संस्करण: 21सितम्बर-2009

 

मध्यप्रदेश में हानिकारक बीजों की दस्तक

प्रमोद भार्गव

नुवंशिक तकनीक से रुपांतरित बीजों को खुली भूमि में बोकर फसल तैयार करने का विवादास्पद परीक्षण मध्यप्रदेश में भी शुरु हो गया है। यह प्रयोग जबलपुर के राष्ट्रीय बीज विज्ञान अनुसंधान केन्द्र में शुरु हुआ है। अमेरिकी बहुराष्ट्रीय कंपनी मोनसेंटो द्वारा तैयार मक्के के बीज खुले आसमान के नीचे बोये गए हैं। जबकि इस तकनीक से तैयार फसल का मानव शरीर के स्वास्थ्य पर क्या असर पड़ता है, ये परीक्षण नहीं हुए हैं। इसलिए ये प्रयोग खतरनाक साबित हो सकते हैं। हैरत की बात यह है कि मध्यप्रदेश की जो सरकार पूरे प्रदेश में जैविक खेती को सरंक्षण देते हुए बढ़ावा देने की बात कर रही है उसी राज्य में ये प्रयोग पर्यावरण एवं मानव स्वास्थ्य की कोई चिंता किए बिना धाड़ल्ले से किए जा रहे हैं।

दरअसल आनुवंशिक रुपांतरित बीज ऐसे बीजों से तैयार किए जाते हैं जिनमें पैदावार बढ़ाने व पौष्टिकता लाने की दृष्टि से आनुवंशिक गुणों में परिवर्तन लाया जाता है। कीटाणुनाशक व खरपतावाररोधीं बनाने का लक्ष्य भी इन बीजों के निर्माण में निहित होता है। ये बीज अन्य बीजों व जीवों से जीन्स लेकर विभिन्न फसलों व सब्जियों के बीजों में संक्रमित किए जाते हैं। इन बीजों के परिणाम भिन्न भौगोलिक, पारिस्थितिकी व जलवायु में भिन्न होते हैं, इसलिए इनके नतीजे हमेशा ही आशंकित रहने के साथ पारंपरिक खेती के लिए विनाशकारी साबित हुए हैं। इन वजहों से जीएम फसलों के पर्यावरणीय एवं स्वास्थ्य प्रभावों को लेकर पूरी दुनिया में बहस चल रही है। अनेक अध्ययनों में इनका मानव व जीवों पर असर शरीर के विकास, रोग प्रतिरोधात्मक व प्रजनन क्षमता पर नकारात्मक पाया गया है।
जबलपुर में जिस मक्के के बीज को फिलहाल बतौर परीक्षण खेत में बोया गया है, आस्टिया सरकार द्वारा किए गए एक अध्ययन में इसी बीज से उत्पन्न मक्का चूहों को खिलाई गई तो उनके प्रजनन क्षमता पर बेहद नकारात्मक प्रभाव सामने आए हैं। इस लिहाज से मध्यप्रदेश में इन बीजों के खुले में परीक्षण किए जाने से पर्यावरणविद् चिंता जता रहे हैं। खेती विरासत मिशन से जुड़ी कविता कुरुंगति का कहना है कि जीएम फसल से आसपास की फसल के संक्रमित होने और बीज के गैरकानूनी रुप से बाजार में पहुंचने की आशंका बनी रहती है। इसी तरह 2001 - 2002 में महाराष्ट्र में बीटी कपास की फसलें पैदा करके किसान को परंपरागत खेती से बेदखल कर दिया गया। नतीजतन विदर्भ के लाखों किसान आत्महत्या कर चुके हैं। 2008 में इन आनुवंशिक बीजों के विस्तार की योजना जबसे परवान चढ़ने लगी तब परमाणु करार के हो-हल्ले में कृषि क्षेत्र में अमेरिका से एक ऐसा समझौता गुपचुप हो गया, जिस पर बहस-मुवाहिशा को सर्वथा नजरअंदाज कर दिया गया। फलस्वरुप झारखण्ड व उत्तरप्रदेश में बीटी राइस और कर्नाटक में बीटी बैगन के प्रयोगों के मार्फत परंपरागत खेती किसानी बरबाद किए जाने का सिलसिला ही शुरु हो गया। उत्तरप्रदेश में तो आजकल 'धान बचाओं, जीई भगाओं' आंदोलन चल रहा है। केन्द्र सरकार द्वारा कुछ समय पूर्व ही देश के उत्तरप्रदेश, झारखण्ड, बिहार, छत्तीसगढ़, मध्यप्रदेश और महाराष्ट के चावल उत्पादक बहुल बारह क्षेत्रों में जीएम धान के प्रयोग की मंजूरी दी है। इन क्षेत्रों में उत्तरप्रदेश का वह इलाका भी है जो बासमती चावल के उत्पादन का प्रमुख क्षेत्र माना जाता है। यह क्षेत्र किसान के जीवनयापन एवं उसकी समृध्दि का प्रमुख आधार हैं। महाराष्ट्र हाईब्रीड शीड कंपनी मायको धान की आनुवंशिक बीजों के प्रयोग की कोशिश में लगी है। चावल की विभिन्न किस्मों को पारंपरिक ज्ञान व तकनीक के बूते उपजाने वाले किसानों को आशंका है कि यदि इन बीजों का प्रयोग धान बहुल क्षेत्रों में किया जाता है तो इसके विषाणु दूसरे खेतों में फैल सकते हैं। यदि ऐसा हुआ तों बासमती और काली मूंछ जैसे चावलों की अद्वितीय किस्में जहरीली हो जाएंगी, जो मानव स्वास्थ्य और खेती की उर्वरा शक्ति को प्रभावित करेंगी। नतीजतन कालांतर में किसान और जीएम चावल उपभोक्ता को अर्थ और स्वास्थ्य दोनों ही दृष्टियों से हानि पहुंचाएंगे।

दरअसल आनुवंशिक आधार पर बीजों से खतों के लिए सुरक्षा के व्यापक व कड़े इंतजाम करने होते हैं ताकि इन प्रयोगों का घातक असर अन्य फसलों पर न पड़े। इसी लापरवाही के चलते अमेरिका का अरबों डॉलर का कारोबार करने वाला चावल उद्योग चौपट हो गया। चावल का निर्यात रुक गया। अमेरिका में निर्मित हुए इन हालातों से कोई सबक लेने की बजाय हमारे देश में इन विनाशकारी प्रवृत्तियों को दोहराया जा रहा है। जबकि फ्रांस में जीएम बीजों से फसल उत्पादन पूरी तरह प्रतिबंधित है। गोया, संयुक्त राष्ट के खाद एवं कृषि संगठन की रिपोर्ट एनर्जी यूज इन फूड सिस्टम 2007 दर्शाती है कि भारत में चावल उत्पादन की दृष्टि से जैविक खेती के परिणाम सकारात्मक हैं। इन पर जलवायु परिवर्तन का असर भी एकाएक नहीं पड़ता।

कपास, चावल और मक्का के बीजों की तरह ही कर्नाटक के कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय धाारवाड़ में बैगन का जीएम बीज तैयार किया जा रहा है। इसके तहत बीटी बैगन यानी 'बेसिलस थुरिन जिनसिस जीन' मिला हुआ बैगन खेतों में बोया गया है। इस प्रयोग के लिए बहाना यह बनाया जा रहा है कि बीटी बैगन कीटों के हमले से बचा रहेगा। जबकि राष्टीय पोषण संस्थान हैदराबाद के ख्याति उपलब्धा जीव विज्ञानी रमेश भट्ट ने चेतावनी दी है कि बीटी जीन की वजह से यहां बैगन की स्थानीय किस्म मट्टुगुल्ला बुरी तरह प्रभावित होगी। मट्टुगुल्ला किस्म के पैदाबार का सिलसिला पन्द्रहवीं सदी में संत वदीराज के कहने से मट्टू गांव के लोगों ने की थी। बाद में यह किस्म अपने विशिष्ट स्वाद और पौष्टिक विशिष्टता के कारण पूरे कर्नाटक में फैल गई। इस कारण इस हरे रंग के भटे को स्थानीय पर्वों के अवसर पर पूजा भी जाता है। खाली पेट इस भटे को कच्चा खाने से यकृत के विकार प्राकृतिक रुप से ठीक होते हैं। इन बीजों के प्रयोग के सिलसिले में सोचनीय पहलू यह है कि जीएम बीज एक मर्तबा प्रयोग के बाद परंपरागत रुप से प्रयोग में नहीं लाया जा सकता है। बीज निर्माता कंपनी से ही इसे खरीदने की वेध्यता होगी। जिस बीटी कपास को 2002 में चलन में लाया गया था, उसकी अब तक खपत दस हजार करोड़ रुपये की हो चुकी है। यदि यह धान किसानों की जेब से न निकला होता तो देश में ढाई लाख किसानों को शायद आत्महत्या के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। बहरहाल मध्यप्रदेश में मक्का के बीजों के प्रयोग पर अंकुश नहीं लगाया गया तो इसके परिणाम न खेती के हित में होंगे और न किसान के ?

प्रमोद भार्गव