संस्करण: 21  मई-2012

राजनीति हो गई नौटंकी

नेता बन गये नट-जनता बजा रही तालिया

?  राजेन्द्र जोशी

               र्तमान दौर में राजनीति का सारा का सारा परिदृश्य नौटंकीमय हो गया है। जब भी संचार माध्यमों में राजनीति से संबंधित खबरें पढ़ों या देखों ऐसा लगने लगता है मानों हम सत्ता संचालकों की रात दिन की गतिविधियों में जनहित से जुड़े मसलों के प्रति गंभीरता और उनकी चिंता नहीं, बल्कि उनकी अपनी स्वयं की वाहवाही के डायलाग सुन रहे हैं। नेतागण कुछ इस ढंग से राजनीति के मंच पर अपने आपको प्रस्तुत करते हैं जैसे रंगमंच पर नौटंकी का कोई पात्र अपना बहुरुपियां स्वरूप धारण कर दर्शकों के समक्ष उपस्थित हो रहा है।

                नौटंकी और नाटकों की पारंपरिक परिभाषा ही यह है कि किसी विशेष विषय पर तैयार किए गये कथानक के आधार पर इनके पात्र अपने संवाद बोलते हैं और ऐसी कुछ अजग गजब हरकतें करते हैं जिससे दर्शक पर भावनात्मक प्रभाव पड़े, जनता उस पात्र की लीलाओं पर मनोरंजन का भाव महसूस करने लगे और तालियों की गड़गड़ाहट से पूरे पंडाल को गुंजा दे। जैसे ही तालियों की गड़गड़ाहट की ध्वनि संपूर्ण माहौल में फैलती है, नौटंकी के पात्र का हृदय फूला नहीं समाता है और अपनी इस क्षणिक प्रशस्ति पर आत्मविभोर होकर फिर वे अपनी नट की भूमिका में तल्लीन हो जाता है।

                  इस तरह की राजनैतिक नौटंकियां हम रात दिन देख रहे हैं। नौटंकी और लीलाओं की चर्चा करते हुए बरबस ही एक कविता की कुछ पंक्तियों का उल्लेख करना मौजूं होगा-

                  ''हम रात दिन ऐसी लीलाऐं देख रहे हैं

                    जिसमें राक्षस लोग

                    राम का पार्ट करते हैं

                     पर्दे के पीछे

                     ऐसे अभिनेताओं के हमने अलग ही रूप देखे हैं।

                    रात-दिन

                    उनकी लीलायें देखने में

                   हम व्यस्त हो गये हैं-

                  खल मंडली में बसने के अभ्यस्त हो गये हैं।''

                 सचमुच नौटंकी और लीलाओं के पात्रों दोहरे स्वरूप होते हैं। एक स्वरूप तो वह जिसे हम राजनीति के रंगमंच पर उनकी भूमिकाओं में देखते हैं और दूसरा स्वरूप वह जो मंच से उतरने के बाद का होता है। जिस तरह कोई नाटक का पात्र अच्छे डायलॉग बोल लेता है, अपनी कंपनी की लीला के नट के रूप में प्राम्पटिंग के आधार पर अपने शारीरिक हावभाव प्रदर्शित करने में सफल हो जाता है और अपनी कलाबाजी पर तालियां पिटवा लेता है, ठीक उसी तर्ज पर नेतागण भी अपनी पार्टियों के ऐजेंडा की थाप पर थिरकते हुए अपने रटे-रटे भाषणों के साथ अपनी शारीरिक मुद्राओं का प्रदर्शन करते हुए आम लोगों से वाहवाही बटोरने में तल्लीन देखे जा सकते हैं। किसी भी सत्य को झूठ और झूठ को अपने हित में सत्य सिध्द कर देना किसी एक्सपर्ट अभिनेता के लिए कोई कठिन और दुरूह कार्य नहीं होता। जब उसे नट की भूमिका ही करनी है तो फिर वह नेता यह नहीं देखता कि उसे अपनी भूमिका के प्रदर्शन में सच का डायलाग बोलना है या झूठ का। चूंकि नेता को अपने संवाद के जरिए किसी हकीकत को छुपाना है तो वह कुछ इस तरह से एक्टिंग करता है और संवाद बोलता है जैसे वह हरिश्चंद्र का अवतार है और बाकी की सारी दुनिया का 'सत्य' झूठा है।

               राजनीति में कौन नाटककार है कौन नट या सूत्रधार है या बेकग्राऊंड में किसी और कैसी प्राम्पटिंग चल रही है, यह मानना आज के राजनैतिक दौर में एक तरह से बेमानी होता चला जा रहा है। जनता जिसे, हम आम आदमी के संबोधन से जानते हैं, वह अब राजनीति के सच, झूठ और वास्तविकताओं के काफी नजदीक है। ऐसी जागरूक जनता के बीच में नौटंकीबाजों का चमत्कार और करिश्मा स्थाई संबंध नहीं जोड़ पाता है। किसी एक्टिंग और संवाद पर यदि जनता क्षणि पुलकित भी हो जाती है तो इसका अब यह मतलब नहीं निकाला जाना चाहिए कि नेताजी का हास्य,वीर, करुण या वत्सल्य रस में डूबा भाषण लोगों की भावनाओं की जड़े हिलायेगा। जगह-जगह हर विषयों पर कथानक तैयार हो रहे हैं नाटक खेले जा रहे हैं लीलाओं का प्रदर्शन हो रहा है। नाटकों के संवाद सुनने और नेताओं की भावभंगियां पूर्ण एक्टिंग देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ रही है। गांव-गांव में नगर-नगर की डगर-डगर में नौटंकियों के मंच सज रहे हैं। भीड़ जुटाई जा रही हैं। नेतागण नाटक के पात्रों और फिल्मी अभिनेताओं की एक्टिंग को मात देते घूमते फिर रहे हैं।

               किस तरह जनहित के मुद्दों के प्रति राजनेताओं का बेरूखीपूर्ण रवैया है, उसकी जमीनी हकीकत देखी जा सकती है। नेता परस्पर आरोप-प्रत्यारोपों की नौटंकियों में अपनी बेसिक जिम्मेदारियों और कर्तव्यों से विमुख होते जा रहे हैं। अपनी अक्षमताओं और नाकामयाबियों को छुपाने के लिए और उस पर पर्दा डालने की कवायद में राज-संचालनकर्ता लगे हुए हैं इसके लिए नौटंकी ही एक बड़ा माधयम है और उपाय बचा रहता है, सो वे कर रहे हैं। राजनीति के इस दौर में हर नेता अपने स्वार्थ और स्वयं के वजूद के प्रति चिंतित और सशंकित नज़र रहा है। विशेषकर नाटकीयता का स्वरूप तब और ज्यादा उभरकर सामने आने लगता है जब सत्ताधीशों को अपनी राजनीति के मरियल घोड़ों को दौड़ाने की चुनौती का सामना करना पड़ता है। इस बा का उल्लेख कतई आवश्यक नहीं है कि वर्तमान दौर की राजनैतिक नौटंकियों के कथानक क्या है और नट की भूमिका किस तरह से निभाई जा रही है। वर्तमान में आप, हम और वे सब जो जनता के दमदार और महत्वपूर्ण हिस्से हैं, नटरूपी नेताओं की नौटंकियां देखने में व्यस्त हो गये हैं और अजब-गजब संवाद सुनते हुए और हास-परिहास की एक्टिंग देखते हुए अपना सिर पीटने के बजाय नाटककारों को खुश रखने के लिए तालियां पीटते जा रहे हैं।

? राजेन्द्र जोशी