संस्करण: 21  मई-2012

जरुरी है निजी स्कूलों पर कानूनी सख्ती

? सुनील अमर

                 देश में सरकारी स्कूलों से कहीं ज्यादा निजी स्कूलों की संख्या है। सच्चाई यह है कि यदि निजी स्कूल न हों तो सबको स्कूल मयस्सर ही नहीं हो सकते। इसी के साथ एक कड़वा सच यह भी है कि जो थोड़ी बहुत पढ़ाई हो रही है,वह इन्हीं तथाकथित नर्सरी स्कूलों की ही बदौलत है। सरकारी प्राथमिक स्कूलों का आलम यह है कि उसमें पढ़ाने वाले अध्यापक भी अपने बच्चों वहॉ न पढ़ाकर निजी स्कूलों में ही पढ़ाते हैं। यह और बात है कि छात्रों को मिलने वाली सरकारी सुविधाओं को लेने के लिए वे अपने बच्चों का नाम उस सरकारी स्कूल में भी लिखाये रहते हैं। इस प्रकार निजी स्कूल जनता के लिए उसी तरह आवश्यक हो गये हैं जैसे निजी अस्पताल व डॉक्टर। सैध्दान्तिक तौर पर देखा जाय तो यह किसी भी शासन-प्रणाली की विफलता है कि वह अपने नागरिकों की रोटी, कपड़ा, मकान और शिक्षा, स्वास्थ्य व सुरक्षा जैसी मूलभूत आवश्यकताओं को भी पूरा न कर उन्हें बाजार के भरोसे छोड़ दे लेकिन देखने में यही आ रहा है कि हमारी जैसी ही शासन-प्रणाली अपनाये हुए दुनिया के तमाम विकसित देशों में भी उक्त मूलभूत आवश्यकताओं के लिए जनता को निजी क्षेत्र के ही भरोसे छोड़ दिया गया है। इस प्रकार हम यह कह सकते हैं कि ऐसा होना लोकतांत्रिक प्रणाली की आवश्यक परिणति ही है। चिंतनीय यह है कि शिक्षा जैसे अतिमहत्त्वपूर्ण क्षेत्र को व्यवसाय में बदल देने के कई खतरनाक नतीजे निकलते हैं जो किसी व्यक्ति को ही नहीं समाज,संस्कृति व देश को भी प्रभावित करते हैं, क्योंकि एक व्यक्ति में आचार-विचार-संस्कार-व्यवहार और ज्ञान के नाम पर जो कुछ भी होता है उसके मूल में शिक्षा ही होती है।

                गत सप्ताह दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्त्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा कि सरकारी सहायता न पाने वाले लेकिन मान्यता प्राप्त स्कूलों को भी पॉचवे वेतन आयोग की संस्तुतियों को लागू करना ही पड़ेगा। दिल्ली के एक निजी स्कूल के अध्यापकों ने न्यायालय में दरख्वास्त की थी कि उन्हें भी उक्त संस्तुतियों का लाभ मिलना चाहिए। अदालत की एक सदस्यीय पीठ ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में निर्णय दिया तो प्रतिपक्षी यानी स्कूल प्रबंधन ने उसके विरुध्द अपील की और तर्क दिया कि जब वह स्कूल सरकारी सहायता नहीं लेता तो वह पाँचवें वेतन आयोग की संस्तुतियों को लागू करने के लिए कैसे बाध्य है। इस पर कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ए.के. सीकरी की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने उक्त आदेश दिया। निजी स्कूलों में जिस तरह दिनों-दिन लूट-खसोट की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है वह चिंतनीय है और इसकी चपेट में आकर अब वह उच्च मध्यम वर्ग भी कराहने लगा है जिसके अहं की तुष्टि के लिए ऐसे विद्यालय अस्तित्व में आये थे। आज जिस किसी के भी बच्चे निजी स्कूलों में पढ़ रहे होंगें वह जानता होगा कि प्रवेश कराने से लेकर परीक्षा पास कर लेने तक कैसे ये निजी स्कूल वाले नये-नये तरीके और बहानों से अभिभावकों का शोषण करते हैं। ऐसी ही लूट-खसोट के खिलाफ उत्तर प्रदेश में कुछ अभिभावकों ने वहॉ के उच्च न्यायालय में जब याचिका की तो अप्रैल 2007 में अदालत ने प्रशंसनीय  और बहुप्रतीक्षित आदेश दिया कि ''शिक्षा संस्थाओं द्वारा अभिभावकों को कॉपी, किताब व ड्रेस किसी खास दुकान से खरीदने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा। पॉच साल से पहले कोई स्कूल अपने यहॉ चलने वाली यूनीफॉर्म नहीं बदल सकेंगें। ड्रेस बदलने के फैसले से एक साल पहले अभिभावकों को इसकी सूचना देनी होगी। फीस के लिए किसी भी छात्र को किसी बैंक में खाता खोलने के लिए बाध्य नहीं किया जाएगा।''लेकिन सच्चाई यही है कि हमारे लचर और भ्रष्ट प्रशासन के कारण ऐसे आदेशों की अनदेखी होती रहती है और शिकायत करने वाले भी एक हद के बाद थक-हार कर बैठ जाते हैं क्योंकि तब तक ऐसे शिकायतकर्ताओं से साम-दाम-दंड-भेद से ये निजी विद्यालय प्रबंधक निपट चुके होते हैं।

                   इसी के साथ-साथ वहाँ काम करने वाले लोगों का भी शोषण एक आम बात है। हम जानते हैं कि सरकारी स्कूलों के मुकाबले कई गुना ज्यादा फीस लेने के बावजूद प्राय: ये निजी स्कूल अपने कर्मचारियों को सरकारी वेतन का चौथाई भुगतान भी नहीं करते। निम्न-मध्यम दर्जे के इन स्कूलों में काम के घंटे भी प्राय:तय नहीं होते और पढ़ाई समाप्त होने के बाद भी अध्यापकों से कई तरह के काम लिए जाते हैं जिनमें विद्यालय की प्रबंध व्यवस्था से सम्बन्धित कार्य तथा स्कूल में पढ़ रहे बच्चों के घर-घर जाकर उनके अभिभावकों से मिलना आदि शामिल रहता है। इस प्रकार एक अध्यापक को अक्सर ही 12घंटे से अधिक काम करना पड़ता है और उनका वेतन नगण्य बल्कि शर्मनाक ही रहता है। बहुत से ऐसे शिक्षण संस्थान जिन्हें अच्छे स्तर का माना जाता है वे सरकार से अनुदानित ही नही होना चाहते। वे अपने प्राथमिक,माध्यमिक और उच्चतर माध्यमिक स्कूलों के लिए सिर्फ मान्यता ही लेते हैं। उनकी चालाकी ये होती है कि सरकार से अनुदान लेने पर उन्हें अपने संस्थान की फीस भी व कर्मचारियों का वेतन आदि सरकारी ढ़ॉचे के हिसाब से करना पड़ेगा जबकि सरकारी अनुदान न लेने पर वो फीस आदि अपने हिसाब से लेने को स्वतंत्र होते हैं। इसी चालाकी पर दिल्ली उच्च न्यायालय के उक्त फैसले ने रोक लगाते हुए कर्मचारियों को राहत दी है।

                  संविधान में जहॉ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार है उसी में विचारों के प्रचार-प्रसार का भी अधिकार निहित है। इसी अधिकार से शिक्षण संस्थानों की भी उत्पत्ति होती है। देश में लम्बे समय से न्यूनतम मजदूरी कानून लागू है तथा अभी पिछले दिनों अदालतों ने भी मनरेगा आदि के सिलसिले में दैनिक मजदूरी की नयी न्यूनतम दरें निर्धारित की हैं लेकिन अफसोस है कि मजदूरों के लिये तय की गयी ये दरें भी इन निजी स्कूलों के शिक्षकों को मयस्सर नहीं हैं। आज स्थिति यह है कि एक तथाकथित अच्छे शिक्षण संस्थान में पढ़ाने वाला अध्यापक अपने बच्चे को उसी संस्था में नहीं पढ़ा सकता क्योंकि उसे इतना वेतन ही नहीं मिलता। ये और ऐसी अनेक स्थितियाँ इन शिक्षकों में स्थायी कुंठा पैदा कर देती हैं जो छात्रों पर हिंसा से लेकर उसके पारिवारिक विघटन या अन्य असामाजिक कार्यो के रुप में दिखायी पड़ती हैं। कैसा भी निजी संस्थान हो वह कभी भी घाटे में नहीं चलता। घाटा हो और फिर भी चलता रहे तो वह निश्चित ही सरकारी संस्थान होगा। ऐसे में छात्रों-अभिभावकों से लेकर अपने कर्र्मचारियों तक का शोषण कर रहे इन निजी शिक्षण संस्थानों को कानून के नीचे लाकर इस बात के लिए बाध्य किया ही जाना चाहिए कि वे एक निश्चित योग्यता/कार्य के लिए तय किये गया न्यूनतम वेतन हर हाल में अपने कर्मचारियों को दें। यह तर्क दिया जा सकता है कि ऐसी सख्ती होने पर ये संस्थान अपनी फीस और बढ़ा देंगें लेकिन उसे नियंत्रित करना भी राज्य का ही दायित्व है। कार्य और परिलब्धियों की यह विसंगति सिर्फ शिक्षा के ही क्षेत्र में नहीं है। निजी क्षेत्र में यह एक आम बात है और इसके लिए कानून का लचर क्रियान्वयन ही जिम्मेदार है।

? सुनील अमर