संस्करण: 21 मार्च -2011

रेल की पटरी पर आन्दोलन कब तक ?

? डॉ. गीता गुप्त

 

क बार फिर आरक्षण का मुद्दा सुर्ख़ियों में है। अब आरक्षण के विरुध्द होने वाले आन्दोलन ठण्डे पड़ चुके हैं। लेकिन आरक्षण का मसला आज भी विवादास्पद है। केन्द्र सरकार दलित ईसाइयों और मुसलानों को भी आरक्षण मुहैया कराने तत्पर है। हमें विवादों से परे आरक्षण के मूल उद्देश्यों पर ग़ौर करना चाहिए। अनेक अवसरों पर न्यायालयों ने धर्म के आधार पर आरक्षण की व्यवस्था को संविधान-विरुध्द बताया है क्योंकि धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान की बुनियादी स्थापनाओं में से एक है। अत: धार्मिक आधार पर आरक्षण संविधान के प्रतिकूल है। यह धार्मिक समुदायों में भेद-भाव को जन्म देता है। संविधान सभा ने भी आदिवासियों और दलितों के लिए आरक्षण की पैरवी की थी परन्तु धर्म के आधार पर आरक्षण को स्वीकृति नहीं दी थी।

दुर्भाग्य से, राजनीतिज्ञों द्वारा आरक्षित वर्ग को वोट-बैंक के रूप में देखा जाता है और आरक्षण का मुद्दा उन्हें सत्ता की कुर्सी तक पहुंचाने का आसान मार्ग प्रतीत होता है। यही कारण है कि आज इक्कीसवीं सदी में भी जब देश उन्नति के नये सोपान तय कर रहा है तब भी हमारे राजनीतिज्ञ देश के दलितों और वंचितों की तरक्की के लिए कोई नया उपाय नहीं अपनाना नहीं चाहते। वरन् उन्हें आरक्षण की बैसाखी थमाकर स्वयं राज करते रहना चाहते हैं। जबकि हमारे पास अब भविष्य के लिए स्पष्ट सोच और ऐसी नीति होनी चाहिए जिससे योग्यता का वर्चस्व बढ़े और आरक्षण की अप्रासंगिकता उभरकर सामने आये। लेकिन यहां तो आरक्षण के लिए घमासान मची हुई है।

गत वर्ष आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय ने राज्य की शासकीय सेवाओं और शिक्षा-संस्थाओं में मुस्लिम समुदाय के पिछड़े तबकों के लिए चार प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था को असंवैधानिक ठहराते हुए रद्द करने की घोषणा की थी और दुर्योग से उसी समय पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा अपने राज्य की सरकारी नौकरियों में मुस्लिम समुदाय के लिए दस प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की गई। यह महज़ संयोग हो तब भी इसे घटिया और स्वार्थपूण्रा राजनीति का परिणाम माना जाना ग़लत नहीं होगा। इसलिए भी कि मुस्लिम समुदाय में जाति-व्यवस्था न होने के कारण सामाजिक भेदभाव का कोई व्यापक आधार नहीं है, जो उनके लिए विशेष सुविधाओं की मांग को न्यायोचित सिध्द कर सके। संभवत: इसीलिए जब मुस्लिम समुदाय के उत्थान पर चर्चा होती है तो हमारे राजनेता उनकी शिक्षा और योग्यता बढ़ाने के उपायों पर बल देने की बजाय उनके लिए आरक्षण-व्यवस्था की पैरवी करते हैं, ताकि इसी बहाने उनके अपने निहितार्थ सिध्द हो सकें।

दु:ख की बात यह है कि देश आरक्षण आन्दोलन की आग में बार-बार झुलस रहा है और इसका नेतृत्व ऐसे नेताओं द्वारा किया जा रहा है जो देश की महत्वपूर्ण सेवा में शीर्ष पदों पर रहे हैं। सन् 2007 में गुर्जरों द्वारा किये आरक्षण आन्दोलन की याद सभी को होगी। जिसने देश की यातायात-व्यवस्था को चौपट करके जनता को अपार पीड़ा और क्षति पहुंचायी थी। इस आन्दोलन का सिलसिला चलता ही रहा और 2010 दिसम्बर में इसका उग्र रूप लगातार 17 दिनों तक देखने में आया। जब निरन्तर रेलवे ट्रैक और राजमार्ग बन्द रखे गये। आन्दोलनकारियों के हठ ने कई बेरोजगारों को नौकरी के लिए साक्षात्कार और विद्यार्थियों को परीक्षा देने से वंचित कर दिया। परिवहन-व्यवस्था ठप्प होने के कारण मरीज़ अस्पताल नहीं पहुंच सके। व्यापार-व्यवसाय को भी बहुत क्षति उठानी पड़ी। अकेले रेलवे ने दो हज़ार करोड़ रुपये का नुकसान उठाया। तो समूचे देश-प्रदेश को कितनी आर्थिक हानि हुई होगी, अनुमान लगाया जा सकता है।

नि:संदेह, लोकतंत्र में आन्दोलनों का महत्व तो है। लेकिन आन्दोलन के नाम पर ऐसी मनमानी का समर्थन नहीं किया जाना चाहिए जिससे आम जनता को गंभीर क्षति पहुंचे और देश को इतनी आर्थिक हानि उठानी पड़े कि उसकी भरपाई आसानी से संभव न हो सके। रेल और सड़क यातायात बाधित करके आन्दोलनकारी जन-जीवन को अस्त-व्यस्त कर देते हैं। इससे उद्योग-धंधो सीधो दुष्प्रभावित होते हैं। निर्दोष जनता को अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। यह जानते हुए भी हमारी सरकारें और राजनेता ऐसा कोई उपाय नहीं तलाशते जिससे आन्दोलनों की इस ग़लत परंपरा पर विराम लग सके।

अब उत्तर प्रदेश और हरियाणा के जाट आन्दोलन की राह पर हैं। उन्हें केंद्रीय  सेवाओं में आरक्षण चाहिए। राजस्थान में जाटों को अन्य पिछड़ा वर्ग की श्रेणी में आरक्षण प्राप्त है मगर उत्तर प्रदेश और हरियाणा के जाट इससे वंचित हैं। समूचे देश की जातियों में अपने को नीचा से नीचा साबित करने की होड़ मची हुई है ताकि आरक्षण का लाभ हासिल किया जा सके। योग्यता के बल पर कोई उन्नति के मार्ग पर नहीं चलना चाहता। नेता भी जातिगत आधार पर आरक्षण-आन्दोलन का नेतृत्व कर यही साबित करते हैं कि देश की बजाय जाति-हित उनके लिए सर्वोपरि है। यह निश्चय ही दु:खद बात है।

अब समय आ गया है जब सरकार को आरक्षण की समस्या का स्थायी समाधान ढूंढना चाहिए। जाति या धर्म की बजाय आर्थिक आधार पर आरक्षण एक सही समाधान हो सकता है। सर्वोच्च न्यायालय भी विरोध-प्रदर्शन हेतु हड़ताल, बन्द और आन्दोलनों पर विराम लगाने के लिए सरकार से बारम्बार आग्रह कर चुका है तथापि आरक्षण की लड़ाई रेल की पटरियों और सड़कों पर ही लड़ी जा रही है। हमारे नेता विधानसभाओं और संसद में ऐसी लड़ाई नहीं लड़ना चाहते। विरोध-प्रदर्शन का यह ग़लत तरीका वे आखिर कब आजमाते रहेंगे ?


? डॉ. गीता गुप्त