संस्करण: 21सितम्बर-2009

 

सोनिया की सादगी

अंजनी कुमार झा

संप्रग अध्यक्ष सोनिया गांधीं की पहल पर मितव्ययिता के बापू प्रयोग का असर सरकार और बाहर भी दिखने लगा। स्वयं श्रीमी गांधीं का इकोनॉमी क्लास में यात्रा करना खर्चीले और भड़कीले जीवन जीने वालों के लिए एक सबक है।

कांग्रेस महासचिव व युवा नेता राहुल गांधीं के ट्रेन यात्रा से युवा कार्यकर्ताओं में यह उम्मीद फिर जगी है कि युगांतकारी परिवर्तन शीघ्र होगा। विपक्षी दलों भाजपा, राजद, जद आदि ने इसे जब ढोंग बताया तो ममता बनर्जी ने मोर्चा संभालते हुए करारा जवाब दिया। विदेश मंत्री और राज्यमंत्री का तुरंत होटल छोड़ना और सरकारी गेस्ट हाउस में डेरा डालना इस बात की ओर इशारा करती है कि मितव्ययिता के अभियान का तेजी से अमल हो रहा है। सरकारी सचिवों को विदेश यात्रा और अन्य फालतू खर्चों पर भी लगाम कसना शुरू हो गया है। वैश्विक मंदी से अमेरिका भले ही अभी तक न उबर पाया हो, किंतु भारत में प्रबल इच्छाशक्ति मौजूद है। इस कारण उम्मीद का दीपक जगमगा रहा है। महंगाई और सूखे की मार को कम करने के लिए वीआईपी हस्तियों के अपव्यय पर ब्रेक लगाने से नीचे तक सकारात्मक संदेश जा रहा है। वित्तमंत्री प्रणव मुखर्जी के फरमान का असर इतना अधिक हुआ कि मंत्री इकोनॉमी क्लास में सफर करने लगे और नौकरशाहों-मंत्रियों के हर खर्चे पर वित्त मंत्रालय की पैनी नजर रहने लगी। कई विश्लेषक सोनिया-राहुल की इस सादगी को गांधींजी-लालबहादुर शास्त्री के आचार-व्यवहार से जोड़ने लगे हैं। नेताओं का बड़बोलापन खुलकर सामने आ रहा है और सत्य पुन: उद्धाटित हो रहा है। मंत्रियों के बंगलों पर दो-दो करोड़ रुपये सालाना खर्च हो रहे हैं। बार-बार नये सिरे से सजाने के नाम पर अनाप-शनाप खर्च को लेकर ई बार कैग ने आपत्ति भी प्रकट की है। यात्रा के दौरान बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों को साथ ले जाने की होड़ ने भी खर्च को बढ़ाया हैं इस आडंबर से आम यात्रियों के दिल में मंत्रियों के प्रति स्नेह की जगह आक्रोश पैदा हुआ है।

प्रजातांत्रिक देश में बापू पहले ऐसे शख्स थे जिन्होंने राजनीतिक विमर्श में मितव्ययिता और संयम का विचार रखा। मितव्ययिता से संयम और उससे उपजी सहनशीलता, उदारता, सत्यता, अहिंसा के कारण मोहनदास करमचंद गांधीं महात्मा कहलाये। दुर्भाग्यवश भूमंडलीकरण की काली छाया ने फिजूलखर्ची को कम करने के बजाय बढ़ाया। मंत्रियों-नौकरशाहों ने केवल योजनाओं, भाषणों तक ही इस एजेंडे में रखा। स्वयं के जीवन में इसे नहीं उतारा। मंत्रियों, नौकरशाहों के रहन-सहन में ही रहे करोड़ों रुपये के खर्च को रोकने की ज़रूरत है। ताजा आंकड़े के मुताबिक केंद्रीय मंत्रियों द्वारा किया जाने वाला कुल खर्च 182 करोड़ रुपये है। और इस राशि का 75 प्रतिशत हिस्सा उनके द्वारा की जाने वाली यात्राओं पर खर्च होता हैं। मंत्रियों की तनख्वाह इस खर्च का एक प्रतिशत होता हैं। विशालकाय बंगलों का रख-रखाव के नाम पर अनाप-शनाप बिल किसी पांच सितारा होटल में ठहरने से कहीं ज्यादा होता है। वित्तमंत्री प्रणव दा के आदेश से मंत्रियों-नौकरशाहों में मची खलबली के तुरंत बाद ही कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधीं के इकोनॉमी क्लास में यात्रा करने और फिर राहुल गांधीं की ट्रेन से यात्रा करने की घटनाओं ने पार्टी नेताओं को कई तरह के इशारे कर दिए हैं। विदेश राज्यमंत्री थरूर, कृषि मंत्री शरद पवार के नानुकूर करने से उन्हें ही नुकसान होगा। धींरे-धींरे अन्य दलों के नेताओं को भी इससे तुरंत सबक लेकर सोनिया की सादगी का देश हित में अनुकरण करना चाहिए। दलगत राजनीति से ऊपर उठकर अमेरिक, ग्रेट ब्रिटेन, जापान जैसे विकसित देशों के राजनेताओं के कर्तृत्व का अनुसरण करना चाहिए। लालबहादुर शास्त्री, राममनोहर लोहिया, दीनदयाल उपाध्याय सरीखे नेताओं के जीवन के अध्यायों का अध्ययन भी करना चाहिए। कभी सुखे तो कभी अन्य आपदाओं से त्रस्त रहने वाले भारत के नेताओं-अफसरों को मितव्ययी बनना चाहिए।

कांग्रेस शासित प्रदेशों दिल्ली, राजस्थान ने सादगी और किफायत बरतने की दिशा में अनेक कदम उठाए हैं। मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने दिल्ली प्रदेश के सभी मंत्रियों और विधायकों से अपने साल भर के वेतन की बीस फीसदी राशि सूखा राहत के लिए देने के लिए कहा है। राजस्थान सरकार ने मंत्रियों और अफसरों की विदेश यात्राओं पर रोक के अतिरिक्त अन्य व्यय में कटौती के लिए कई कदम उठाए हैं। दफ्तरों में बिजली बिल में दस फीसदी तक कमी की जा रही है। सरकारी भोज के आयोजन के लिए भी अनुमति लेनी होगी। इसे बहस का रूख देने के बजाय कटौती के अन्य उपायों पर राजनीतिक चश्मे से देखने के बजाय सामुहिक विमर्श करने की आवश्यकता है। सोनिया की पहल से अब संसद, विधानसभाओं में फिजूल खर्च रोकने पर बहस होगी। जो राष्ट्रहित के लिए शुभ-संकेत हैं।
 

अंजनी कुमार झा