सकों का मत है कि प्रदूषित जल से सिंचित खेत और सब्जियों में प्रदूषण की मात्रा पहुंच जाती है, जिससे लोगों में कैंसर और डीएनए की विकृतियां बढ़ रही है। सतही प्रदूषित जल के कारण भूमिगत जल भी प्रभावित हो रहा है। जलाशयों और जल स्रोतों के प्रदूषण से जल जीव और जलीय वनस्पतियां भी प्रभावित हो रही हैं। भारी धातुओं और रासायनिक उर्वरकों से खेत की मिट्टी की गुणवत्ता भी कम होती जा रही हैं। डीएनए विकृति की एक वजह भारी धातुएं भी हैं। कीटनाशकों के अधिक प्रयोग से मस्तिष्क और तंत्रिका तंत्र पर कुप्रभाव, फसलोत्पादन में गिरावट पाई गई है। शरीर की रोगरोधीं क्षमता भी घट गई है। गोजातीय पशुओं के दूध, फलों और सब्जियों में कीटनाशी रसायनों की मात्रा पाई गई है, इसीलिए प्रदूषित पदार्थों का सेवन अनेक प्रकार के रोगों को जन्म दे रहा है। स्वास्थ्य पर कुप्रभाव पड़ रहा है। कुछ स्थानों पर पीने का पानी नीले रंग का तथा दुर्गंधायुक्त होता है। उबालने पर हल्के हरे रंग का गाढ़ा अपशिष्ट पानी की सतह पर दिखता है। यह पानी पीने लायक नहीं होता। सब्जी, रक्त और मूत्र के नमूनों की जांच से पता चलता है कि भारी धातुएं, आर्सेनिक, क्रोमियम, सेलेनियम और पारा के साथ ही साथ कीटनाशी रसायनों की मात्रा सामान्य मात्रा से कहीं अधिक मात्रा में विद्यमान होते हैं।

हमारे प्राचीन ऋषि-मुनियों के अनुसार जल ही जीवन है, जल अमृत है, किंतु इसी भारत भूमि में लोग गंदा पानी पीने को विवश हैं। आज हमारे देश की लगभग सभी नदियां प्रदूषित हो गई हैं। पीने के पानी की समस्या बद से बदतर होती जा रही है। अब समय आ गया है, जब हमें प्रदूषण की मार से अपनी नदियों की रक्षा करनी होगी। हमारे अस्तित्व का एक महत्वपूर्ण हिस्सा जल है, अत: हमें प्रण लेना होगा कि न तो हम नदियों में अपशिष्ट पदार्थ विसर्जित करेंगे और न ही पानी को बेकार खर्च करेंगे।


 


स्वाति शर्मा