संस्करण: 21  मई-2012

पुण्यतिथि 27 मई पर विशेष

मध्यप्रदेश प्रवास के दौरान नेहरूजी के भाषणों के मुख्य अंश

? एल.एस.हरदेनिया

               पंडित जवाहरलाल नेहरु आजादी आंदोलन के दौरान और देश के आजाद होने के बाद प्रधानमंत्री की हैसियत से संपूर्ण भारत का लगातार भ्रमण करते रहते थे। उनके भ्रमण की एक विशेषता यह रहती थी कि वे अपने भ्रमण के दौरान दिल्ली के बाहर रात बिताते थे। ऐसा करने से वे आम लोगों के संपर्क में आते थे। देश के विभिन्न भागों के साथ-साथ उन्होंने मध्यप्रदेश के अनेक स्थानो की यात्राएं की। 1947 के पूर्व वर्तमान मध्यप्रदेश में शामिल अनेक क्षेत्रों में राजाओं का शासन था। अपने प्रवास के दौरान वे जन सभाओं को संबोधित करते थे। जनसभाओं में वे उस तरीके से भाषण देते थे जैसे कोई प्रोफेसर विश्वविद्यालय की क्लास में व्याख्यान दे रहा हो।

                 उनकी पुण्यतिथि के अवसर पर मध्यप्रदेश के विभिन्न स्थानों पर दिए गए उनके भाषणों के वे अंश प्रस्तुत कर रहे हैं जो आज भी हमें प्रेरित कर सकते हैं।

                 तीस दिसंबर 1936 को हरदा में आयोजित जनसभा को संबोधित करते हुए नेहरु जी ने कहा ''हमारे देश में गरीबी-बेकारी बहुत बढ गई है। आपने साम्यवाद का नाम सुना होगा। आप उसके पक्ष और विपक्ष की बातें सुनकर अपना मत निश्चित करें। गरीबी और बेकारी दूर करने की साम्यवाद अच्छी युक्ति है।''

                 सन 1945 में भोपाल में एक सभा को संबोंधित करते हुए नेहरु जी ने कहा ''मैं आपको मुबारकबाद देता हूं कि आप लोगों ने अपनी रियासत में हिन्दू-मुस्लिम एकता की अच्छी मिसाल पेश की है। हम सब लोग हिन्दुस्तान को आजाद कराने के लिए जुड़े हैं। आप भी आजादी की इस लड़ाई में शामिल हों ऐसी मेरी गुजारिश हैं। देश को आजादी जरुर मिलेगी। कांग्रेस शान्ति से काम करना चाहती है। लड़ाई-झगड़े, दंगे फसाद बिल्कुल बेकार हैं। इससे कोई फायदा नहीं होगा। जहां तक रियासतों के देश में मिलने का सवाल है,आपको कोई शक नहीं होना चाहिए। भोपाल आजाद भारत में मिलेगा, देश के साथ मिलेगा।''

                   19 अप्रैल 1947 को ग्वालियर की सभा में आपने काश्मीर का जिक्र किया था। नेहरु जी प्रजामंडल के अधिवेशन में शामिल होने आए। उस समय शेख अब्दुल्ला जेल में थे। इसके बावजूद उन्हें प्रजामंडल का अध्यक्ष चुना गया था। शेख अब्दुल्ला का जिक्र करते हुए नेहरु जी ने कहा ''वे जेल के सीखचों में बंद होने के कारण यहां नहीं आ सके। परन्तु मुझे जब उनका ख्याल आता है तो मेरा सिर शर्म से झुक जाता है। मैं केवल यही कह सकता हूं कि काश्मीर एक ज्वाला की तरह धधक रहा है। किसी दिन जरुर यह गुल खिलाएगा।''

               दिनांक 28 मई 1948 को ग्वालियर में एक आम सभा में बोलते हुए आपने कहा कि हमें सोचना चाहिए कि ''आखिर हमारा देश गुलाम क्यों हुआ। इसलिए कि हम आपस में लड़ते थे, हम एक दूसरे से सहयोग नहीं करते थे और दुश्मन ने हमें गुलाम बना लिया। अब हम आजाद हुए हैं। लेकिन स्वतंत्रता या आजादी कोई ऐसी चीज नहीं है कि आपने एक दफे उसे खरीद लिया, मोल ले लिया तो हमेशा के लिए आप उसको सेफ (तिजोरी) में बंद करके रख लीजिए। स्वतंत्रता या आजादी एक ऐसी चिड़िया है कि अगर आप हर वक्त आप होशियार न रहे तो आपके पास से उड़ सकती है। हमेशा हमें होशियारी से काम करना है, हमेशा उसकी रक्षा करना, हमेशा उसका पूजन करना है। तभी वह आपके पास रहेगी।''

                 सन 1952 में देश के पहिले आम चुनाव होने थे। चुनाव के सिलसिले में नेहरु जी ने 1 दिसंबर 1951 को इंदौर में एक चुनावी सभा को संबोंधित करते हुए कहा ''आज देश के सामने तीन बुनियादी सवाल हैं। आजादी को कायम रखना, देश की एकता व ताकत को बढ़ाना और आर्थिक उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होना। इन सवालों का हल जनता के सहयोग से ही संभव है। ऐसे समय में साम्प्रदायिकता की बातें करना देश को खतरे की ओर ले जाना है।''

               नेहरु जी का विचार था कि साम्प्रदायिकता और धर्म की आड़ लेकर लोगों के बीच दरार डालना सबसे बड़ी बुराई है। यह बात नेहरु जी ने 1 दिसंबर 1951 को उज्जैन में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा ''हमारे देश में वे लोग जो समाज में किसी भी प्रकार की फेरबदल पसन्द नही करते,आज धार्मिक संस्थाओं की आड़ में जनता को मुगालता देना चाहते हैं। चुनाव के लिए जो अनेक छोटी-मोटी साम्प्रदायिक पार्टियां बनी हैं, उनके पीछे ऐसी प्रतिगामी शक्तियों का हाथ हैं। हिन्दू सेवा के पीछे आज जमींदार,जागीरदार वर्षों से सड़ी-गली और पुरानी प्रथा को बचाने का प्रयत्न कर रहे हैं, क्योंकि देश में भूमि समस्या ही प्रमुख है। और हम उसे हल कर रहे हैं।''

               समाजवाद को देश की आवश्यकता बताते हुए नेहरु जी ने मध्यप्रदेश के छोटे से शहर बुरहानपुर में कहा ''मैं यहां थोड़ी देर ठहरुंगा। सुना रखा है, आपका नगर कारीगरों का, श्रमजीवियों का नगर है। मेरी ख्वाहिश है आपसे सीधी बात करुं। हमनें पंचवर्षीय योजना बनाई है, जनता का परिश्रम आवश्यक है। समाजवाद की ओर तो देश को जाना ही है। मगर मैं चाहता हूं कि किसी भी बात को अच्छे ढंग से किया जाए।''

                  सतना में चुनावी सभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा ''मैं यह स्वीकार करता हूं कि पिछले दिनों में कांग्रेस से भारी गलतियां हुई हैं। का्रंग्रेस में भी स्वार्थी लोग शामिल थे लेकिन उनकी गतिविधियों को नियंत्रित करने के लिए चुनावों के समाप्त होने के बाद कदम उठाए जाएंगे।'' उन्होंने कहा कि इसके पहले वे विंध्यप्रदेश इसलिए नहीं आए थे क्योंकि यहां के कांग्रेस कार्यकर्ता आपस में झगड़ रहे थे, अपना समय बर्बाद करना उचित नहीं समझा।

                     इंदौर में 4 जनवरी 1957 को आयोजित एक जनसभा को संबोधित करते हुए नेहरु जी ने समाजवाद की प्रासंगिकता के बारे में विस्तृत चर्चा की। उन्होंने कहा ''समाजवाद के बारे में बहुत कुछ कहा जा सकता है। लेकिन मैं एक बात पर जोर देना चाहूंगा। पूंजीवाद का पूरा ढांचा एक प्रकार के जमाखोर समाज पर टिका हुआ है। कुछ हद तक इसकी वजह यह भी हो सकती है हम लोगों में जमाखोरी की प्रवृत्ति स्वभाव के रुप में अन्तर्निहित है। इसलिए समाजवादी समाज को जमाखोरी की इस प्रवृत्ति से मुक्त होकर उसके स्थान पर सहकारिता को अपनाने की कोशिश करना चाहिए। अगर केवल आर्थिक हालात बदलने के सीमित दृष्टिकोण से देखा जाए तो भी समाजवादी समाज के निर्माण में काफी समय लगता है।'' नेहरु जी जितने साम्प्रदायिकता के विरोधी थे उतने ही वे जातिप्रथा के भी विरोधी थे। मध्यप्रदेश में 1957 में एक आम सभा को संबोधित आपने कहा कि ''जातिप्रथा का अब देश में कोई स्थान नहीं है। यदि यह प्रथा बनी रही तो देश को कमजोर ही बनायेंगी, और देश को आगे बढने से रोकेगीं। भारत में पिछले सैकड़ों वर्षों से जाति प्रथा रही है। इसने भारत को कमजोर बनाया और उसकी प्रतिष्ठा को गिराया। इसी प्रथा ने आपसी झगड़े कराए। अनैतिकता पैदा की और देश को विदेशियों के हाथों सौंप दिया।''

                 नेहरु जी महिलाओं की आजादी के जोरदार समर्थक थे। वे पर्दाप्रथा के विरोधी थे। इंदौर में नवम्बर 1958 में एक आम सभा को संबोधित करते हुए नेहरु जी ने कहा ''मुझे तो आज क्या बचपन से ही समझ नहीं आया कि परदे में कोई कैसे रह सकता है,बलवा क्यों नहीं करता। थोड़ी बहुत रुसी हवा मुझे पहले से ही लग गई थी। लेकिन अब तक मेरी समझ में नहीं आता और मुझे कुछ गुस्सा बढ़ता है,जब मैं अपनी बहन को पिंजरे में बंद देखूं। मैं उसे पिंजरा कहता हूं। औरत यह न करे, वह न करे- न कहीं जा सके, न आ सके, यह कहां कि सभ्यता है- यह कहां कि संस्कृति है? वह बात जब खत्म हो रही है, करीब-करीब हो गई है। कहीं-कहीं राजस्थान वगैरह में अभी भी लंबे-लंबे घूंघट नजर आ जाते हैं। मैं समझता हूं कि यह मूर्खता की निशानी है। लेकिन एकदम मूर्खता नहीं जाती। क्या किया जाए?लेकिन में आपसे स्त्रियों के बारे में इसलिए कहता हूं कि एक समाज को बदलने में सब में ज्यादा बदलने की निशानी स्त्रियों में हुआ करती है,पुरुषों में नहीं। वो निशानी होती हैं समाज के बदलने की। समाज का बदलना आप स्त्रियों में देख सकते हैं।''

               नेहरु जी के इन भाषणों में उस समय के भारत की ज्वलंत समस्याओं की चर्चा है। इन भाषणों में देश को बदलने की जबरदस्त तड़प की झलक मिलती है। परन्तु जिन समस्याओं की चर्चा इन भाषणों में है वह चाहे गरीबी हो,  जातिवाद हो, साम्प्रदायिकता हो, बेकारी हो या और कोई समस्या हो, नेहरु जी देश के विकास एवं देश की समस्याओं के हल के लिए समाजवाद को आवश्यक मानते थे। पर आज तो हमने समाजवाद को ठंडे बस्ते में डाल दिया है।

? एल.एस.हरदेनिया