संस्करण: 21  मई-2012

बम्पर फसल के भण्डारण का संकट

? प्रमोद भार्गव

                  ध्यप्रदेश में गेहूं की जबरदस्त पैदावार के चलते उसके समर्थन मूल्य पर खरीदी और भण्डारण का जानलेवा संकट पैदा हो गया है। बोरियों की कमी की मांग उठा रहे आंदोलन कारी किसानों पर पुलिस गोलीबारी से बरेली के एक किसान की मोत हो गई। इस मौत के बाद समस्या के निराकरण की चिंता करने की बजाए राज्य और कैंद्र्र सरकार से जुड़े राजनीतिक नुमांइदों ने एक दूसरे पर सड़क से संसद तक दोषारोपण की झड़ी लगा दी। संसद में भाजपा के सांसदो ने जहां इस मुददे पर तत्काल बहस की मांग उठाई,वहीं इजाजत नहीं मिलने पर संसद के बाहर प्रर्दशन भी किया। सांसदो के इस हंगामें को इसलिए जायज ठहराया जा सकता है, क्योंकि बारदाना उपलब्ध कराने की प्राथमिक जवाबदारी कैंद्र सरकार की है,लेकिन यह कोई बाध्यकारी नहीं है। राज्य सरकारें चाहें तो वे भी बारदाना खरीदने के लिए स्वतंत्र हैं। किंतु लालफीताशाही के चलते हरेक साल इस समस्या से दो चार होना पड़ता है। जबकि यह कोई प्राकृतिक आपदा नहीं है, जो एकाएक टूट पड़ी हो ? हालांकि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की इस बात के लिए प्रशंसा करनी होगी कि उन्होंने समर्थन मूल्य पर 80 लाख टन गेहूं खरीदी का रिकार्ड लक्ष्य रखा है।

               देश में किसानों की मेहनत और जैविक व पारंपारिक खेती को बढ़ावा देने के उपायों के चलते कृषि पैदावार लगातार बढ़ रही है। अब तक हरियाणा और पंजाब ही गेहूं उत्पादन में अग्रणी प्रदेश माने जाते थे,लेकिन अब मध्यप्रदेश, बिहार, उत्तरप्रदेश और राजस्थान में भी गेहूं की रिकार्ड पैदावार हो रही है। बावजूद खाधान्न उत्पादन का जो 4 प्रतिशत का लक्ष्य है, वह पूरा नहीं हो रहा है। 2006-07 से यह 3 फीसदी पर ही अटका हुआ है। 2010-11 में कुल खाधान्न उत्पादन की उम्मीद 2.41 करोड़ टन थी, लेकिन पैदावार इस लक्ष्य से 50 लाख टन ज्यादा हुई। 2011-12 में भी फसलों का बंपर उत्पादन हुआ है। इस अनाज का कुल उत्पादन 25.26 करोड़ टन होने की उम्मीद है। इसमें धान,गेहूं, मक्का, ज्वार,दालें और मोटे अनाज व तिलहन शामिल हैं। इस पैदावार को 2020-21 तक 28 करोड़ टन तक पहुंचाने का सरकारी लक्ष्य है। जिससे बढ़ती आबादी के अनुपात में खाद्यान्न मांग की आपूर्ति की जा सके। इस लक्ष्य को पूरा करने के लिए कृषि उपज 2प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़ाने की जरूरत है। यह एक बढ़ी चुनौती है। इससे मुकाबला करना तब और मुश्किल है जब हम उच्च गुणवत्ता वाली कृषि भूमि को औद्योगिक विकास के लिए भेंट चढ़ाते जा रहे है और अनाज भण्डारण के सुरक्षित उपाय नहीं कर पा रहे हैं। लिहाजा अनाज बड़ी मात्रा में सड़ कर बर्बाद भी हो रहा है।

                साठ के दशक में हरित क्रांति की शुरूआत के साथ ही अनाज भण्डारण की समस्या भी सुरसा मुख बनती रही है। एक स्थान पर बड़ी मात्रा में भडांरण और फिर उसका सरंक्षण अपने आप में एक चुनौती भरा और बड़ी धनराशि से हासिल होने वाले लक्ष्य है। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर आनाज की पूरे देश में एक साथ खरीद भंडारण और फिर राज्यवार मांग के अनुसार वितरण का दायित्व भारतीय खाद्य निगम के पास है। जबकि भंडारो के निर्माण का काम केंदी्य भण्डार निगम संभालता है। इसी तर्ज पर राज्य सरकारों के भी भण्डार निगम है। यह दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है कि आजादी के 65साल बाद भी बढ़ते उत्पादन के अनुपात मे केंद्र्र और राज्य दोनों ही स्तर पर अनाज भण्डार के मुकम्मल इतंजाम नहीं हुए।

                  एफसीआई की अब तक कुल भण्डारण क्षमता बमुश्किल 638 करोड़ टन है। इसमें किराए के भण्डार गृह भी शमिल हैं। यदि सीडब्लूसी और निजी गोदामों को भी जोड़ लिया जाए तो यह क्षमता 11.5करोड़ टन अनाज का भण्डारण ही कर पाने में सक्षम है। राज्य सरकारें जिस हिसाब से समर्थन मूल्य पर अनाज की खरीद कर रही हैं, उससे लगता है करीब 2करोड़ टन अतिरिक्त अनाज की खरीद होगी। जिसका समुचित भण्डारण नमुमकिन है। म्यप्रदेश में गेहूं की बंपर पैदावार और गेहूं खरीद में आ रही मुश्किलों के चलते अब सरकार ने बिना बोरों के ही गेहूं खरीद की इजाजत दे दी है। जाहिर है बेमौसम बरसात हो जाती है तो इस गेहूं को सड़ने से बचाना कठिन होगा। प्रदेश में बोरों का इतना जबरदस्त संकट है कि किसानों को बमीठा में बोरों से भरे ट्रक लूटने को भी मजबूर होना पड़ा है। इस बदतर स्थिति से निजात के लिए प्रदेश सरकार ने किसानों को पुराने बोरों का उपयोग करने की भी इजाजत दे दी है। क्या यह छूट किसान की गोलीबारी में हुर्ह हत्या के पहले नहीं दी जा सकती थी ?लेकिन लालफीताशाही अकसर ऐसे सरल उपायों में अड़ंगें डालने का प्रमुख कारण बनती है। भण्डारण व्यवस्था के परिप्रेक्ष्य में एक विडंबाना यह भी है कि फिलहाल गोदामों में 70 लाख टन अनाज पिछले साल का ही भरा पड़ा है। इसे कोई उठाने को तैयार नहीं है। इसमें 30 लाख टन गेहूं और 20 लाख टन चावल है। तय है अनाज भण्डारण और उसे सड़ने से बचाने की समस्या भयावाह होने जा रही है। केन्द्र सरकार यदि दूरदृष्टि से काम लेती तो इस अतिरिक्त अनाज को निर्यात करने की छूट दे सकती थी ? इससे जहां गोदाम खाली हो जाते, वहीं व्यापारियों को दो पैसे कमाने का अवसर मिलता। किंतु ऐसा लगता है सड़े अनाज से शराब बनाने वाली कंपनियों के लिए अनाज सड़ाने का इंतजाम एक सोची समझी साजिश का हिस्सा है।

                भण्डारण की ठीक व्यवस्था न होने के कारण हमारे गोदामों और गोदामों के बाहर पड़ा 168 लाख टन गेहूं पिछले साल खराब हो गया था। यहएफसीआई के कुल भण्डारण किए गए गेहूं का एक तिहाई हिस्सा था। इस अनाज से एक साल तक दो करोड़ लोगों का भोजन कराया जा सकता था। यह अनाज गोदामों की कमी की बजाय भण्डारण में बरती गई लापरवाही के चलते खराब हुआ था। उस दौरान समाचार चैनलों ने दिखाया था कि एफसीआई ने अपने कुछ गोदाम बहुराष्ट्र्रीय कंपनीयों को किराए पर उठा दिए हैं। इन कारणों से कंपनियों का माल तो सुरक्षित रहा , लेकिन गरीबों का भोजन सड़ने को खुले में छोड़ दिया। इसी तरह उत्तरप्रदेश के हापुड़ में बारिश में खुला छोड़ देने के कारण 45 लाख बोरी अनाज खराब हुआ। किंतु एफसीआई को इस बर्बादी का अफसोस तक नहीं हुआ, लेकिन सड़ते अनाज की खबरो से व्याकुल व विचलित होकर सर्वोच्च न्यायालय को कहना पड़ा था कि अनाज सड़ाने की बजाए गरिबों में मुप्त में बांट दिया जाए। किंतु सरकार ने परिवहन खर्च और गरीबों को सस्ते अनाज पर पहले से ही दी जा रही रियायतों का बहाना बनाकर अनाज सड़ने दिया।

                  दरअसल कृषि एवं खाद्य आपूर्ति मंत्रालय की अनाज भण्डारण से लेकर वितरण तक नीतियां परस्पर ऐसी विरोघावासी व अनुपयोगी हैं कि जिनके चलते उत्पादक उपभोक्ता एवं व्यापारी तीनों लाचार व परेशान है। जबाबदेही के लिए जिम्मेदार प्रशासक इन खामियों पर व्यवस्था की कमी जताकर पर्दा डालने का काम करते है। जैसा कि मौजूदा हालातों में बारदाने की कमी को लेकर गेहूं खरीद की बदहाल स्थिति बनी हुर्ह है। इन नीतियों को आमूलचूल बदलने की जरूरत है। यदि भारतीय खाद्य निगम विकेंद्रीकृत खाद्य निति अपनाए तो ग्राम स्तर पर भी अनाज भण्डारण के श्रेष्ठ उपाय किए जा सकते है। स्थानीय स्तर पर भारतीय ज्ञान परंपरा में ऐसी अनूठी भण्डारण की तकनीके प्रचलन में है जिनमें रखा अनाज बारिश, बाड़, चूहों व कीटाणुओं से बचा रहता है। बिहार, असम और उत्तरप्रदेश में बाढ़ से अनाज को बचाने के लिए किसान इन्हीं तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं।

               गांव में अनाज खरीदकर एफसीआई उसके भण्डारण की जिम्मेदारी किसानों को सौंप सकती है। किसान के पास अनाज सुरक्षित बना रहे इसके लिए प्रति किंवटल की दर से किसान को किराया दिया जाए। यदि ऐसे उपाय अमल में लाए जाते है तो सरकार ढुलाई, लदाई और उतराई के खर्च से बचेगी। इसी अनाज को पंचायत स्तर पर मध्यान्ह भोजन, बीपीएल एवं एपीएल कार्ड धारियों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के जरिए स्थानीय स्तर पर ही सस्ती दरों में उपलब्ध करा सकती है। इस तरकीब को यदि नीतिगत मूर्त रुप दिया जाता है तो कालाबाजारी और भ्रष्टाचार  की आशंकाएं भी नगण्य रह जाएगीं। अनाज भण्डारण की एक नई तकनीक भी हाल ही में इजाद हुई है। इस तरकीब से वायुरहित ऐसे पीपे तैयार किए गए है जिनमें अनाज का भण्डारण करने से अनाज पानी व कीटों से शत्-प्रतिशत् सुरक्षित रहता है। लेकिन हमारे देश में फिलहाल ग्रामीण, किसान और मजदूर से जुड़ा विकेंद्रीकृत नीतिगत सुधार नमुमकिन ही है। क्योंकि नीतियों में ग्राम आधारित सुधार किया जाता है तो विरोधाभास व विसंगतियां समाप्त हो जाएगीं और कंपनियों को लाभ पहुंचाने का गणित गड़बड़ा जाएगा। लिहाजा लालफीताशाही न तो ऐसा होने देगी और न ही  प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सप्रंग सरकार से ऐसे नीतिगत परिवर्तन की उम्मीद है।


? प्रमोद भार्गव