संस्करण: 21सितम्बर-2009

 

कैंसे दुरुस्त हो सार्वनिक वितरण प्रणाली

 

 

जाहिद खान

मारे मुल्क के हुक्मरानों ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली का आगाज गरीब परिवारों को सस्ते दामों पर अनाज मुहैया कराने और उन्हें खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के मकसद से किया था। जो शुरुआती सालों में कामयाब भी रही। इसका फायदा वंचित तबकों को खूब मिला। लेकिन जैंसा कि हमारे यहां हर अच्छी योजना के साथ होता है, वैंसा ही सार्वजनिक वितरण प्रणाली के साथ भी हुआ। सार्वजनिक वितरण प्रणाली में आहिस्ता आहिस्ता भ्रष्टाचार का घुन लगता चला गया। राशन वस्तुओं की कालाबाजारी और लूट ने गरीबों के मुंह से उनके खाने का निवाला छीन लिया। सालों से इस व्यवस्था के रग-रग में समा चुके भ्रष्टाचार के चर्चे हो रहे हैं, मगर ये कैंसे सुधारे ? इसकी कोई सार्थक कोशिश कहीं नजर नहीं आ रही है। सरकार के तमाम दावों और वादों के बावजूद भ्रष्टाचार ज्यों का त्यों बना हुआ है। पसमंजर ये है कि भ्रष्टाचार पर लगाम न लग पाने के चलते मुल्क के कई हिस्सों में आज सार्वजनिक वितरण प्रणाली पूरी तरह दम तोड़ चुकी है।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली पर अभी हाल ही में आई सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी इसी बात की ओर इशारा करती है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि ''मुल्क में सार्वजनिक वितरण प्रणाली का अव्वल तो कोई वजूद ही नहीं है और जहां ये है भी तो इसका इस्तेमाल राशन की वस्तुओं को काले बाजार में भेजने के लिए किया जाता है। कुल मिलाकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली अनेक रियासतों में पूरी तरह नदारद हो चुकी है। वहां एक भी चीज गरीबों के लिए उपलब्ध नहीं है।''शीर्ष अदालत ने ये टिप्पणी बंद चाय बागान के हजारों मजदूरों के लिए विशेष पीडीएस खोलने की मांग की सुनवाई करते हुए की। सुप्रीम कोर्ट की ये टिप्पणी ऐंसे वक्त आई है, जब सरकार गरीब परिवारों को भूख से बचाने के लिए खाद्य सुरक्षा कानून लाने की तैयारी गंभीरता से कर रही है। जाहिर है सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी ने सार्वजनिक वितरण प्रणाली की पूरी पोल सरकार के सामने खोल कर रख दी है। लेकिन बावजूद इसके केन्द्र व सूबाई सरकार व्यवस्था को सुधारने के लिए कोई कदम उठाएंगी, इसके आसार कम ही नजर आते हैं।

सार्वजनिक वितरण प्रणाली के नकारेपन और उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार की ये कहानी कोई पहली बार उजागर नहीं हुई है। भोजन के बुनियादी अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट में 2001 में चले एक मुकदमे के दौरान अदालत ने पूर्व न्यायाधीश डी.पी.वाधावा की कयादत में एक कमेटी गठित की थी। जिसने अपनी रिपोर्ट साल 2007 में दाखिल की। वाधावा कमेटी ने अपना काम करते हुए राजधानी दिल्ली की 32 राशन दुकानों और 6 में से 3 गोदामों का औचक मुआयना किया। मुआयने में उन्होंने सभी जगह बड़े पैमाने पर धांधलियां पाईं। न्यायाधीश वाधावा ने अपनी रिपोर्ट में कहा-''कोई भी गोदाम या दुकान ऐंसी नहीं पायी गई जहां गड़बड़ी न मिली हो। गोयाकि भ्रष्ट डीलरों, व्यापारियों और ट्रांसपोर्टरों का गठजोड़ काम कर रहा है, जिसे सियासी सरपरस्ती हासिल है।''न्यायाधीश वाधावा ने सरकारी राशन प्रणाली के पूरे ढांचे को अक्षम और भ्रष्ट बताते हुए कहा-''बड़े पैमाने पर अनाज की कालाबाजारी हो रही है। गरीब लोगों को कभी पर्याप्त और स्तरीय अनाज नहीं मिल पाता।'' जाहिर है जब मुल्क की राजधानी दिल्ली में सार्वजनिक वितरण प्रणाली का ये हाल है, तो दूर-दराज के गांव-देहात में क्या हालात होंगे ? खुद-ब-खुद अंदाजा लगाया जा सकता है।

वाधावा कमेटी के अलावा सीएमएस और सीएमडीएस जैसी संस्थाओं ने भी कुछ साल पहले कई रियासतों में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की स्थिति का अध्यन कराया था। अध्ययन से ये खुलासा हुआ कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली में भ्रष्टाचार पूरी तरह पैर पसार चुका है। अध्यन में जो सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नतीजा सामने आया, वह ये था कि उन सूबों में भ्रष्टाचार ज्यादा है, जहां बेतहाशा गरीबी है। भ्रष्टाचार की शुरुआत राशन की दुकानों के लिए लाईसेंस देते वक्त ही शुरु हो जाती है। राशन की दुकानें, सत्तानशीं पार्टी से जुड़े लोगों को नवाजने और उन्हें फायदा पहुंचाने के लिए होती हैं। जब हमारे वतनपरस्त लीडर इस बंदरबांट में आगे-आगे हैं, तो नौकरशाही कैंसे पीछे रह सकती है। नौकरशाह भी लाईसेंस बनाने के लिए बड़े पैमाने पर घूस लेते हैं। इस भ्रष्टाचार में नीचे से लेकर ऊंचे ओहदों पर बैठने वाले तक शामिल हैं। जाहिर है, कहीं भी भ्रष्टाचार उच्च पदस्थ नौकरशाही की शह के बगैर मुमकिन नहीं हो सकता। ऊपरी रकम में उनकी भी बड़ी हिस्सेदारी होती है। लाईसेंस में भ्रष्टाचार के बाद राशन कार्ड और गरीबी रेखा से नीचे का कार्ड बनाने में घोटाला होता है। राशन कार्ड बनवाने या परिवार के मेंबरों की संख्या बड़ा कर लिखवाने के लिए रिश्वत का दस्तूर आम है। कई रियासतों में ये उजागर हुआ कि बड़े पैमाने पर झूठे कार्ड बनाए जाते हैं। गरीबी रेखा से नीचे के लोगों के नाम पर अमीर लोगों के कार्ड बना दिए जाते हैं। गरीबों के हक का बहुत सारा अनाज अमीर लोग डकार जाते हैं। लाईसेंस और राशन कार्ड में धाधलियों के बाद राशन की दुकानों का भ्रष्टाचार शुरु होता है। आलम ये है कि कथित 'उचित मूल्य' की इन दुकानों में ही सबसे ज्यादा अनुचित काम हो रहा है। राशन दुकानों के इन संचालकों ने भ्रष्टाचार के सारे रिकार्ड तोड़ कर रख दिए हैं। उचित मूल्य की इन राशन दुकानों में सैंकड़ो अनियमितताएं हैं। अव्वल तो दुकानें सही समय पर खुलती ही नहीं और यदि ये खुल भी जाती हैं,तो इन दुकानों पर स्टॉक दो दिन में ही खत्म हो जाता है। जरुरतमंद राशन की दुकानों पर चक्कर लगाते रहते हैं और उन्हें एक ही जवाब मिलता है कि 'अभी राशन नहीं आया।' गोयाकि पूरा महीना गुजर जाता है मगर राशन नहीं मिलता। राशन मिलता भी है तो अनपढ़ गरीबों को कम अनाज देकर उनसे ज्यादा के हिसाब पर अंगूठा लगवा लिया जाता है। फिर दुकानों में मिलने वाले अनाज की गुणवत्ता का कोई मापदंड नहीं है। अच्छे अनाज की कालाबाजारी कर उसके बदले घटिया अनाज लोगों को बांट दिया जाता है।

तय कीमत से ज्यादा वसूला जाना, माप-तौल का दोषपूर्ण होना, दुकानदार का बदतमीजी से पेश आना ऐसी दीगर कई तकलीफें हैं, जिन्हें गरीबों को रोज-ब-रोज भुगतना पड़ता है। गरीब अपनी शिकायत कहां करें, उन्हें समझ में नहीं आता। शिकायत गर करते भी हैं तो, सियासी रसूख के चलते दुकानदारों पर कोई कार्रवाई नहीं हो पाती। भ्रष्टाचार में गले तक डूबे अफसर अपना हिस्सा लेकर चुपचाप बैठ जाते हैं। गरीबों की कहीं सुनवाई नहीं हो पाती। गरीबों को उनके हक से वंचित करने के मामले में कोई सूबाई सरकार पीछे नहीं है। सभी जगह हालात एक समान हैं। लाल बंगाल में भी पिछले दिनों राशन की कालाबाजारी अखबारों की सुर्खियां बनी थी।

कुल मिलाकर जिस तेज रफ्तार से मुल्क अपने सकल घरेलू उत्पाद में वृध्दि दर्ज कर रहा है, उसी तेज रफ्तार से सरकारी राशन दुकानों के राशन की लूट बड़ती जा रही है। जरुरतमंदो को आवंटित अनाज कालाबाजारी कर बाजार में खुले आम बेचा जा रहा है। राशन की ये लूट घटने की बजाय साल दर साल बढ़ती जा रही है। एक अनुमान के मुताबिक साल 2004-05 में 9918 करोड़ रुपए का अनाज कालाबाजारी के जरिए बाजार में पहुंचा तो साल 2005-06 में ये लूट 10,330 करोड़ रुपए की और साल 2006-07 में ये 11336 करोड़ रुपए की आंकी गई। यानी इन तीन सालों में जरुरतमंद गरीबों को आवंटित 31,500 करोड़ रुपए के गेंहू और चावल डीलरों, नौकरशाहों और सियासी लीडरों ने लूट लिए। जाहिर है कि ये लूट कोई छोटी लूट नहीं है। ये लूट कितनी बड़ी है ? इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि लूट की राशि स्वास्थ पर दो साल के सरकारी बजट के बराबर है तो शिक्षा पर हमारे यहां हर साल होने वाले खर्च के बराबर है। खुद केन्द्र सरकार द्वारा तैयार एक अध्यन के आंकड़े बताते हैं कि हर साल सार्वजनिक वितरण प्रणाली का 53 फीसद गेंहू और 39 फीसद चावल कालाबाजार में चला जाता है। यानी आधा गेहू और चावल जरुरतमंदो तक पहुंच ही नहीं पाता।

सरकार, सार्वजनिक वितरण प्रणाली में बड़ते भ्रष्टाचार और लूट को काबू में करती इसके उलट उसने इस प्रणाली के जरिए बांटे जाने वाले गेंहू के कोटे में ही कमी करना शुरु कर दिया है। अभी हाल ही में बीपीएल परिवारों को गेंहू का कोटा 35 किलो से घटाकर सिर्फ 20 किलो कर दिया गया है। तो वहीं एपीएल के तहत अब गेंहू का आवंटन महज 5 किलो से लेकर 15 किलो तक सीमित हो गया है। उपभोक्ता मामले, खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण प्रणाली मंत्रालय के मुताबिक साल 2007-08 के दौरान गरीबी रेखा से ऊपर के परिवारों के लिए औसतन वार्षिक आवंटन में 73 फीसद की कटौती कर दी गई है। इस कटौती का सबसे ज्यादा सामना उत्तर भारत की बीमारु रियासतों को करना पड़ा। गोयाकि मध्यप्रदेश, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़ और बिहार के लिए इस दर्जे में गेंहू के आवंटन में 95 फीसद तक कटौती कर दी गई। यह बात जान लेना लाजमी होगी कि ये वो रियासतें हैं, जिन्हें खाद्य एवं कृषि संगठन ने भूख सूचकांक में चिंताजनक श्रेणी में रखा है। एक सर्वे के मुताबिक मुल्क की 77 फीसद आबादी महज 20 रुपए रोजाना या उससे कम पर अपना गुजारा करती है। जिनमें बड़े पैमाने पर असंगठित क्षेत्र के मजदूर, किसान और आदिवासी शामिल हैं। ये सब बीपीएल या एपीएल के दर्जे में आते हैं। जाहिर है इनके लिए गेंहू,चावल के कोटे में कटौती करना गैर जरुरी और बेहद शर्मनाक है। ऐसा नहीं है कि सरकार के पास खाद्यान्नों की कमी हो। सरकारी गोदामों में खाद्यान्न भरे पड़े हैं लेकिन फिर भी कटौती जारी है। सरकार गरीबों के हक में कटौती कर अनाज को खुले बाजार में बेच रही है।

बहरहाल, इस सदी में आर्थिक मंदी का सबसे ज्यादा असर गरीब की थाली पर पड़ा है। जाहिर है सबसे ज्यादा कोशिशें भी उन्ही के लिए होना चाहिएं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली को मजबूत बना कर ही गरीबी व भुखमरी पर काबू पाया जा सकता है। यदि सार्वजनिक वितरण प्रणाली लड़खड़ाएगी तो गरीब की भी दम टूटेगी। सार्वजनिक वितरण प्रणाली को पुनर्जीवित करना समय की दरकार है। हमारे मुल्क की ही एक रियासत केरल ने मॉडल सार्वनिक वितरण प्रणाली की मिसाल पेश की है। केरल की एलडीएफ सरकार ने अपनी लगातार कोशिशों से सार्वजनिक वितरण प्रणाली को भ्रष्टाचार विहीन बनाया है। जनता के सहयोग से सरकार ने कालाबाजारी पर बहुत हद तक काबू पा लिया है। सरकार के इंस्पेक्शन और औचक निरीक्षण ने सूबे की सार्वजनिक वितरण प्रणाली की पूरी तस्वीर ही बदल कर रख दी। भ्रष्टाचार पर नियंत्रण करने के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं। वितरण व्यवस्था और जनता के हितों को बचाने के लिए राज्य स्तर पर सतर्कता समितियां बनाई गई हैं। जिला स्तर के अधिकारियों के दल खुले बाजार में कीमतों को चैक करने के लिए नियमित दौरे करते हैं। यही नहीं जमाखोरी करने वालों के खिलाफ तुरंत कार्रवाई की जाती है। फर्जी राशन कार्ड जब्त किए जाते हैं। राशन दुकानों में अनियमितताएं पाए जाने पर जुर्माना वसूल किया जाता है। इस वक्त रियासत के सभी 14 जिलों में मूल्य निगरानी प्रकोष्ठ काम कर रहे हैं। सरकार की कोशिशों का ही नतीजा है कि आज केरल के 52 फीसद लोग सार्वजनिक वितरण प्रणाली का फायदा उठा रहे हैं और इसकी वितरण व्यवस्था से पूरी तरह मुतमईन हैं। कुल मिलाकर दम तोड़ती सार्वजनिक वितरण प्रणाली के बीच केरल ने हमें एक नया रास्ता दिखलाया है। केरल के नक्शे कदम पर चलकर मुल्क की दीगर रियासतें भी अपनी सार्वजनिक वितरण प्रणाली को दुरुस्त कर सकती हैं। अब देखना यह है कि सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद कितनी रियासतें इस जानिब गंभीर होती हैं।

जाहिद खान