संस्करण: 21  मई-2012

नितिन गडकरी के हसीन सपने

?     सुभाष गाताड़े

                संघ-भाजपा परिवार में शामिल लोगों का हास्यबोध आम तौर पर बाकी लोगों की तुलना में कम होता है, यह तो जानी हुई बात है। मुमकिन है कि दशकों तक बड़ी मोहरी वाली हाफ पैण्ट और सफेद कमीज पहने हुए और उसी किस्म की विचित्र ड्रेस में हाजिर प्रचारकों के बौध्दिकों की घूंट पीते हुए सभी कुछ नीरस हो जाता हो।

               बहरहाल, संघ सुप्रीमो मोहन भागवत के आशीर्वाद से देश की प्रमुख विपक्षी पार्टी का अध्यक्ष बने नितिन गडकरी -जिन्हें उन्हीं की नज़रे इनायत की वजह से दुबारा पद पर बने रहने का मौका मिलनेवाला है,जिसके लिए भाजपा अपना संविधान तक बदलनेवाली है- ने पिछले दिनों गुवाहाटी की अपनी तकरीर में चन्द बातें ऐसी कह दीं कि वहां जुटे मीडिया के लोग भी अपनी हंसी दबा नहीं सके। एक तो उन्होंने भाजपा को देश की सबसे अनुशासित पार्टी कहा, यह भी दावा किया कि वहां राजनीतिक जीवन में शुचिता का सबसे अधिक पालन होता है, अन्तत: उन्होंने यह भविष्यवाणी भी की 2014 में भाजपा अपने सहयोगियों के साथ हुकूमत में लौट रही है।

               बेहतर होता वह इन दावों को करने के पहले आंख मूंद कर अपनी पार्टी की विभिन्न सूबाई इकाइयों में मची उठापटक और केन्द्रीय नेतृत्व को ठेंगा दिखाने की बेकाबू हो रही प्रवृत्ति पर गौर करते,जिसे उनकी सदारत में गोया चार चांद लग गए हैं। उधर वसुन्धरा राजे संघ के आदमी गुलाबचन्द कटारिया के खिलाफ राजस्थान में तलवार भांजती दिखी हैं, तो दूसरी तरफ दक्षिण के सूबे कर्नाटक में पूर्वमुख्यमंत्री येदियुरप्पा मुख्यमंत्री सदानन्द गौड़ा, अनन्त कुमार आदि के खिलाफ ताल ठोके हुए हैं और उन्हें गद्दी नहीं सौंपी गयी तो सरकार गिराने की खुलेआम धमकी दे रहे हैं। गुजरात के पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल नरेन्द्र मोदी के खिलाफ जनवरी माह से माहौल बनाने में लगे है और कह रहे हैं कि इस शासन में लोग बहुत डरे हैं और वही नरेन्द्र मोदी खुलेआम केन्द्रीय नेतृत्व की नाफरमानी कर रहे हैं। सितम्बर माह में भी राष्ट्रीय कार्यकारिणी से गैरहाजिर रह कर गडकरी के कदमों के प्रति अपने ऐतराज जतानेवाले मोदी अगले माह होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से भी अनुपस्थित रहनेवाले हैं। याद रहे कि विधानसभा के लिए सम्पन्न चुनावों में केन्द्रीय नेतृत्व गुहार लगाता रहा, मगर मोदी एक बार भी कहीं प्रचार के लिए नहीं निकले।

                 केन्द्रीय कहे जानेवाले नेतृत्व की अपनी दरारें हैं, जिसमें हर कोई दूसरे की टांग खिंचाई की कोशिश में लगा रहता है।  सुषमा स्वराज्य शिकायत करती रहती हैं कि जेटली उनके खिलाफ मीडिया में कुछ कुछ बोलते रहते हैं और जेटली तने दिखते हैं कि सुषमा हर जगह हावी दिखती है। वसुन्धरा राजे को मिलती रही आडवाणी की शह की बात विदित है, लाजिम है संघ की तरफ से नियुक्त किए गए गडकरी ने अगर गुलाबचन्द कटारिया की यात्रा को हरी झंडी दे दी तो उधर राजे के जरिए दूसरी चाल चली गयी। अभी जबकि 2014 के चुनावों को दो साल देरी है, मगर भाजपा के अन्दर प्रधानमंत्री पद के पांच छह प्रत्याशी चल रहे हैं, जो आंकड़ा आगे बढ़नेवाला है।

               कुल मिला कर अनुशासन के नाम पर भाजपा एक ऐसे कुनबे की तरह दिखती है, जिसमें आपस में निरन्तर, विभिन्न स्तरों पर लठ्ठम लठ्ठा चल रहा हो, वाजपेयी की बीमारी और संघ के लिए आडवाणी की बढ़ती अप्रासंगिकता ने इस दृश्य को पैदा करने में महति भूमिका निभायी है।

               और जहां तक सार्वजनिक जीवन में शुचिता का सवाल है तो कम से कम संघ-भाजपा के अग्रणियों के बारे में बात करना कहीं से मुफीद नहीं जान पड़ता। अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ है उनकी पार्टी के पूर्व अध्यक्ष बंगारू लक्ष्मण पार्टी दफ्तर में ही रक्षा सौदे में ली गयी दलाली के लिए सलाखों के पीछे चले गए हैं,खुद नितिन गडकरी झारखण्ड के राज्यसभा चुनावों में उतारे अपने खासमखास प्रत्याशी अंशुमान मिश्रा (जिस चुनाव को बाद में रद्द करना पड़ा) की विवादास्पद छवि के चलते संगठन के अन्दर बुरी फजीहत झेल चुके हैं, कर्नाटक में भाजपा की सत्ता सम्भाले येदीयुरप्प्पा को भ्रष्टाचार के कारण पहले ही इस्तीफा देना पड़ा था, मगर अब कुछ अन्य मुकदमे भी चलनेवाले हैं और तमाम साधनशुचिता के बावजूद भाजपा में यह हिम्मत नहीं है कि वह उन्हें पार्टी से निकाल दे, तीन साल पहले पार्टी के केन्द्रीय दतर से गायब चन्द करोड़ रूपए का मामला भी नए सिरे से सूर्खियां बनता दिख रहा है, और पार्टी का एक मॉडल मध्य प्रदेश बेईमान नौकरशाहों को शह देते सियासतदानों के चलते मुल्क भर में अलग किस्म की शोहरत हासिल कर रहा है, जहां चपरासी के घर से 25 करोड तो विभाग के इनचार्ज के घर से 50 करोड़ रूपए बरामद होते दिख रहे हैं और लोग यह सवाल उछाल रहे है कि फिर मिनिस्टरों के घरों से क्या डॉलरों की पेटियां मिलेंगी ?

                 वैसे सुप्रीमो मोहन भागवत ने जब पहली दफा यह फतवा जारी किया था कि 'दिल्ली 4' अर्थात आडवाणी के करीबी कही जा सकनेवाली दिल्ली की चौकड़ी - सुषमा स्वराज्य, अनन्त कुमार, अरूण जेटली और वेंकेया नायडू - में से कोईभी भाजपा अध्यक्ष नहीं बनेगा और जिसके लिए सबसे सुयोग्य उम्मीदवार नितिन गडकरी हैं, तभी लोगों की त्यौरियां चढ़ी थीं। अभी तक एक बार भी जिस शख्स ने सीधे चुनाव नहीं जीता हो, निगम पार्षद का भी नहीं, जो अब तक एक सूबे में ही सीमित रहा हो और जिसकी सबसे अच्छी सलाहियत यही रही हो कि वह भागवत का विश्वासपात्र हो, उसे एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी का अध्यक्ष बनाने से किस किस्म की मुश्किलों को झेलना पड़ेगा, यह पार्टीजनों के लिए स्पष्ट था। मगर चूंकि संघ की शाखा में पले बढ़े लोगों में सवाल उठाने से परहेज किया जाता है, इसलिए सभी ने सुप्रीमो के इस निर्देश को सर आंखों लिया।

                 अपनी ताजपोशी के बाद जनाब गडकरी ने पहली दफा आयोजित भाजपा के सम्मेलन में सभी को सादगी का पाठ पढ़ाया, खूब तालियां मिली, पार्टी सम्मेलन स्थल को भी सादगी के उनके फार्मुले के हिसाब से ही बनाया गया था,जहां प्रतिनिधिगणों के लिए झोपड़ियां/हटस बनायी गयी थीं। मगर जब अपने बेटे की शादी का वक्त आया तो सादगी की तमाम बातें धरी रखने में भी उन्होंने संकोच नहीं किया। 'डेक्कन हेराल्ड' (4 दिसम्बर 2010) अखबार ने लिखा था कि अपने बेटे को इस मौके पर आठ करोड का बंगला -जिसके नूतनीकरण पर चार करोड़ खर्च किया गया,एवं एक बीएमडब्लू सेदान नितिन गडकरी ने भेंट कीं। डेढ लाख से अधिक लोगों ने दावत का आनन्द उठाया। उस दिन नागपुर हवाई अड्डे पर पचास चार्टर्ड हवाई जहाज उतरे जबकि जनाब गडकरी ने तीन हेलिकाप्टर तैयार रखे थे,विशिष्ट अतिथियों को समारोह स्थल तक ले आने के लिए। शादी के लिए भेजे गए निमंत्रण पत्रों पर ही एक करोड़ से अधिक रूपए खर्च किए गए थे।

                यह परिवार का अन्दरूनी मामला है कि वह संघ के रिमोट कन्ट्रोल को कूबूल करे या उससे बग़ावत करे, मगर यह भारतीय लोकतंत्र के लिए कितना अशुभसंकेत है कि कई प्रांतों में सरकार सम्हाल रही और केन्द्र की सत्ता पर आंखें गढ़ायी पार्टी रिमोट कन्ट्रोल से चलती है।

                 यह समझना दिलचस्प होगा कि आखिर गडकरी को दोबारा अध्यक्ष बनाने का जो फैसला संघ ने लिया, उसकी क्या वजह हो सकती है ?पार्टी अध्यक्ष के तौर पर उनका कार्यकाल संगठन की दुर्गति का ही रहा है। पिछले दिनों पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों में -गोवा छोड़ बाकी जगह उसकी दुर्गत ही हुई है। उत्तर प्रदेश में एवं पंजाब में उनकी सीटें घटीं, उत्तराखण्ड में पार्टी को सत्ता से बेदखल किया गया। आदि

               फिर मोहन भागवत ने किस लिए एड़ी चोटी का जोर लगाया होगा !

               एकही बात समझ में आती है कि वह संघ के प्रति पूरी तरह वफादार दिखते हैं। संघ जो कहता है उसे बिना सोचे करने में वह देरी नही लगाते। स्पष्ट है कि ऐसे ही लोग संघ को अच्छे लगते हैं।

? सुभाष गाताड़े