संस्करण: 21 मार्च -2011

 

पुराणों में भी उठी हैं सुनामी की लहरें

? डॉ. महेश परिमल

 

जापान के जलजले से पूरा विश्व अचंभित है। एक तरफ सुनामी, दूसरी तरफ भूकम्प और तीसरी तरफ ज्वालामुखी का फटना। एक साथ इतनी विपदाएँ?  प्रकृति से हो रही लगातार छेड़छाड़ का यह एक छोटा सा परिणाम है। प्रकृति कहना चाहती है कि अब तो अपनी करतूतों से बाज आ मानव! जापान का दुरूख आज सबका दुरूख है, पर क्या जापान की घटना से हम कोई सबक नहीं ले सकते? शायद हमने कभी किसी से सबक लेना नहीं सीखा, क्योंकि पुराणों में भी इसी प्रकार सुनामी की खतरनाक लहरों का जिक्र है, जिमसें सब कुछ बरबाद हो जाता है। आइए, जानें कि किस प्रकार पुराणों में भी प्रकृति के कोप का हवाला दिया गया है।

समुद्री भूकम्प के प्राणघाती हमले ने सभी की ऑंखों में खौफ पैदा कर दिया है। लाखों निर्दोष लोगों की मौत का कारण बनी ये सुनामी लहरें अब थम गईं हैं, किंतु अपने पीछे छोड़ गई हैं एक ऐसा वर्तमान जो इतिहास बनकर भी लोगों के दिलों में दहशत छोड़ जाएगा। सागर की रेतीली जमीन पर वैसे भी कई इतिहास दबे पड़े हैं, जो पृथ्वी की विनाशलीला की कहानी कहते हैं। वैज्ञानिक भले ही इसे प्राकतिक विपदा का नाम दें, किंतु धर्म, अध्यात्म और नीतिशास्त्र के विद्वान इसे ईश्वर का रौद्र रूप मानते हैं। अभी तक तो धरती पर ही भूकम्प आ रहे थे, किंतु आज वर्षो बाद सागर कुपित हुआ है और वह भी इतना अधिक कि उसने दस-बीस नहीं लाखों लोगों को अपनी लहरों में समेट लिया है। मौत के आंकड़े लगातार बढ़ते चले जा रहे हैं। आखिर ऐसा क्यों हुआ? क्यों बिफरे समुद्र देवता? अध्यात्मवादी अपनी बात कहने के लिए इतिहास की दंतकथाओं एवं प्राचीन शास्त्रों की मदद लेते हैं।

सुनामी लहरों के तांडव को धर्म से जोड़ा जाए, तो बाइबिल में पृथ्वी पर पापों की अधिकता से प्रलय आने की बात कही गई है। बाइबिल में कहा गया है कि ईश्वर पाप की अधिकता के कारण पृथ्वीवासियों पर क्रोधित होगा और उन्हें सजा देगा। उसमें नोहा नामक सज्जन व्यक्ति बच जाएगा। उसमें आगे कहा गया है कि बहुत बड़ी लहरें उठेंगी। तब एक लकड़ी की नाव बनानी होगी। उस पर उसका परिवार और कुछ प्राणियों को लाना होगा। यह भयानक जलप्रलय चालीस दिन और चालीस रात तक चलेगा। उसके बाद ही नोहा जमीन पर फिर वापस आ पाएगा।

उसी प्रकार वेदों में आने वाली मत्स्यावतार की कथा के अनुसार ब्रह्मङ्ढा जब संसार का सृजन कर रहे थे, तब राक्षस उसे नष्टङ्ढ कर देते थे। तब राक्षसों का संहार करने के लिए भगवान विष्णु ने मत्स्यावतार लिया था और अंत में राक्षसों का नाश किया था। उसके बाद भयंकर प्रलय हुआ था। उस समय भगवान विष्णु के कहने से सत्यव्रत और सप्तऋषि एक नाव में कुछ जानवर, वनस्पति और अन्य सजीव वस्तुओं को ले कर मत्स्यावतार के साथ बँध गए थे। इसके लिए साँपों के राजा वासुकी का उपयोग नाव बाँधने के लिए किया गया था। इस प्रलय के दौरान भगवान विष्णु ने ऋषियों को ज्ञान दिया था।

भारतीय पुराणों में समुद्र मंथन की कथा आती है। इन्द्र पर क्रोधित हुए दुर्वासा ने देवताओं को श्राप दिया था कि वे अपनी दैवीय शक्ति खो देंगे। सभी देवता इस श्राप को कम करने के लिए भगवान विष्णु के पास गए और इसके उपाय की प्रार्थना की। तब भगवान विष्णु ने राक्षसों को समझाकर समुद्र मंथन करने की सलाह दी। उसमें से जो अमृत निकले, उसका पान करके देवता पुनरू अपनी शक्ति प्राप्त कर सकते हैं। इस उपाय को करने के लिए समुद्र मंथन किया गया, जिसके कारण समुद्र में भयानक लहरें उठी थीं।

रामावतार के समय रावण जब सीता का हरण कर उसे अपने साथ लंका ले गया था, तब भगवान राम, लक्ष्मण और हनुमान को लेकर सीता की खोज में निकले, किंतु समुद्र पार करने में बाधा उत्पन्न हुई। भगवान राम ने समुद्र देवता को मार्ग देने के लिए प्रार्थना की। लगातार तीन रात तक प्रार्थना करने के बाद भी जब समुद्र ने मार्ग न दिया, तो राम ने पूरा समुद्र सूखाने का विचार किया। उन्होंने इन्द्रास्त्र उठाया और तभी सागर प्रकट हुआ। उसने राम को विश्वास दिलाया कि वे लंका तक जो भी पुल बनाएँगे, उस दौरान समुद्र शांत रहेगा। सेतु बंधन की यह कथा भी पुराणों में मिलती है।

प्रभु यीशु के भी पहले जन्मे मोसीस भी एक पैगम्बर माने जाते हैं। वे जन्म से एक यहूदी थे। मिश्र के राजा टेमेलेस के शासनकाल में उनका जन्म हुआ था। चूँकि वह एक यहूदी थे, अतरू माँ ने उसे बचाने के लिए एक बास्केट में डालकर नदी में छोड़ दिया था। उनका सद्भाग्य यह था कि रानी ने ही उन्हें बचा लिया था और पालपोस कर बड़ा किया। राजा सभी यहूदियों को मार डालना चाहता था।

परंतु मोसीस बच गए थे। बड़े होने पर एक दिन उन्हें पता चला कि वे यहूदी हैं और लाखों यहूदी इजिप्त के फेरो के यहाँ गुलामी की जंजीरों से जकड़े हुए हैं। तब मोसीस ने फेरो के पास जाकर कह दिया कि मेरे मित्रों को मुक्त करें। फेरो ने उनकी बात न मानी। उसके बाद अनेक चमत्कार हुए। आकाश से मेंढ़कों की बारिश हुई, नदी का पानी लाल हो गया। कुपित ईश्वर ने इजिप्त के कोई भी परिवार में प्रथम जन्मी संतान मृत्यु को प्राप्त करेगी, ऐसी चेतावनी मोसीस के माध्यम से दी। अंत में राजा का ही प्रथम जन्मा पुत्र मृत्यु को प्राप्त हुआ और इस घटना से फेरो भयभीत हो गया। उसने मोसीस को अपने मित्रों के साथ इजराइल जाने की अनुमति दे दी। मोसीस पैगम्बर हजारों यहूदियों को लेकर इजराइल की ओर रवाना हुए, पर रानी के क्रोध से इजिप्त के राजा ने सेना के साथ मोसीस का पीछा किया। मोसीस हजारों लोगों के साथ समुद्र किनारे खड़े थे, पीछे सेना थी। अंत में मोसीस ने ईश्वर से प्रार्थना की और लकड़ी को समुद्र के पानी से स्पर्श करवाया। समुद्र ने मार्ग दे दिया और पानी दो भाग में बंट गया। मोसीस के तमाम आदमी समुद्र के उस पार पहुँच गए, लेकिन तुरंत ही समुद्र ने रौद्र रूप धारण किया और इजिप्त के  फेरो की सारी सेना समुद्र के पानी में डूब गई।

पोसीडोन एडवेंचर

पोसीडोन ग्रीकों के समुद्री देवता हैं। वे छह बच्चों में से एक थे। संसार पर शासन करने के लिए बँटे हुए भाग में उनके हिस्से में समुद्र पर शासन करना आया। वे मात्र समुद्र के ही देवता न थे, बल्कि भूकम्प के भी देवता थे। समुद्र में गोता लगाने जाते लोग पासीडोन की प्रार्थना करते थे, किंतु पोसीडोन एक मूडी देवता थे। वे सनकी थे। जब वे खुश होते थे, तब पानी में नई जमीन, नए टापू तैयार करते थे। जब वे गुस्से में होते थे, तब प्रलय ला देते थे। विशेष रूप से जब वे अधिक क्रोधित होते थे, तो समुद्र में तूफानी लहरें ला देते थे और समुद्र के किनारे बसी धरती पर बहुत नुकसान पहुँचाते थे। भूकम्प की विनाश लीला दिखाते और समुद्री जहाजों को नष्ट कर देते थे।

कहीं ये ग्रीक देवता फिर से तो क्रोधित नहीं हो गए? - ग्रीक लोग ऐसा ही कुछ सोच रहे हैं।

एटलांटीस की दंतकथा

ऐसी मान्यता है कि एटलांटीस का टापू ग्यारह हजार वर्ष तक अस्तित्व में था। यह टापू एटलांटीक महासागर के बीचोबीच था। यह अनेक लोगों के लिए व्यापार का एक अच्छा केन्द्र था। कहा जाता है कि एक भयानक भूकम्प आया और एटलांटीस टापू को अपने साथ डूबा ले गया। उस समय समुद्र से ज्वालामुखी फूटने के कारण सैंकड़ो फीट ऊँची समुद्री लहरें उठी थीं और किनारे की ओर महाविनाश की स्थिति बनी थी। आज इस टापू का अस्तित्व ही नहीं है।

द्वारका और मोहनजोदड़ो

पाँच हजार वर्ष पूर्व भगवान श्रीकृष्ण्ण अपने जीवन के उत्तारार्ध में द्वारका के राजा बने और स्थायी रूप से वहाँ बस गए। पृथ्वी लोक छोडने के पूर्व भगवान श्रीकृष्ण ने अपने कुल का नाश करने की भी व्यवस्था कर ली थी। श्रीमदङ्ढ् भागवत कथा में कहा गया है कि पृथ्वी पर अवतार लेने वाले तमाम अवतारों ने शायद इस भय से कि आने वाली पीढ़ी कैसी होगी, अपने कुल का संपूर्ण नाश कर दिया था। यही कारण है कि आज श्रीराम या श्रीकृष्ण किसी के भी कोई वंशज इस धरती पर नहीं है। पहले श्रीकृष्ण स्वर्ग सिधारे और उसके बाद यादव आपस में ही लड़ मरे और एक महासमुद्री भूकम्प में संपूर्ण द्वारका नगरी समुद्र में डूब गई। आज उसके मात्र अवशेष रह गए हैं। किसी जमाने को महा वैभवशाली नगर मोहनजोदड़ो भी आज काल के गाल में समा चुका है।

भगवान श्रीकृष्ण की द्वारका डूबो देने वाला, इजिप्त के फेरो की सेना का विनाश करने वाला, भगवान  विष्णु के मत्स्यावतार के समय प्रलयंकारी विनाश करने वाला, पूरे के पूरे एटलांटीस टापू को डूबोने वाला और ग्रीकों के दरियाई देवता पोसीडान- ये सभी आज फिर कोपायमान क्यों हो रहे हैं?

बाइबिल से लेकर भारत के अनेक धर्मशास्त्र और कुरान में भी प्रलय की चेतावनी दी गई है। आने वाले समय की कहीं यह पहली पदचाप तो नहीं?


? डॉ। महेश परिमल