संस्करण: 21  मई-2012

'सत्यमेव जयते' और आमिर खान की प्रतिबध्दता के बहाने...

? डॉ. गीता गुप्त

                     सिने जगत के प्रसिध्द अभिनेता आमिर खान की सामाजिक प्रतिबध्दता दर्शाने वाले कार्यक्रम 'सत्यमेव जयते' की इन दिनों खांसी चर्चा है। लेकिन मैं सोच रही हूं कि कन्या भ्रूण हत्या और बच्चों के यौन शोषण पर केन्द्रित 'सत्यमेव जयते' की पिछली दोनों कड़ियों में सर्वथा नवीन अथवा हतप्रभ कर देने वाली बात क्या है ? कन्या भ्रूण हत्या का हृदयविदारक सत्य और उसके आंकड़े क्या पहली बार उजागर हुए है ?कौन नहीं जानता कि संतान के जन्म से पूर्व लिंग परीक्षण समृध्द वर्ग ही करवाता है और सर्वाधिक कन्या भ्रूण हत्या भी उक्त वर्ग में ही होती है ?प्रति वर्ष दस लाख कन्या भ्रूण हत्या का आंकड़ा आमिर की शोध का परिणाम नहीं है।

               बात करें 'सत्यमेव जयते' की दूसरी कड़ी की, जिसमें बाल्यकाल में यौन शोषण के शिकार युवक-युवती, उनके परिजन और मनोविश्लेषक के साथ संवाद के माध्यम से वस्तु-सत्य के साक्षात्कार ने दर्शकों को भावविव्हल कर दिया और अंत में अभिनेत्री श्रीदेवी की उपस्थिति से कार्यक्रम का आकर्षण तो बढ़ा ही दर्शक भी धन्य हो गए। मगर यह मुद्दा भी नया नहीं है। घर, बाहर, विद्यालय खेल के मैदान व धार्मिक स्थल और माता-पिता, पड़ोसी व रिश्तेदार आखिर कहां और कौन गारंटी दे सकता है आज बच्चों के सुरक्षित जीवन की ?रोज ही रिश्ते कलंकित हो रहे हैं। हर साल बाल दिवस (14 नवंबर), श्रमिक दिवस (1 मई) और अन्तर्राष्ट्रीय बाल सुरक्षा जीवन (1 जून) के अवसर पर बच्चों के मौलिक अधिकारों एवं उनकी सुरक्षा पर राष्ट्रव्यापी चिंतन किया जाता रहा है। परिणामत:इस मुद्दे पर लंबे समय से एक विधेयक केन्द्रीय मंत्रिमंडल में विचाराधीन है जो निकट भविष्य में कानून का रूप लेकर बच्चों की समस्याआें के लिए समाधानकारक हो सकता है।

                आमिर खान ने राजस्थान के मुख्यमंत्री से मिलकर वहां की सरकार को कन्या भ्रूण हत्या के मामलों की सुनवाई के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट शुरू करने के लिए राज़ी कर लिया है। अब वे केन्द्र सरकार को पत्र लिखकर यौन शोषण से बच्चों की रक्षा के लिए कानूनी प्रावधान की हिमायत करेंगे और हो सकता है कि इसमें भी सफल हो जाएं। निश्चय ही, यह बच्चों के लिए हितकर होगा। यहां सवाल यह है कि समाज में व्याप्त विसंगतियों, क्रूरताओं, अन्याय या अत्याचार के प्रति क्या हम तभी संवेदनशील और सजग होंगे जब कोई सेलिब्रिटी हमें जगायेंगा ?क्या कन्या भ्रूण हत्या और बच्चों के यौन शोषण सहित तमाम सामाजिक बुराइयों के विरूध्द हम तभी सक्रिय होंगे जब कोई चर्चित हस्ती मनोरंजन चैनल के माध्यम से हमें इस दिशा में सोचने के लिए बाध्य करेगी ?क्या इसका मतलब यह नहीं होगा कि हमारी संवेदनाएं भोथरी हो चुकी हैं और हम अपने सीमित संसार के दायरे से बाहर निकलकर राष्ट्रव्यापी संदर्भों में कुछ भी देखने-सुनने,सोचने समझने की जहमत तक नहीं उठाना चाहते ?यदि यह सच है तो क्या यह शर्मनाक नहीं ?

               आमिर की सामाजिक प्रतिबध्दता पर प्रश्नचिन्ह नहीं लगाया जा सकता। उन्होंने 'तारे जमीं पर', 'थ्री ईडियट्स' 'रंग दे बसंती' और 'लगान' जैसी फिल्में बनाकर मनोरंजन के माध्यम से जनता को झकझोरने का कमाल कर दिखाया है और ज्वलंत सामाजिक मुद्दों के प्रति अपनी संवेदनशीलता साबित कर दी है। 'सत्यमेव जयते' के जरिये भी वे यही कर रहे हैं। इस कार्यक्रम की आगामी कड़ियों में भी वे विभिन्न सामाजिक विडंबनाओं के प्रति अपनी चिंता दर्शकों के साथ साझा करते हुए समाधान की दिशा में कोई सकारात्मक पहल करते हुए दिखाई दें तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए। लेकिन ध्यान रहे कि आमिर एक एक्टर हैं एक्टिविस्ट नहीं। उनका काम मनोरंजन करना है,सुधार करना नहीं। उन्होंने स्वयं भी यह स्वीकारा है । इसलिए वास्तविक जिम्मेदारी तो हमारी है-समूचे राष्ट्र के प्रत्येक नागरिक की।

               हमें सोचना चाहिए कि समाज में ऐसी शर्मनाटक घटनाएं क्यों घट रही हैं ? आदमी हैवान क्यों बनता जा रहा है ? उसकी इंसानियत कहां खोती जा रही है ? हर सामाजिक बुराई का उन्मूलन कानून से संभव नहीं है। हमें बुराई की जड़ की तलाश कर उसे समूल नष्ट करना होगा। अपराधी हमारे आसपास की बसते हैं,उन्हें पहचानकर ऐसे क़दम उठाने होंगे जिनसे वे हतोत्साहित और विफल हों।

               निस्संदेह दृश्य-श्रव्य माध्यम की लोकप्रियता और प्रभविष्णुता अपार है। छोटे या बड़े पर्दे पर दिखायी जाने वाली चीज़ें आसानी से आमजन के हृदय में जगह पा लेती हैं। अतएव यह माध्यम वैचारिक क्रांति के उद्देश्य की पूर्ति में सहायक हो सकता है। आमिर इस सत्य से सुपरिचित हैं इसीलिए उन्होंने छोटे पर्दे का सदुपयोग किया है, जो पूरी तरह सामाजिक बदलाव भले ही न ला सके मगर समाज की चेतना को अवश्य झकझोरेगा। चिंताजनक यह है कि प्रिंट मीडिया, लेखक और बुध्दिजीवी, जो समाज की सच्चाईयों से देश, समाज और सरकार का अनवरत् साक्षात्कार करवाते हैं, जनता उनकी आवाज़ क्यों अनसुनी कर देती है ? वह कैसे तटस्थ रह पाती है ? क्या कोई क्रिकेटर या अभिनेता ही मुद्दों को उठायेगा तभी जनता को समस्या की गंभीरता का बोध होगा। ?

               ध्यान रहे कि सेलिब्रिटी सामाजिक मुद्दों को पर्दे पर उठाने की पूरी क़ीमत वसूल लेते हैं। कोई भी चैनल या कलाकार मुफ्त में यह काम नहीं करता। हैरत की बात यह है कि घटना के वास्तविक पात्र समाचार के रूप में स्क्रीन या प्रिंट मीडिया में स्थान पाने पर भी जनता की सहानुभूति नहीं बटोर पाते,लेखकों/पत्रकारों के शब्द उनकी अन्तश्चेतना को नहीं जगा पाते जबकि सेलिब्रिटी उनकी आंखें नम करने में सफल हो जाते हैं। यह बहुत गंभीर संकेत है।

                 यह भी विचारणीय है कि क्या मनोरंजन जगत के सितारे सामाजिक चेतना की मशाल लेकर दूर तक और देर तक चल पायेंगे ? बांग्लादेशी लेखिका तसलीमा नसरीन की चिंता भी यही है। सामाजिक मुद्दों पर फिल्मी सितारो की भूमिका से वे नाराज़ हैं क्योंकि यह एक फैशन बन गया है। उनका मानना है कि ये सितारे जिस क्षेत्र की महज़ सतही जानकारी रखते हैं उसके बावजूद उसमें हस्तक्षेप कर सुर्खियां और धन दोनों बटोर रहे हैं। टेलीविजन चैनल भी इसी बहाने लाभ कमा रहे हैं। बेशक आमिर एक अपवाद हैं। वे धन के लिए छोटे पर्दे के मोहताज नहीं। मगर दर्शकों और आम जनता को अपने गिरेबां में झांकने की ज़रूरत निश्चित रूप से है। क्या उनकी स्वत: स्फूर्त कोई सामाजिक प्रतिबध्दता नहीं ?

               
? डॉ. गीता गुप्त