संस्करण: 21  मई-2012

बारदाना समस्या म.प्र. सरकार की गलत नीतियों का परिणाम

? हेमराज कल्पोनी

                   ध्यप्रदेश के किसानपुत्र कहलाने वाले मुख्यमंत्री श्री शिवराज सिंह चौहान जिनकी रूचि खेती से अधिक भूमि घोटाले, खनन एवं निर्माण के ठेकों में है, ने केन्द्र सरकार द्वारा संपूर्ण देश के लिये जारी किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य पर बोनस की घोषणा कर मिशन 2013के अंतर्गत लगातार दो वर्षों से स्वयं को किसानों का हितैषी  दिखाने की कोशिश की है लेकिन मूल रूप से वे अनाज माफियाओं के लिये कार्य कर रहे है तथा किसानों का अहित कर रहे हैं। मध्यप्रदेश में बारदाना एवं भण्डारण की वर्तमान समस्या को स्वयं राज्य सरकार ने जन्म दिया है जो मूलत:सरकार के एक ऐसे फैसले के कारण है जिसमें सरकार के सलाहकारों का मानसिक दिवालियापन एवं नौकरशाहों की चापलूसीपूर्ण मानसिकता दिखाई देती है।

                केन्द्र सरकार द्वारा फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य अथवा एम.एस.पी. निर्धारित करने का मुख्य कारण किसानों के लिये लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करना है ताकि उच्च निवेश एवं कृषि जिन्सों के उत्पादन को प्रोत्साहित किया जा सके। प्रत्येक वर्ष प्रमुख कृषि उत्पादों के लिये न्यूनतम समर्थन मूल्य (एम.एस.पी.) की घोषणा की जाती है जिन्हे कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की सिफारिशों को ध्यान में रखते हुये निर्धारित किया जाता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य की सिफारिश करते समय अन्य बातों के साथ-साथ कृषि उत्पादन निविष्ट के मूल्यों में परिवर्तन,मांग एवं आपूर्ति, बाजार मूल्य एवं जीवन लागत जैसे कारकों को ध्यान में रखा जाता है। सामान्यत: कृषि जिन्सों का मूल्य मांग एवं आपूर्ति के कारकों द्वारा निर्धारित किया जाता है। यदि उस जिन्स को पैदा करने वाले बहुत से किसान है तो वे अपने उत्पाद का कम मूल्य पाते है और यदि किसी जिन्स की मांग अधिक है तो किसान अधिक मूल्य पाने की उम्मीद रखते है। विभिन्न बाजारों में मूल्य भिन्न-भिन्न हो सकते है।

                    राज्य शासन द्वारा घोषित बोनस ने बाजार शक्तियों को, जो यह तय करती है कि किस दर पर उत्पादक का माल खरीदा एवं बेचा जायेगा, वर्तमान में गेंहू विपणन संव्यवहार से बाहर कर दिया है। व्यापारी संघ जो उपभोक्ता एवं उत्पादक के बीच की महत्वपूर्ण कड़ी है उसका मानना है कि न्यूनतम समर्थन मूल्य के ऊपर बोनस के साथ गेंहू का क्रय एवं भण्डारण करने की उन्हे बाजार इजाजत नही देता है। न्यूनतम समर्थन मूल्य पर अन्य प्रान्तों में जो गेंहू खरीदा जा रहा है उसकी उपलब्धता के कारण न तो मंहगा गेंहू व्यापारी अन्य प्रान्तों में निर्यात कर सकते है और क्षेत्रीय मांग बढ़ने पर उसके लिये उचित होगा कि वह अन्य राज्य से गेंहू क्रय कर स्थानीय मार्केंट में उपलब्ध करा दें। इस कारण व्यापारी वर्ग गत दो वर्षों से गेंहू के क्रय के प्रति उदासीन हो गया है और नतीजा यह है कि गेंहू के व्यापार में न तो निजी पूंजी का प्रवाह हो रहा है और न ही निजी भण्डारण क्षमता का उपयोग किया जा रहा है। इस वर्ष के ऑंकड़े स्पष्ट बताते है कि अनुमानित 80,000 मीट्रिक टन गेंहू में यदि 30 प्रतिशत उत्पादक के निजी उपभोग के लिये सुरक्षित रख दिया जाये तो लगभग 56000मीट्रिक टन गेंहू बाजार में विक्रय हेतु उपलब्ध होगा। जिसको शत प्रतिशत क्रय करने की जिम्मेदारी सरकार की है क्योंकि उसने अपनी गलत नीति से निजी व्यापार को बाजार से दूर कर दिया है। हम सभी जानते है कि राज्य सरकारें व्यापार के लिये नही होती है। उसे तो मात्र बाजार में आवश्यक हस्तक्षेप या उत्प्रेरक के रूप में ही प्रवेश करना चाहिये,लेकिन मध्यप्रदेश सरकार ने गेंहू की खरीदी में एकाधिकारी व्यापारी के रूप में प्रवेश किया है, जिससे न केवल राज्य सरकार की वित्तीय सेहत खराब होगी बल्कि यह भविष्य में किसानों के हितों के भी विपरीत होगा।

               मण्डी एक्ट के प्रावधानों के अनुसार किसान द्वारा बेची गई फसल का भुगतान 24 घंटों के अंदर होना चाहिये। प्रथम 24 घंटों के बाद किसानों को आगामी 5 दिनों तक 1 प्रतिशत ब्याज सहित भुगतान करने का प्रावधान है तथा 5 दिवस तक किसानों के खरीदे गये उत्पाद का भुगतान नही करने पर व्यापारी का लायसेंस निरस्त करने के नियम बनाये गये है। मध्यप्रदेश सरकार स्वयं व्यापारी बनकर क्या इन नियमों का पालन कर रही है? वर्तमान में कृषि उपज मण्डियों में गेंहूं से भरे वाहनों की कतार लगी हुई है तथा किसानों को 15-15 दिनों तक अपना माल तुलवाने के लिये इंतजार करना पड़ रहा है। किसानों द्वारा किराये पर लाये गये ट्रेक्टरों अथवा अन्य वाहनों सहित इतने लंबे समय तक इंतजार करने के लिये क्या सरकार ने उनके किराये भाड़े और मजदूरी के भुगतान का प्रावधान किया है? यदि नही तो 100 रूपये प्रति क्विंटल बोनस प्राप्त करके भी तो किसान का भारी नुकसान हो रहा है।

               राज्य शासन का कर्तव्य एवं नीति यह होना चाहिये कि वह किसानों को यह ग्यारंटी दें कि उसका कृषि उत्पादन न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे बाजार में नही बिकेगा और यदि ऐसे हालात बाजार में होते है तो वह स्वयं आगे आकर उसका उत्पादन खरीदेगी लेकिन इसके विपरीत राज्य शासन स्वयं व्यापारी के रूप में बिना किसी तैयारी के बाजार में उतर गई।  इससे एक ओर किसान बाजार द्वारा संभावित उच्च दर से वंचित रहा तथा दूसरी ओर सरकार पूंजी एवं भण्डारण की समस्या में फॅंस गई। ऐसा नही है कि यह कुचक्र किसी गलती से तैयार हो गया हो, बल्कि यह सरकार के एजेण्डे में व्यापारियों के हित साधने का एक सोचा-समझा कदम है। उपार्जन केन्द्रों पर व्यापारी अपने पास पूर्व से संग्रहित गेंहू को कृषक उत्पाद के रूप में बेचकर अतिरिक्त बोनस का फायदा उठा रहा है वहीं भविष्य में भण्डारण की समस्या के कारण खराब गेंहू को उन्ही व्यापारियों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से कम पर बेचा जाकर लाभ पंहुचाया जायेगा। इस प्रकार सरकार दोनों ओर से किसानों को ठग रही है और संघर्ष करने पर उन पर गोली चला रही है।

                दलहन का समर्थन मूल्य भारत सरकार द्वारा 3500 रूपये प्रति क्विंटल तय किया गया है जबकि प्रदेश में उड़द 2500 से 2800 रूपये प्रति क्विंटल के भाव से व्यापारियों द्वारा खरीदा जा रहा है। मध्यप्रदेश के चना उत्पादक प्रदेश होने के बावजूद मल्टीनेशनल कंपनियों और सट्टेबाजों ने किसानों से सस्ते दामों पर हजारों मीट्रिक टन चना खरीदकर राज्य के वेअर हाउस और कोल्ड स्टोरेज में भरा हुआ है। यही व्यापारी सरकार की मिली भगत से कमोडिटी एक्सचेंज के माध्यम से चने के दामों में कृत्रित वृध्दि पैदा करके वास्तविक बाजार में चने के बेतहाशा दाम बढ़ाकर लाभ कमा रहे है जिसमें सरकार के नुमाइंदे भी शामिल है।

                  यदि राज्य शासन भारत सरकार की न्यूनतम समर्थन मूल्य नीति पर कार्य करती तो व्यापारी मांग एवं आपूर्ति के सिध्दान्त के आधार पर न्यूनतम समर्थन मूल्य से ऊपर स्वयं की पूंजी, बारदाने की उपलब्धता एवं संग्रहण क्षमता का उपयोग करके गेंहू को क्रय कर सकते थे। लेकिन राज्य शासन के मूर्खतापूर्ण निर्णय ने उन्हे बाजार से बाहर कर दिया और स्वयं पूंजी, भण्डारण एवं बारदानों की समस्या में फॅंस गई। यदि राज्य सरकार किसानों को बोनस की जगह उनके उत्पादन पर 100 रूपये प्रति क्विंटल प्रोत्साहन राशि देती तो उक्त राशि आसानी से किसानों के राजस्व अभिलेखों के आधार पर औसत उत्पादन से गणना कर उनके खातों में सीधे जमा की जा सकती थी जिससे न तो बाजार अव्यवस्थित होता और न ही किसानों को आत्महत्या के लिये मजबूर होना पड़ता। मध्यप्रदेश सरकार जो मूलत: भाजपा समर्थित व्यापारी वर्ग एवं बिचौलियों के भ्रष्ट गुट से संचालित है, उसके मुख्यमंत्री किसान पुत्र होने का मुखौटा पहनकर संगठित भ्रष्टाचार कर रहे है।

? हेमराज कल्पोनी

   विधायक, राजगढ़, म.प्र.

(लेखक मध्यप्रदेश विधानसभा के सदस्य है एवं लेख में प्रकट विचार उनके व्यक्तिगत है।)