संस्करण: 21 मार्च -2011

 

मध्यप्रदेश आर्थिक बदहाली की ओर

? महेश बाग़ी

 

नास्तिकवाद के प्रणेता महर्षि चावाक के एक श्लोक की पंक्ति है- ऋणं कृत्वा घृतं पीवेत यानी कर्ज लेकर भी घी पी जाओ। मध्यप्रदेश की शिवराज सरकार ने चार्वाक के इस श्लोक को अपना आदर्श मान लिया है। इस कारण मध्य प्रदेश आर्थिक रूप से दिनों-दिन बदहाली की ओर बढ़ रहा है। अपने पिछले कार्यकाल में इस सरकार ने पंचायतों-महापंचायतों और इन्वेस्टर्स मीट की नौटंकियों पर पानी की तरह पैसा बहाया। इसका नतीजा तो सिफ़र रहा, ऊपर से सरकार पर कर्ज़ का भार बढ़ता गया। आज हालत यह है कि राज्य सरकार का न सिर्फ ख़ज़ाना ख़ाली है, बल्कि उस पर 69259.16 करोड़ का कर्ज़ भी है। इस कर्ज़ पर सरकार 5051.83 करोड़ का ब्याज़ चुका रही है। राज्य की जितनी बजट राशि है, उससे अधिक राशि ऋण चुकाने में ख़र्च की जा रही है।

एक ओर सरकार कर्ज क़े बोझ से गले-गले तक डूबी है, वहीं दूसरी ओर इस दिवालिया सरकार ने विभिन्न संस्थाओं की अंडरस्टेंडिंग पर तीन हज़ार करोड़ की गारंटी भी दे रखी है। कुल जमा सरकार पर 77,990.02 करोड़ का दायितव है। राज्य की इस आर्थिक बदहाली के बावजूद सरकार व्यर्थ की नौटंकियों पर जन-धन फूंकने में लगी है। कभी कार्यकर्ता गौरव दिवस, तो कभी सविनय उपवास, तो कभी अंत्योदय मेलों के नाम पर सरकारी पैसा दिल खोल कर फूंका जा रहा है। जिस प्रदेश की माली हालत बद से बदतर होती जा रही है, उस प्रदेश के मुखिया की नौटंकियां क्या दर्शाती हैं ?

सरकार की इन नौटंकियों से प्रदेश को क्या हासिल हुआ है, यह जानना भी बेहद ज़रूरी है। भाजपा के शासनकाल में प्रदेश में कुपोषण के 56,603 मामले सामने आए हैं, जो देश में सर्वाधिक है। इस संबंध में मध्य प्रदेश की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बदनामी भी हुई। फिर भी सरकार को शर्म नहीं आई। हालांकि कुपोषण से निपटने के लिए केंद्र सरकार द्वारा राज्य को भारी-भरकम मदद दी जा रही है, किंतु इन योजनाओं की राशि अफ़सरान की तिज़ोरियों में समा रही है। आयकर विभाग के छापों में मिली अकूल दौलत इसका प्रमाण है। शिवराज सरकार भ्रष्ट नौकरशाहों का किस तरह पोषण कर रही है, यह इसी से समझा जा सकता है कि इस सरकार ने प्रमोटी आईएएस अधिकारियों को फ़ील्ड में तैनात कर रखा है। एक वरिष्ठ अधिकारी के अनुसार डायरेक्ट आईएएस अफ़सर निचले स्तर पर रिश्वत या कमीशनख़ोरी नहीं करता है, जबकि प्रमोटी आईएएस अफ़सर तहसीलदारों और पटवारियों तक से सीधो 'संवाद' कर लेता है। ज़ाहिर है कि सरकार ने प्रमोटी आईएएस के ज़रिये प्रदेश को लूटने की खुली छूट दे रखी है। कहने की ज़रूरत नहीं कि इसमें 'ऊपरी स्तर' तक लेनदेन होता है।

एक ओर जहां नौकरशाही भ्रष्टाचार में लिप्त है, वहीं दूसरी ओर प्रदेश लगातार रसातल में जा रहा है। प्रदेश में प्रति हज़ार शिशुओं में से 67 समय से पहले ही मौत के मुंह में समा जाते हैं। इस मामले में मध्यप्रदेश देशभर में पहली पायदान पर है। मातृ मृत्युदर के मामले में भी मध्यप्रदेश देश में अव्वल है, जहां प्रति एक लाख महिलाओं में से 335 महिलाएं प्रसव के दौरान दम तोड़ देती हैं। दलितों के प्रति अत्याचार और किसानों की आत्महत्या के मामलों में मध्यप्रदेश पांचवी पायदान पर है। चोरियों के मामले में प्रदेश का देश में दूसरा स्थान है। पुलिस अत्याचार के मामलों में भी मध्यप्रदेश देश में पहले क्रम पर है, जहां इस तरह की 15,903 शिकायतें सामने आई हैं।

प्रदेश में अपराधी तत्व कितने हावी हो गए हैं, यह इसी से समझा जा सकता है कि राज्य में विभिन्न अपराधों के 26,000 से ज्यादा मामले प्रकाश में आए हैं, जो देशभर में अव्वल हैं। महिलाओं और बच्चों के प्रति अपराध में भी मध्यप्रदेश देशभर में शिखर पर है। एक ओर जहां नौकरशाही फल-फूल रही है, वहीं दूसरी ओर आम आदमी की हालत पतली होती जा रही है। प्रदेश में आम आदमी की औसत सालाना आय 27,250 रुपए रह गई है, जबकि गोवा जैसे छोटे से राज्य में आम आदमी की औसत आय 1,32,719 रुपए हैं। ये आंकड़े शिवराज सरकार के 'स्वर्णिम मध्यप्रदेश' की हक़ीकत बयान कर रहे हैं।

प्रदेश की आर्थिक बदहाली और लगभग हर क्षेत्र में बदतर होती तस्वीर के बीच विकास ठप्प हो गया है। आर्थिक बदहाली के कारण सरकार ने निर्माण एजेंसियों के बजट में 40 से 50 फ़ीसदी कटौती कर दी है। इससे जहां विकास कार्य थम गए हैं, वहीं इन एजेंसियों में पदस्थ अधिकारियों-कर्मचारियों को बैठे-बिठाए तनख्वाह देना पड़ रही है। प्रदेश में कहीं भी थोड़ा बहुत काम हो रहा है, तो वह केन्द्रीय अनुदान से ही हो रहा है। राज्य सरकार तो दिवालिया हो चुकी हैं मुख्यमंत्री के नाते-रिश्तेदार ठेकेदार-बिल्डर बन कर सरकारी योजनाओं को पलीता लगा रहे हैं। शिवराज सिंह चौहान के एक साले की ठेका-एजेंसी का पंजीयन निरस्त करने की घोषणा विधानसभा के बजट सत्र में की जा चुकी है, किंतु उस पर धोखाधड़ी का मामला पंजीबध्द नहीं किया गया है। इससे स्पष्ट है कि शिवराज सरकार प्रदेश को खोखला करने में जी-जान से जुटी है। इसी के दम पर भाजपा मिशन 2013 को परवान चढ़ाने की जुगत में है। ऐसे में इस मिशन पर ही सवालिया निशान लग गया है।


? महेश बाग़ी