संस्करण: 21  मई-2012

दुनिया के अंत की भविष्यवाणियाँ और उनके पीछे का सच

? राहुल शर्मा

               जाने-माने लेखक विक्टर ह्यूगो ने समय के बारे मैं कहा था कि समय की संकल्पना दुनिया की सभी सेनाओं से कई गुना ताकतवर है, यह एक विचार है जिसका कि अब समय आ गया है समय की प्रकृति के विषय मैं कई सवालों के उत्तर ढूँढने मैं अभी भी काफी समय लगेगा जैसे कि समय क्या है? समय का क्या कारण है? समय गुरुत्व को धीमा क्यों कर देता है? समय गति मैं धीमा क्यों होता है? क्या समय एक आयाम है? अरस्तू ने अनुमान लगाया कि समय शायद गति है...लेकिन फिर उन्होंने यह भी कहा कि हो सकता है गति धीमी या तीव्र हो लेकिन समय ऐसा नहीं होता। अरस्तू को यह अवसर नहीं मिला कि वे आइंस्टीन के युग मैं होते और उनके सापेक्षता सिद्धांत से रूबरू होते जिसमें समय भी परिवर्तनों के अधीन हो जाता है। समय की संकल्पना ने केवल दार्शनिकों, गणितज्ञों व भौतिकविदों को ही बेचौन नहीं किया बल्कि इसकी अपनी तरह की अवैज्ञानिक व्याख्याओं ने आम लोगों को भी हलकान कर दिया जो आये दिन होने वालीं तमाम आधारहीन भविष्यवाणियों से आज भी जारी है। इनमें से एक भविष्यवाणी जो कुछ कुछ अरसे बाद रंग-रूप बदल कर बार बार की जाती है वो है दुनिया के अन्त की।

               मानव समाज की व्यवस्थाएं व परिस्थितियां अगर मानव केन्द्रित ना रहकर पूंजिकेंद्रित हों तो मनुष्य का स्वयं को असुरक्षित व शंकालु होने से बचा पाना बड़ी मुश्किल की बात साबित होती है जिसका फायदा विज्ञानं विरोधी ताकतें बखूबी उठाना जानती है। अब सूचना तकनीक के युग मैं उनका ये मनुष्य विरोधी विचार जल्दी ही अपना लक्ष्य पा जाता है। इसिलए यह स्थापित तथ्य है कि पूंजीवाद तकनीक को गले लगता है और विज्ञान व वैज्ञानिक चेतना को हमेशा हतोत्साहित करता है।

                खैर, हाल ही मैं आई खबर दुनिया के अंत की भविष्यवाणी पर भरोसा कर रहे लोगों के लिए अच्छी नहीं है। माया सभ्यता का एक और लेकिन अभी तक का सबसे प्राचीन कलैंडर मिलने का दावा किया जा रहा है जिसके मिलने के बाद ऐसा लगता है कि 2012 दुनिया का आखिरी साल नहीं होगा। जिस माया सभ्यता के कैलेंडर की दुहाई देकर इस वर्ष दुनिया का अंत होने की भविष्यवाणियां की जा रही थीं,उसी के बनाए एक अन्य कैलेंडर ने इन आशंकाओं पर विराम लगा दिया है। ग्वाटेमाला के जंगलों में मिले माया कैलेंडर के अब तक के सबसे पुराने संस्करण के मिलने से साफ है कि मानव सभ्यता अगले कई अरब वर्षो तक बनी रहेगी। कम से कम कुछ लाखों साल तक तो पृथ्वी के अंत का कारण बनने वाली कोई भी प्रलयंकारी आपदा नहीं आने वाली।

                   दरअसल काल या समय की गणना करने के हर युग के अपने तरीके लोगों ने तब की समझ के आधार पर गढे जो बदलते समय के साथ नई नई खोजें होने पर परिष्कृत होते गए। 3761 ई. पू. यहूदी कलेंडर शुरू हुआ इसके उपरांत दुनियाभर मैं कई तरह के कलेंडर आये और गए। दुनिया के ज्यादातर देश आज ग्रेगोरियन कलेंडर से अपने समय का निर्धारण करते हैं। जिन तमाम सभ्यताओं जैसे चायनीज, हिब्रू, हिन्दू, इस्लामिक, इत्यादि ने अपने कलेंडर निकाले उनमे माया कलेंडर भी एक रहा होगा। माया लोग आज के मेक्सिको के युकाटन क्षेत्र के निवासी थे जो स्पेन के दखल से 16 वीं सदी मैं छिन्न-भिन्न होगये। उनके बारे मैं अब कुछ अवशेषों से ही पता चलता है। कहा जाता है कि उनके कलेंडर मैं 18 माह होते थे और 20 दिन का एक माह।

                 आ रही जानकारी के मुताबिक पूर्वोत्तर ग्वाटेमाला में माया सभ्यता के प्राचीन शहर शूलतुन में पुरातत्वविदों ने एक पुराने घर की दीवारों पर बनी एक पेंटिंग ढूंढने का दावा किया है जिसे माया सभ्यता के सबसे पुराने कलैंडर के रूप में देखा जा रहा है। यह तस्वीरें न केवल गणितीय और ऐतिहासिक रूप से अहम है बल्कि इससे माया सभ्यता के जीवन की एक अनूठी झलक मिलती है। इस शोधकार्य को अंजाम देने वाले बोस्टन विश्वविद्यालय के पुरातत्वविद विलियम सैटनरे का मानना है कि माया सभ्यता के पुरोहित दरअसल ब्रह्ममांडिया समय को समझने का प्रयास कर रहे थे और यही वह जगह है जहां वे इन गणनाओं को अंजाम दिया करते होंगे।

                उल्लेखनीय है कि शूलतुन के जंगलों में माया सभ्यता का एक महत्वपूर्ण शहर होने के बारे में पहली बार 1915 में पता चला था। इसके बाद यहां चोरों ने कई बार सेंध लगाने का प्रयास किया। प्रोफेसर सैटनरे के छात्र मैक्स चेम्बरलिन ने जब 2010 में एक सुरंग से जाकर यहां कुछ भित्तिचित्रों के होने का पता लगाया तो पूरी टीम खुदाई में जुट गई और उन्होंने सदियों से गुमनामी में खोए माया सभ्यता के इस प्राचीन शहर को ढूंढ निकाला। यह पूरा शहर 16 वर्गमील में फैला हुआ है और इसे पूरी तरह से खोदकर बाहर निकालने के लिए अगले दो दशकों का समय भी कम है।

                जब पूरा शहर अभी सामने ही नहीं आया फिर भी ऐसी आधारहीन भविष्य के अंत की बातें कैसे? कौन हैं जो इस तरह की गप्पों को प्रसारित करने को लालायित रहते हैं? ऐसा भी कहा जा रहा है कि दीवार पर बनी पेंटिंग्स में एक लगभग आधे वर्ग मीटर आकार का कैलेंडर है जिसे वैज्ञानिक अब तक मिला सबसे पुराना माया कैलेंडर बता रहे हैं। इस कैलेंडर में कई वर्षो के लिए समय की गणना की गई है और यह कम से कम 7000 साल आगे तक जाता है। जाहिर है 2012 का प्रलय इन मायावासियों के दिमाग में नहीं था। साथ ही इन गणनाओं के आधार पर लाखों-करोड़ों वर्ष आगे तक की भविष्यवाणियां की जा सकती हैं। यह नया कैलेंडर पत्थर की एक दीवार में तराशा हुआ है जबकि 2012 मे दुनिया के अंत की भविष्यवाणी करने वाले सभी माया कैलेंडर पुरानी पांडुलिपियों में मिलते हैं। दुनिया के अंत की घोषणा करने वाले सभी कैलेंडर इस पाषाण कैलेंडर से कई सौ वर्ष बाद तैयार किये गए थे ऐसा प्रचारित किया जाता है। ज्यादातर छद्म-विज्ञानी व ज्योतिषी ही इस तरह की बकवास करते पाए जाते हैं पर अब कुछ टीवी चौनल इस तरह की बेवकूफियों को प्रसारित कर लोगों को अवैज्ञानिकता की खाई मैं धकेलने की ही शर्त पर शुरू हुए हैं।

                 कुल मिलाकर सन 2012 मैं दुनिया के खत्म होने या कई हजार साल तक दुनिया के अस्तित्व मैं बने रहने की बातें करने वाले उन अवैज्ञानिक, अतार्किक और आधारहीन शिविरों से हैं जो रुढ़िवादी, पूंजीवादी और गरीब मुल्कों मैं खूब ताने जाते हैं जिन पर हमें कान लगाने या धयान देने की जरुरत नहीं। हमें ये सोचने,जानने व समझने-समझाने की जरुरत है कि यदि दुनिया जल्दी खत्म होगी तो सिर्फ समाज की अपनी व्यवस्थाजनित खुदगर्जी व लालच से और बची रहेगी तो सिर्फ और सिर्फ उसके बारे मैं सोचने और उसे खूबसूरत बनाने के प्रयासों से।

? राहुल शर्मा