संस्करण: 21 मार्च -2011

 

आरक्षण की सियासत

कहां तक उचित है जाटों के लिए आरक्षण की मांग

? सुभाष गाताड़े

 

पूर्व प्रधानमंत्री चौधरी चरण सिंह या संविधान सभा समिति के अध्यक्ष रणबीर हुड्डा (वर्तमान मुख्यमंत्री के पिता) या सर छोटूराम -इनमें क्या समानता ढूंढी जा सकती है ? जाट समुदाय में जनमे इन अग्रणियों की एक अहम खासियत यह कही जा सकती है कि उनके पास एक विजन/भविष्यदृष्टि थी, जो अधिक व्यापक थी, जो कहीं ग्रामीण जन के प्रति सरोकार के रूप में या राष्ट्रनिर्माण के प्रति अपनी चिन्ताओं में प्रगट होती थी। लाजिम था कि जब जाट समुदाय के लिए आरक्षण हासिल करने की मांग इनके वक्त में उठी तब उन्होंने इसका पुरजोर विरोध किया।

आप इसे समय का फेर कह सकते हैं कि उनके नाम की माला जपनेवाले लोगों को इस बात से कोई गुरेज नहीं है कि वह आज अपने को 'पिछड़ा' साबित कर आरक्षण के चन्द अवसरों को हासिल करने की जुगत में लगे हैं।

केन्द्रीय सेवाओं में पिछड़ी जातियों के लिए मिले आरक्षण में खुद को भी हिस्सेदार बनाने की मांग के साथ जाट आरक्षण संघर्ष समिति के आवाहन पर हरियाणा, पश्चिमी उत्तार प्रदेश तथा आसपास के अन्य इलाकों से शुरू जाटों के इस आरक्षण आन्दोलन के तेज हो जाने की ख़बरें हैं। पश्चिमी उत्तार प्रदेश या हरियाणा के कई स्थानों पर रेल पटरी पर जाट बैठे हैं और उन्होंने केन्द्र सरकार को चेतावनी भी दी है कि अगर इस मसले पर कारगर कदम नहीं उठाया तो वह दिल्ली का पानी बन्द कर देंगे। संघर्ष समिति का तर्क सीधा है कि अगर राजस्थान, दिल्ली और यू पी के स्तर पर उन्हें पिछड़ी जाति मान लिया गया है तो आखिर केन्द्र सरकार क्यों आनाकानी कर रही है।

प्रश्न उठता है कि अपने आप को पिछड़ा साबित करने की जाट समुदाय की मांग के पीछे का तर्क क्या है? इसको समझने के लिए हम मण्डल आयोग की सिफारिशों पर गौर कर सकते हैं, जिसका गठन वर्ष 1978 में मोरारजी देसाई के प्रधानमंत्रित्ववाली जनता पार्टी सरकार ने संविधान की धारा 340 के तहत किया था। अन्य पिछड़ी जातियों में 'सामाजिक एवम शैक्षिक तौर पर पिछड़ी किन जातियों को शामिल किया जा सकता है इसके लिए उसने एक लम्बी कवायद की थी। और लगभग चार हजार जातियों को सामाजिक एवम शैक्षिक आधार पर पिछड़ा घोषित किया था। गौरतलब है कि अपने विस्तृत अध्ययन के आधार पर मण्डल आयोग ने अपनी फेहरिस्त में जाटों को शामिल नहीं किया था। वर्ष 1980 में ही सरकार के सामने पेश इस रिपोर्ट के आधार पर वर्ष 1989 में तत्कालीन वी पी सिंह सरकार ने केन्द्र सरकार की नौकरियों में पिछड़ों के लिए आरक्षण की घोषणा की थी।

सोचने का मसला है कि आखिर किस आधार पर मण्डल आयोग ने जाटों को पिछड़ी जाति में शामिल नहीं किया था। दरअसल आयोग ने जरूरी आंकड़ें एवम सबूत पाने के लिए कई पध्दतियों एवम तकनीक को अपनाया था, जिसके तहत स्थूल रूप में 11 पैमाने थे जिन्हें सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक हिस्सों में बांटा गया था। ध्यान देने योग्य है कि सभी पैमानों के लिए समान 'वेटेज' नहीं दिया गया था, सामाजिक सूचकांकों के लिए जहां तीन  पाईट वेटेज था, तो शैक्षिक पिछड़ापन के लिए 2 पाईट वेटेज था तो आर्थिक के लिए 1 पाईंट वेटेज था।

सामाजिक के तहत पहले दो बिन्दु थे : 1. ऐसी जातियां/तबके जिन्हें अन्य जातियां सामाजिक तौर पर पिछड़ा मानती हैं तो दूसरा बिन्दु था, ऐसी जातियां/तबके जो मुख्यत: अपने जीवनयापन के लिए शारीरिक श्रम पर निर्भर करती हैं। शैक्षिक पैमानों के अहम बिन्दु थे, ऐसी जातियां/तबके जहां 5-15 साल के उम्र के बच्चे, जिन्होंने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा हो, उनका अनुपात राज्य औसत से 25 फीसदी अधिक हो तथा जाति/तबका विशेष के ऐसे बच्चे जो 5-15 साल की उम्र के बीच स्कूल छोड़ जाते हों उनकी संख्या राज्य औसत से 25 फीसदी अधिक हो, आर्थिक पैमानों के तहत प्रमुख बिन्दु था पारिवारिक सम्पत्ति का औसत मूल्य राज्य औसत से कमसे कम 25 फीसदी कम हो तथा कच्चे घरों में रहनेवाले जाति विशेष के लोगों की संख्या राज्य औसत से 25 फीसदी अधिक हो।

क्या यह तर्क करना उचित होगा कि वर्ष 1980 में जाट सामाजिक एवं आर्थिक तौर पर पिछड़े नहीं थे, मगर विगत तीस सालों में उनके सामाजिक आर्थिक सूचकांकों में तेजी से गिरावट आयी है। ऐसा कोई प्रमाण नहीं दिखता। आजादी के पहले जाट जातियों को भले ही शूद्र जातियों में ही शुमार किया जाता था, मगर आजादी के साठ साल बाद की स्थिति पर गौर करें तो साधारण व्यक्ति भी देख सकता है कि जाटों की समाजार्थिक स्थितियों में कितना परिवर्तन आया है। पंजाब-हरियाणा जैसे सापेक्षत: छोटे सूबों की राजनीति पर, जमीन के अच्छे खासे हिस्से पर यहां तक कि तमाम शैक्षिक संस्थानों आदि पर इसी जाति का दबदबा है। और यही हाल पश्चिमी उत्तार प्रदेश का है। राजधानी दिल्ली के तहत राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के लगातार होते जा रहे विस्तार के चलते तथा इसके तहत दिल्ली के आसपास जमीन की बढ़ती कीमतें आदि के चलते पहले से ही जमीनों के अच्छे खासे हिस्से पर नियंत्राण के चलते उनकी आर्थिक स्थितियों में भी इन क्षेत्रों में जबरदस्त उछाल आया है।

अगर हम हरियाणा के रोहतक की प्रतिष्ठित महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय के सेन्टर फार हरियाणा स्टडीज द्वारा वर्ष 2004 में किए गए अध्ययन के मुताबिक हरियाणा में जाट आबादी का प्रतिशत 35 है। जहां तक हरियाणा राज्य सरकार की नौकरियों का सवाल है तो तीसरी श्रेणी की नौकरियों में उनकी संख्या 45 फीसदी है, तो दूसरी श्रेणी की नौकरियों में उनका अनुपात 20 फीसदी है। हरियाणा राज्य के गठन के बाद से वहां की विधानसभा में जाटों का अनुपात 32 फीसदी से अधिक रहा है। और विगत 45 साल के राज्य के इतिहास में (स्थापना 1966) महज दस साल गैरजाट मुख्यमंत्री रहे हैं।

यह अकारण नहीं कि पंजाब विश्वविद्यालय के सेन्टर फार द स्टडी आफ सोशल एक्स्लुजन के निदेशक डा मंजित सिंह ने पत्रकार से पूछा ''जमीन, राजनीति और खापों पर जाटों का नियंत्रण है। अगर वही आरक्षण की मांग करें तो फिर बचता कौन है।'(मेल टुडे, 8 मार्च 2011)

निश्चित ही सवाल वास्तविक पिछड़ेपन का नहीं है बल्कि चुनावी राजनीति के तकाजों का बखूबी इस्तेमाल करते हुए अपने आप के लिए नौकरियों में भी अधिकाधिक स्थान हासिल करने का है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया में समुदायविशेषों द्वारा अपनी बेहतरी के लिए जो दबाव की राजनीति की की जाती है, यह उसी का एक प्रतिफलन है। कल्पना की जा सकती है कि अगर जाटों की यह मांग मान ली गयी तो इसका असर अन्य वास्तविक पिछड़ी जातियों के अवसर पर अवश्य पड़ेगा। और आप इसे चुनावी राजनीति के दबावों का नतीजा कहें कि इस आन्दोलन को एक तरफ से मायावती तो दूसरी तरफ से भूपिन्दर सिंह हुड्डा की भी हिमायत मिली हुई है।

क्या इस बात की कल्पना की जा सकती है कि आरक्षण को लेकर जारी वर्तमान उठापटक को लेकर संविधाननिर्माताओं की क्या प्रतिक्रिया होती ? संविधानसभा के अध्यक्ष डा अम्बेडकर इस बात को देख कर निश्चित ही विचलित हो उठते कि सामाजिक एवं शैक्षिक तौर पर उत्पीड़ित तबकों को समान अवसर प्रदान करनते हुए शिक्षा एवम रोजगार में आरक्षण प्रदान करने की जो नीति अपनायी गयी थी, वह गणतंत्रा की साठ साला यात्रा के बाद अपने बिल्कुल विपर्यय के रूप में किस तरह सामने आ रही है। ऐसी जातियां, ऐसे तबके अपने लिए विशेष अवसरों की मांग करेंगे जो आर्थिक, सामाजिक रूप में कहीं से पिछड़े नहीं कहे जा सकते हैं और राजनीतिक स्तर पर भी उनकी सादृश्यता अपनी संख्या के अनुपात में काफी अधिक बनी हुई है। वह इस बात को देख कर भी आश्चर्यचकित हो उठते कि अब अपने आप को 'पिछड़ा' घोषित करने में आगे आने में लोगों को संकोच नहीं होगा बल्कि उसके सम्भावित फलों को देखते हुए वह फक्र के साथ पिछड़ा कहलाना पसन्द करेंगे।

मण्डल आयोग की संस्तुतियों के सन्दर्भ में एक बात अक्सर भूला दी जाती है वह है सुप्रीम कोर्ट का 1992 को इन्दिरा साहनी बनाम भारत सरकार का वह फैसला, जिसके तहत उसने आदेश दिया था कि केन्द्र एवम राज्य सरकारों को चाहिए कि वह स्थायी आयोगों का गठन कर इसके लाभार्थियों की निरन्तर पड़ताल करें। न्यायमूर्ति टी के थोम्मन ने कहा था ''पिछड़ेपन की पहचान दरअसल समावेश एवम बहिष्करण की निरन्तर चलनेवाली प्रक्रिया है। आरक्षण के संविधानिक संरक्षण के लिए योग्य नागरिको के तबकों को निरन्तर पहचानते, छांटते रहना पड़ेगा ताकि अपात्रा को इसका लाभ न मिले।'' इन प्रस्तावित आयोगों को अर्ध्दन्यायिक इकाइयों के तौर पर देखा गया था जो अपने कामकाज को राजनीतिक प्रभावों के वातावरण से दूर रह कर संचालित करेंगे।

वैसे मण्डल आयोग ने जो पैमाने तय किए थे, उसके पहली दफा उल्लंघन का जिम्मा बीसवीं सदी के आखरी वर्षों में केन्द्र में आयी अटल बिहारी वाजपेयी सरकार को जाता है। राजस्थान में कांग्रेस के जाट जनाधार को अपनी तरफ खींचने के लिए 1999 के लिए लोकसभा के चुनावों के दौरान तत्कालीन प्रधानमंत्री वाजपेयी ने जाटों को आरक्षण देने का वायदा किया था, जिसका उसे काफी लाभ मिला। इसके लिए एक कमजोर सा तर्क यह दिया गया कि शिवशंकर के नेतृत्ववाले नेशनल कमीशन आन बैकवर्ड क्लासेस द्वारा तैयार नवम्बर 1997 की एक रिपोर्ट को आधार बनाया जिसने राजस्थान में जाटों को पिछड़ी जाति का लाभ दिलाने की बात कही थी। अपने वोट बैंक में लगी सेंध से घबड़ायी कांग्रेस ने चुनावों के तत्काल बाद राज्य के पिछड़ा वर्ग आयोग की सिफारिशों का इन्तजार किए बिना जाटों को आरक्षण दे दिया और उसके बाद जो खेल शुरू हुआ , उसकी परिणति अभी हमारे सामने है।


? सुभाष गाताड़े