संस्करण: 21 मार्च -2011

 

भूमंडलीकरण के ख़तरे

? सुनील अमर

 

बीती सदी के उत्तरार्ध्द में हम अगर तेजी के साथ भूमंडलीकरण की तरफ बढ़े थे तो इस सदी के शुरुआती दशक से हम वैश्विक गाँव का आनन्द उठाने लगे हैं। वैचारिक समरसता ही नही, बल्कि रहन-सहन और खान-पान में भी हम विश्व बिरादरी का अंग बने हैं। पढ़ाई-लिखाई और कार्य-व्यापार का क्षेत्र सारी धरती पर फैल जाने के कारण ऐसा लगने लगा कि 'प्लानेट अर्थ' के हम सभी निवासी अब एक ही हैं। इस लिहाज से अगर हम सभी सुख और लाभ में भागीदार होते हैं तो निश्चित ही विपत्ति में भी सहभागी होना पड़ेग़ा। गत सप्ताह जापान में आई लघु प्रलय ने कम से कम यही संदेश दिया है। उस विनाशकारी भूकंप और जल-प्रलय के छीटे अपने देश तक पड़ने की आशंकाऐं तो व्यक्त की ही जा रही हैं,  लेकिन शेयर मार्केट जैसे व्यवसाय और दैनिक जीवन की अन्य गतिविधियों पर तो उसका असर तत्क्षण ही पड़ना शुरु हो गया है। यह कहना असंगत न होगा कि आज एक देश की जलवायु भी दूसरे देश पर असर डालने लगी है।

जापान में जो त्रासदी आई हुई है, ऐसी कोई भी प्राकृतिक आपदा दूसरे देषों के व्यापार को ही सबसे पहले प्रभावित करती है। अपने देश में भी एक तरफ हताहतों पर दु:ख और अफसोस जताने के साथ-साथ मदद भेजने की तैयारियाँ हो रही हैं और दूसरी तरफ इस बात के ऑकलन भी किये जा रहे हैं कि वहाँ और यहाँ मिलाकर अपना कितना नुकसान हो रहा है। यहॉ यह समझने की बात है कि भूमंडलीकरण का मुख्य उद्देश्य ही आर्थिक है। बाकी जो कुछ भी सामाजिक, सांस्कृतिक, साहित्यिक या नैतिक-अनैतिक वहॉ से आया या आ रहा है वह इस आर्थिक अभियान की पीठ पर सवार होकर ही आ रहा है। विनाश की पहली खबर के साथ ही यह ऑंकलन देश की मीडिया में आने लगे थे कि जापान में पुनर्निमाण व नवनिर्माण के कार्यों में भारत को काफी बड़ा व्यवसाय मिल सकता है! ये आर्थिक उद्देश्य अगर खत्म कर दिये जाँय तो यकीन मानिये भूमंडलीकरण वापस 30 साल पहले की स्थिति में पहुँच जाय।

इसमें कोई सन्देह नहीं है कि भूमंडलीकरण ने ज्ञान-विज्ञान और रोजगार के असीमित अवसर उपलब्ध कराये हैं। लेकिन इसे लिप्सा ही कहा जाना चाहिए, क्योंकि देश के कार्य-व्यापार तो भूमंडलीकरण से पहले भी चल ही रहे थे। विश्व का शायद ही कोई ऐसा विकसित या विकासशील देश हो जहॉ भारतीय अच्छी-खासी संख्या में न हों। अभी मिस्र और लीबिया आदि देशों में चल रहे सत्ताविरोधी आन्दोलनों के कारण वहॉ संकट में फॅसे भारतीयों को लाने का सिलसिला चल ही रहा है कि इसी बीच जापान में हुई भयानक त्रासदी ने एक और संकट हमारे सामने खड़ा कर दिया। जापान में लगभग 25,000 भारतीय रहते हैं।

अब इधर जैसी कि खबरें आ रही हैं, जबर्दस्त भूकम्प और भयानक समुद्री तूफान यानी सुनामी आने के कारण जापान में भारी तबाही हुई है और जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। परमाणु रिएक्टर्स उड़ गये हैं और विद्युत व्यवस्था चरमरा गई है। इसकी वजह से उत्पादन भी ठप हो गये हैं। अपने देश में मीडिया बता रहा है कि कार, मोटर सायकिल, मशीनरी सामग्री, तथा दवा आदि की आपूर्ति पर भारी असर आने वाले दिनों में पड़ने वाला है। यह भूमंडलीकरण और अर्थ-प्रधान विचारधारा की देन है कि अब बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अपने कारखानों के तमाम हिस्सों को एक स्थान पर न लगाकर उन अलग-अलग देशों में लगाती हैं जहॉ वैसे उत्पादों के लिए सुविधा व रियायतें हों। मसलन अगर कोई जापानी कम्पनी भारत में कार बनाने का कारखाना लगाये हुए है तो इसका मतलब यह हरगिज नहीं होता कि वह समूची कार यहीं हिंदुस्तान में ही बन रही होगी! हो सकता है कि उसका इंजन जापान में बनता हो, पहिए हिंदुस्तान में, ढ़ाँचा अमेरिका में और आंतरिक सजावट के सामान किसी और देश में। कारखाना लगाने के शुरुआती दौर में तो प्राय: ही बहुराष्ट्रीय कम्पनियाँ अन्य देशों में चल रहे अपने कारखानों का माल मँगाकर मात्र 'असेम्बलिंग' करके ही बेचना शुरु कर देती हैं।

यही हाल दवा कम्पनियों का भी है। आज वैश्विक परिस्थितियाँ जिस तरह हो गई हैं, उसमें यह कहा ही नहीं जा सकता कि कोई भी उत्पादक सिर्फ अपने ही देश के भरोसे काम चला सकता है। आज दवाओं पर खोज कहीं और हो रही है, उनका कच्चा माल कहीं और बन रहा है, दवाऐं कहीं और तैयार हो रही हैं और उनकी बिक्री सारी दुनिया में हो रही है। यह प्रक्रिया एक तरफ सुविधा तो देती है, लेकिन जैसा कि हम देख रहे हैं कि एक देश पर आया प्राकृतिक या मानवकृत संकट कैसे दूसरे अन्य देशों को भी तत्काल प्रभाव में ले लेता है। भूमंडलीकरण के इसी तरह के संकट हाल के डेढ़-दो दशक में हम संक्रामक बीमारियों के सन्दर्भ में देख रहे हैं कि कैसे एक देश में हुई संक्रामक बीमारी वायु-वेग से दुनिया के अन्य देषों में फैल जाती है! मैड काऊ डिजीज हो या बर्ड फ्लू, जापानी इंसेलायटिस हो स्वाइन लू, ऐसी तमाम संक्रामक बीमारियाँ अब देखते ही देखते एक देश से दूसरे देश में फैल जाती हैं और जब तक इनकी पहचान कर बचाव के उपाय तलाशे जाते हैं तब तक सैकड़ों-हजारों बेगुनाह अपनी जान खो बैठे होते हैं।

भूमंडलीकरण ने अपराध की न सिर्फ प्रकृति बदली बल्कि उसे विस्तृत फलक भी दिया है। आज जैसा कि हम अपने देश में देख रहे हैं इसने हर तरह के आर्थिक या अर्थ आधारित अपराध को फैलाने में कारगर भूमिका निभाई है। हालॉकि ऐसा कहने से इसके अन्य तमाम गुणों को अस्वीकृत नहीं किया जा रहा है, लेकिन जिस तरह से आर्थिक अपराधों को शरण देने और वैश्विक आतंकवाद को मदद करने की अंतर्राष्ट्रीय खबरें इन दिनों आती हैं, वह भूमंडलीकरण के ही कारण संभव हो सका है। यह भूमंडलीकरण ही है जो आज असफल, धोखाधड़ी या अपराध में तब्दील हो रहे वैवाहिक सम्बन्धों का पहाड़ खड़ा कर रहा है। खाद्यान्न की किल्लत हो, मँहगाई की सुरसा डायन हो, परमाणु विकिरण का पूरी दुनिया के सिर पर मंडराता खतरा हो या ईंधन का नित नया संकट, इसमें भूमंडलीकरण की भूमिका से कौन इनकार कर सकता है!

वास्तव में, जब हम बहुत तेज चलते हैं तो तेज दुर्घटना की संभावना भी बनी ही रहती है। आज जिस तेज रतार युग में हम प्रवेश कर चुके हैं, वहाँ से वापस लौटना तो मुमकिन नहीं, लेकिन इस बात की आवश्यकता जरुर महसूस होती है कि उड़ान भरने से पहले न सिर्फ अपने परों को तौल लिया जाय बल्कि कहॉ उतरा जायेगा, इसका भी निर्धारण कर लिया जाना चाहिए। विकास की धीमी गति उतनी तकलीफदेह नहीं होती जितनी कि तेज विकास की नियंत्रणहीनता। क्या यह सच नहीं है कि आज उपर वर्णित तमाम व्याधियों के हम स्वयं ही जनक हैं? जापान के ताजा घटनाक्रम के सिलसिले में देश के प्रधानमंत्री का संसद में यह आश्वासन बहुत राहतकारी रहा है कि न सिर्फ जापान में हमारे देश के सभी लोग सुरक्षित हैं, बल्कि देश के भीतर भी हमारे सभी परमाणु उपक्रम पूरी तरह नियंत्रण में हैं। यद्यपि यह एक प्राकृतिक सच है कि विकास हमेशा कीमत मॉगता है लेकिन सतत् सजगता से हम उस कीमत को भी प्राकृतिक बनाकर रख सकते हैं। जापान में विकास की जो कीमत चुकाई जाती हम देख रहे हैं वह बहुत ही आप्राकृतिक है और षायद इसीलिए रौद्र और भयावह भी। समय आ गया है कि विकास से भी पहले इस तरह के विनाश से बचने के उपाय खोजे जॉय।


? सुनील अमर