संस्करण: 21  मई-2012

भाजपा सरकार की हैट्रिक का सवाल

? महेश बाग़ी

               क्या भारतीय जनता पार्टी, मध्यप्रदेश में 2013 के विधानसभा चुनाव में सत्ता की 'हैट्रिक' नहीं बना सकी, तो उसका कारण मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान होंगे ? क्योंकि बड़ी शिद्दत से वाकई यह महसूस किया जाने लगा है कि यहां सरकार की 'मार्केटिंग' बेहद कमजोर है और 2013की सफलता को लेकर मुख्यमंत्री सहित सरकार में बैठे लोगों का 'आत्मविश्वास'अतिरेक के शिखर पर है। वहीं दूसरी ओर लगता है प्रदेश संगठन के अगुआ प्रभात झा की राजनीतिक सूझबूझ, तत्परता, लगन और कार्यकर्ताओं से संवाद की तकनीक व्यावहारिक धरातल पर है। क्या यह भी माना जाए कि ओरछा में प्रदेश कार्यकारिणी बैठक में आला नेताओं ने राय सरकार के बारे में जो संकेत दिए, वे मुख्यमंत्री और उनके मंत्रियों की कार्यप्रणाली और व्यवहार का दर्पण था ?यहां महासचिव और प्रदेश प्रभारी अनंत कुमार ने कहा, ''प्रदेश सरकार का काम तो ठीक है पर 'मार्केटिंग' बेहद कमजोर हो रही है। जनता से सीधे संवाद भी नहीं किया जा रहा है। संगठन महामंत्री रामलाल ने सत्ता को आत्मविश्वास के अतिरेक से बचने की सलाह दी। उन्होने कहा,''खतरा तभी होता है जब हम अधिक आत्मविश्वासी हो जाते हैं''।

               शिवराज की मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी स्वाभाविक नहीं वरन् एक दुर्घटना का परिणाम थी। उमा भारती के मुख्यमंत्री पद से हटने के बाद प्रदेश की कमान बाबूलाल गौर के हाथों में सौंपी गई। उमा भारती के विपरीत यहां बाबूलाल गौर के पद से हटने के कोई बड़े कारण नहीं थे लेकिन वे ज्यादा दिन तक मुख्यमंत्री की गद्दी नहीं संभाल पाए। अंतत: पार्टी ने तत्कालीन प्रदेशाध्यक्ष शिवराज सिंह चौहान को प्रदेश के मुखिया का पद सौंप कर सत्ता उन्हीं के हाथों में केंद्रित कर दी। प्रदेश का मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस अब 2003 वाली कमजोर पार्टी नहीं है। धीरे-धीरे ही सही मजबूत हो रहे विपक्ष का एक सीधा संदेश यह है कि 2013के विधानसभा चुनाव में प्रदेश की जनता शिवराज को 'वॉकओवर' देने की मनोदशा में नहीं होगी।  सात माह बाद शिवराज को मुख्यमंत्री बने पूरे सात साल हो जाएंगे और इतने सालों बाद भी उनकी आज भी प्रशासन पर उतनी पकड़ नहीं दिखती जितनी होनी चाहिए थी।

                 इसका सबसे अच्छा उदाहरण तब देखने को मिला जब रीवा में मलेरिया से दर्जनों बच्चे मर गए लेकिन मुख्यमंत्री को कानों कान खबर नहीं हुई। अखबार में खबर पढ़कर उन्हें इसका पता चला। इस मामले को लेकर उनकी हैरानी इन शब्दों में अखबारों की हेडिंग बनी,''रीवा में मलेरिया से बच्चे मर रहे हैं और मुझे खबर तक नहीं''। जानकार मानते हैं कि शिवराज सिंह की यही कमी उन्हें एक बेहतर राजनेता बनने से रोकती है। एक राजनेता बनने के लिए जो प्रशासनिक दक्षता चाहिए,वह उनमें नदारद दिखती है। इसी आधार पर वे अपने समकालीनों से पिछड़ जाते हैं। भाजपा के एक नेता कहते हैं, ''शिवराज भी नरेंद्र मोदी और नीतीश कुमार की तरह एक लोकप्रिय मुख्यमंत्री हैं, लेकिन जैसी पकड़ प्रशासन पर मोदी और नीतीश की है वैसी यहां नहीं दिखती''। जानकार मानते हैं कि शिवराज भी अब धीरे-धीरे नौकरशाह आधारित मुख्यमंत्री होते जा रहे हैं। इस मामले पर राजनीतिक विश्लेषकों को कहना है,''इस सरकार को भी वही नौकरशाह चला रहे हैं, जो दिग्विजय सिंह के काल में थे। वे सब आज भी सरकार की एक-एक खबर और घपले-घोटालों के सबूत दिग्विजय तक पहुंचाते हैं। ऐसे में अगर मुख्यमंत्री खुद प्रशासन को 'कंट्रोल' नहीं करते हैं तो फिर स्थिति बिगड़ती ही जानी है''। शिवराज सिंह की प्रशासनिक कमजोरी हर साल प्रदेश में होने वाली जूनियर डॉक्टरों की हड़तालों में भी दिखती है। इन डॉक्टरों की हड़ताल से हर साल लोग मरते हैं, लेकिन सालों से चली आ रही इस समस्या का सरकार अब तक कोई इलाज नहीं ढूंढ़ पाई है। पार्टी के एक पूर्व नेता कहते हैं, ''शिवराज सिंह प्रदेश और विकास को उसी चश्मे से देख रहे हैं, जिसे नौकरशाहों ने उन्हें पहनाया है''। इसी कारण हर दिन छोटे से लेकर बड़े अधिकारियों के भ्रष्टाचार (पैसे और संपत्ति के अलावा भी) की खबरों से अखबार रंगे रहते हैं। अरविंद जोशी और टीनू जोशी का उदाहरण सामने हैं। मुख्यमंत्री की नाक के नीचे काम करने वाले इन अधिकारियों ने कैसे करोडों-अरबों की अवैध संपत्ति बना ली। पटवारी से लेकर हर छोटे बडे अधिकारी के यहां आए दिन पड़ने वाले छापों में करोड़ों से कम की संपत्ति निकलती ही नहीं।  प्रशासनिक अक्षमता की एक बानगी इसे भी समझा जा सकता है कि बिजली, सड़क और पानी के जिन मुद्दों पर दिग्विजय को हराकर भाजपा सत्ता में आई, उस दिशा में भी कोई उल्लेखनीय सुधार आठ साल के दौरान दिखाई नहीं दे रहा है। अभी जब राय सरकार प्रदेश की जनता के बीच यह संदेश देने के लिए कि 'उसने कितने अच्छे काम किए हैं', एक विकास यात्रा पर निकलना चाहती थी, लेकिन विधायकों और संगठन कार्यकर्ताओं से यह फीडबैक मिलने के बाद कि बिजली, खाद न मिलने की वजह से अभी किसानों सहित बाकी जनता में काफी नाराजगी है, सरकार को यात्रा आगे बढ़ना पड़ी। सड़कों की स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि लालकृष्ण आडवाणी की जनचेतना यात्रा के मध्यप्रदेश में आने से पहले जल्दी-जल्दी में उन रास्तों को दुरुस्त किया गया,जहां से उसे गुजरना था। जहां तक कानून एवं व्यवस्था की बात है तो इस मोर्चे पर सरकार के प्रदर्शन का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दो साल से प्रदेश बलात्कार के मामले में पहले स्थान पर है। दलितों पर अत्याचार के मामले में प्रदेश पूरे भारत में दूसरे स्थान पर है। साथ ही दूसरे रायों की पुलिस के मुकाबले प्रदेश पुलिस के खिलाफ सबसे यादा शिकायतें हैं। बच्चों के खिलाफ अपराध में भी मध्यप्रदेश अव्वल है। अनुसूचित जातियों, जनजातियों को प्रताड़ित करने के मामले में भी पूरे भारत में प्रदेश ने बाकियों को पीछे छोड़ा हुआ है। इसके अलावा स्वास्थ्य के मानकों पर प्रदेश सरकार की मशीनरी बेकाम साबित हुई है। मध्यप्रदेश में 60 फीसदी से अधिक बच्चे कुपोषित हैं। आए दिन खंडवा और शिवपुरी सहित प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों से से बच्चों के कुपोषण से मरने की खबरें आती रहती हैं। जहां तक किसानी की बात है तो सरकार ने खुद इस बात को स्वीकार किया है कि प्रतिदिन चार किसान आत्महत्या कर रहे हैं। ये सारे आंकड़े वह आईना हैं,जिसमें प्रदेश सरकार के 'स्वर्णिम मध्यप्रदेश' का चेहरा बदसूरत नजर आता है।

                   जानकार मानते हैं कि हालत ऐसे ही रहे तो प्रदेश वापस 'दिग्गी युग' में लौट जाएगा और शिवराज से बेहतर यह कोई नहीं समझ सकता कि इस स्थिति में उनकी पार्टी और उन्हें क्या नतीजा देखने को मिलेगा। कुछ राजनीतिक विश्लेषक तो मानते हैं कि पार्टी ने नवंबर 2005 में एक ऐसे शख्स को सीएम बना दिया, जिसके मुख्यमंत्री बनने के बारे में किसी ने मजाक में भी कल्पना नहीं की थी। वह मुख्यमंत्री बने तो पार्टी के नेताओं ने उन्हें स्वीकार कर लिया,लेकिन धीरे-धीरे शिवराज की बढ़ती लोकप्रियता ने पार्टी में उनके विरोधियों की भी फौज खड़ी कर दी। हालांकि ऊपरी तौर पर पार्टी में सब कुछ ठीक दिखाई दे रहा है। लेकिन सतह के नीचे का उबाल गाहे-बगाहे दिख ही जाता है। शिवराज से नाराज चल रहे ये वे लोग हैं जिन्हें ये आशा थी कि देर-सबेर शिवराज एक असफल मुख्यमंत्री साबित होंगे और पार्टी फिर उन्हें मौका देगी। कुछ समय तक यह पीड़ा छिपी रही,लेकिन अब इन नेताओं को यह लग रहा है कि मध्यप्रदेश में भी पार्टी गुजरात की तर्ज पर चल रही है। अर्थात नरेंद्र मोदी की तरह ही प्रदेश में शिवराज सर्वेसर्वा बन गए हैं। पार्टी ने तो अभी से घोषणा कर दी है कि 2013 का विधानसभा चुनाव शिवराज के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। ऐसे में इन नेताओं को यह एहसास हो चला है कि शिवराज के प्रदेश में रहने तक उनका प्रोमोशन नहीं हो पाएगा। इन्हीं लोगों में से कई इन दिनों मुख्यमंत्री सहित अपनी ही सरकार की योजनाओं पर सवाल उठाते रहते हैं। पार्टी में एक तबका है जो शिवराज से नाराज चल रहा है। इसलिए नहीं कि वह गलत हैं, बल्कि इसलिए कि वह यादा लोकप्रिय हो गए हैं। ऐसे में ये तबका उन्हें नीचे गिराने की कोशिश जरूर करेगा। एक अन्य नेता कहते हैं, ''जब उमा भारती निपट सकती हैं तो फिर शिवराज क्या हैं?'' इनके अलावा भी पार्टी के कई ऐसे नेता हैं, जो सरकार में उनके साथ होते हुए भी शिवराज के 'परफॉर्मेंस'की या तो आलोचना करते हैं या फिर यह पूछने पर कि सरकार का कामकाज कैसा है, चुप्पी साध लेते हैं। शिवराज के साथ एक अन्य चुनौती उनकी अपनी खुद की छवि भी है। एक वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक कहते हैं, ''शिवराज की छवि बीजेपी में 'जननायक' की बनाई गई है। यह उनका मजबूत पक्ष होने के साथ ही एक चुनौती भी है। अर्थात जननायक माने जाने के कारण चुनाव जीतने का पूरा दारोमदार उन पर ही है। ऐसा लगता है मानो पार्टी के नेताओं ने उन्हें आगे करके खुद को जिम्मेदारी से मुक्त कर लिया है''। एक बात ये भी है कि शिवराज सिंह का भाजपा में कोई गुट नहीं है। ये पार्टी के लिए अच्छा है। हालांकि पार्टी में अपना कोई गुट न होने की बात को कई राजनीतिक प्रेक्षक उनके लिए एक खतरे की तरह देखते हैं। ऐसे ही एक राजनीतिक विश्लेषक जो सरकार के काफी करीबी माने जाते हैं, इस बारे में कहते हैं, ''यह शिवराज के लिए नुकसानदायक भी हो सकता है क्योंकि कल को अगर वे कमजोर पड़ते हैं तो कोई उनके साथ खड़ा नहीं दिखेगा''। दूसरी तरफ सरकार की कोई बहुत उपलब्धियां भी नहीं हैं जिसे वे भुना सकें। ऐसे में शिवराज के पास जो है वह सिर्फ और सिर्फ उनकी साफ-सुथरी छवि जिसे बनाए और बचाए रखना ऐसी विकट परिस्थितियों में उनके लिए चुनौती है।                   

  ? महेश बाग़ी