संस्करण: 21  नवम्बर- 2011

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यह फासिज्म की भाषा नहीं तो और क्या है

       रएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने संघ का प्रांतीय स्तर शिविर मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्य मंत्री और कांग्रेस के सर्वाधिक मुखर महासचिव दिग्विजय सिंह के मूल निवास क्षेत्र राजगढ में आयोजित किया। अपने मन और वचन में भेद रखने के लिए जाने जाने वाले इस संगठन के प्रमुख ने राजगढ में शिविर रखने के पीछे कारण बताया कि वहाँ पूरे प्रांत में सबसे अधिक शाखाएं हैं, इस कारण से इस स्थान का चुनाव किया गया। इस आंकड़े की सत्यता तो वे ही जानें किंतु यदि यह सच भी है तो भी प्रांतीय स्तर का शिविर आयोजित करने के लिए हमेशा यही कारण नहीं होता रहा है

  ? वीरेन्द्र जैन


क्या है टीम अन्ना का असल एजेंडा ?

        रविंद केजरीवाल आज चीख-चीख कर कह रहे हैं कि अगर हम सब भ्रष्ट हैं तो हम सबको सजा दीजिए, फांसी पर लटका दीजिए, लेकिन जनलोकपाल तो लाइए, सरकार हम लोगों के विरुध्द झूठे आरोप लगाकर जनता को गुमराह कर रही है। असल मुद्दे से धयान हटा देना चाहती है। ठीक समझ में आया अरविंद केजरीवाल और टीम अन्ना के,इसलिए कि यही काम तो उन्होंने किया था अर्थात जनता को गुमराह करने का। असल ईशू से भटकाने का। उस समय सारा देश आतंकवाद के विरुध्द जंग लड़ने में एकजुट था। सरकार आतंकवाद पर काबू पाने के लिए हर संभव प्रयास कर रही थी,आतंकवाद को बढ़ावा देने वाले सफेदपोश चेहरे एक-एक कर बेनकाब हो रहे थे।

? अजीज बर्नी


तो 24 घंटे में पास हो जाएगा जनलोकपाल बिल

      म दूध के जले हैं, इसलिए छांछ को भी फूंक-फूंक कर पीते हैं। यूं भी जमाना इतने भरोसे के लायक नहीं है कि किसी भी पर आंख बन्द करके विश्वास कर लें। 2004में डॉक्टर मनमोहन सिंह के चयन का पैमाना उनकी ईमानदारी ही थी। सत्ताधारी दल ही नहीं, विपक्षी दल भी उनकी ईमानदारी के कायल थे, लगभग आज भी कायल हैं, लेकिन अब इसमें कुछ प्रतिशत परिवर्तन आया है। अब उनकी ईमानदारी पर प्रश्न उठाने वाले भी कभी कभी जुबान खोलते हुए नज़र आने लगे हैं। जाने अनजाने कहीं न कहीं हुई चूक ने उनको भी जवाबदेह बना दिया है। ऐसे में जनलोकपाल की स्वीकृति के बाद जो लोकपाल नियुक्त किये जायेंगे उनकी ईमानदारी पर कभी कोई प्रश्न नहीं उठेगा, इसकी क्या गारंटी है ?

? अजीज बर्नी


सत्य छिपता नहीं छिपाए

          ई बार होता है जब जोर-जोर से बोलने वाले के पक्ष में यह मान लिया जाता है कि वह सही बोल रहा है, और अक्सर देखा गया है कि जोर-जोर से बोलने वाले बाद में झूठे साबित होते हैं। यही स्थिति भाजपा की है, शाइनिंग इंडिया से लेकर संघ से जुड़े लोगों की हिंसक गतिविधियों और भ्रष्टाचार तक भाजपा ने जितनी बार भी आक्रामक अंदाज में सच छिपाने की कोशिश की है बार-बार मात खाई है,लेकिन सत्ता की लालच उन्हें बार-बार वही करने को मजबूर करती है।

? विवेकानंद


मध्यप्रदेश के किसान हलाकान

         ध्यप्रदेश में किसान चारों ओर परेशानी से घिरे हुए हैं। एक ओर उन्हें बिजली संकट का सामना करना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर खाद-बीज की किल्लत ने भी उन्हें परेशान कर रखा है। प्रदेश के मुखिया खुद को किसान का बेटा कहते हैं और खेती को लाभ का धंधा बनाने की बातें करते हैं, लेकिन किसानों की समस्याओं को लेकर वे बेखबर बने हुए हैं। कर्ज में डूबे किसानों को सस्ते ऋण का लखलखा सुंघाने वाली शिवराज सरकार कदम-कदम पर किसानों को छल रही है। भाजपा से जुड़े भारतीय किसान संघ ने राजधानी में जबर्दस्त धरना प्रदर्शन कर किसानों की समस्याएं हल करने की मांग की थी, किंतु सरकार इस दिशा में अब तक कोई ठोस पहल नहीं कर सकी है।

 ? महेश बाग़ी


संवैधानिक पद पर बैठे मुख्यमंत्री के असंवैधानिक विचार

           क्या कोई व्यक्ति जिसकी रक्षा की कसम खाता है उसी की हत्या कर सकता है?

               मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान लगभग यही कर रहे हैं। शिवराज सिंह मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री है। प्रत्येक मंत्री चाहे वह केन्द्र का हो या राज्य का उसे राष्ट्रपति या राज्यपाल शपथ दिलाते हैं। इस शपथ के बाद ही कोई व्यक्ति मंत्री बन सकता है। उस शपथ के अनुसार मंत्रियों पर संविधान की रक्षा कर उत्तरदायित्व सौंपा जाता है। हमारे संविधान की उद्देशिका के अनुसार भारत एक समाजवादी, पंथनिरपेक्ष, लोकतंत्रात्मक गणराज्य है।

? एल.एस.हरदेनिया


आध्यात्मिक और योग गुरुओं से उमड़ता राजनीति के प्रति प्रेम

       राजनीति एक ऐसा स्वाद है जिसको लग जाता है, वह पूरी तरह से उसमें लिप्त होता चला जाता है। वर्तमान दौर में राजनीति के चस्के का कुछ ऐसा कमाल देखने को मिल रहा है कि इसका मजा राजनैतिक लोग तो लूट ही रहे हैं किंतु समाज के हर क्षेत्र के लोग भी राजनीति के अखाड़े में लंगोट लगाकर उतरने लग गये हैं। व्यापार व्यवसाय से जुड़े लोग, विभिन्न सेवाओं से जुड़े लोग और यहां तक कि जिसको अपने अस्तित्व को बचाने के लिए कोई रास्ता नहीं मिलता वह भी राजनीति के शेल्टर में आता जा रहा है।

? राजेन्द्र जोशी


उच्च शिक्षण संस्थानों की ये खाप पंचायतें

    दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रतिष्ठित कहे जाने वाले दौलतराम महाविद्यालय में छात्राओं के साथ हो रहे व्यवहार ने यह स्पश्ट कर दिया है कि हमारे समाज में व्याप्त खाप पंचायतों की बर्बर समस्या किसी क्षेत्र विशेष की न होकर एक पुरुषवादी मानसिकता है जो गाहे-बगाहे अपना रुप दिखाती रहती है। समाचार माध्यमों में आई रपटों ने हैरान कर दिया है कि उच्च शिक्षा के इतने महत्त्वपूर्ण केन्द्र में भी दुनिया की आधी आबादी के प्रति वैसी ही सोच और व्यवहार है जैसा कि हम प्राय: पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा में कथित खाप पंचायतों के बर्बर और तुगलकी फरमान जैसे फैसलों में देखते रहते हैं।

 

? सुनील अमर


आदिवासी प्रथा बनाम महिला अधिकार

पंचायत में महिलाएं : किस्सा नागालैण्ड का

     रक्षण के सहारे पंचायतों में महिला प्रतिनिधि चुन कर आयीं हैं उनकी शक्ति को हथियाने या प्रभावहीन बनाने की भरसक कोशिश इस पुरूषप्रधान समाज में होती रही है। याद है जब केन्द्र सरकार की तरफ से घोषणा हुई कि पंचायतों में महिलाओं का आरक्षण 33 फीसदी से बढ़ा कर 50 फीसदी किया जाएगा , उसके दो दिन बाद ही बुन्देलखण्ड प्रखण्ड से ख़बर आयी थी कि दो महिला सरपंचों को गांव से बाहर खदेड़ दिया गया है। दोनों दलित समुदाय से थीं।

? अंजलि सिन्हा


माया का मायावी हथकड़ा

    ए राज्य तेलंगाना के गठन को लेकर आंतरिक संघर्ष से जूझ रही कांग्रेस को उत्तर प्रदेश के चार टुकड़े का प्रस्ताव पारित कर उत्तार प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती संकट में डालने का काम करने जा रही है। हालांकि मायावती की यह मांग नयी नहीं है, लेकिन पहले वे बुंदेलखण्ड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश को अलग राज्य बनाए जाने की पेशकश कर रही थीं, किंतु अब एक कदम आगे बढ़कर पूर्वांचल और अवध प्रदेश बनाए जाने का प्रस्ताव राज्य मंत्री मण्डल से पास करा लिया है। वह भी जब,तब उत्तर प्रदेश विधानसभा के चुनाव निकट हैं।

 

? प्रमोद भार्गव


ओबामा के लिए मुश्किलों भरा दिन अर्थसंकट मुख्य चुनौती है

     वाशिंगटन: अमेरिकी राष्ट्रपति पद के लिए 2012 में चुनाव होना है। सवाल पूछा जा रहा है कि क्या राष्ट्रपति बराक ओबामा एक बार फिर चुनाव जीतकर राष्ट्रपति बन पाएंगे?इतिहास तो यही कहता है कि आर्थिक मंदी से निजात न दिलाने वाला राष्ट्रपति हमेशा चुनाव हारता रहा है। पर क्या ओबामा उस इतिहास को झुठलाते हुए एक नया इतिहास बना पाएंगे?

? कल्याणी शंकर


प्राथमिक शिक्षा में सुधार सिर्फ निजीकरण से असंभव

    पिछले वर्ष केन्द्र सरकार ने शिक्षा के अधिकार अधिनियम को लागू कर देश के हर बच्चे को शिक्षा मुहैया कराने की दिशा में एक ऐतिहासिक कार्य किया था। शिक्षा का सालाना बजट मामला समवर्ती सूची में होने के कारण  मेंमानव संसाधन मंत्री कपिल सिब्बल के तेवरों से अहसास हो रहा हे कि वो देश की शिक्षा व्यवस्था में आमूल परिवर्तन की चाह रखते हैं।वास्तव में हमारी शिक्षा व्यवस्था आजादी बाद भी कोई महत्वपूर्ण नीतिगत परिवर्तन नहीं किया जा सका है,जिसकी जरूरत आजादी के पहले दिन से ही थी,आलोचको ने हमेशा सिर्फ यह आरोप लगाकर कि हमारी शिक्षा प्रणाली मैकाले के विचारों को लागू करती है अपने कर्त्तव्य से इतिश्री की है।

 

? डॉ. सुनील शर्मा


  21  नवम्बर-2011

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