संस्करण: 21 मार्च -2011

 

बैंकों की कार्यप्रणाली

में सुधार हो

? डॉ. सुनील शर्मा

 

र्ष केन्द्र सरकार का बहुप्रतीक्षित खाद्य सुरक्षा अधिनियम लगभग तैयार है तथा खाद्य मंत्रालय का  कहना है कि अनाज की जगह नगद सब्सिडी का वितरण किया जाए। केन्द्र द्वारा वर्ष 2011-12 के बजट में किसानों को फर्टिलाइजर सब्सिडी और गरीबों को एल.पी.जी. पर नगद सब्सिडी देने का ऐलान किया है। वास्तव में केन्द्र सरकार के जनहितेषी कदमों की श्रृंखला में ये महत्वपूर्ण कार्य सिद्व होगें। लेकिन प्रश्न चिन्ह तो ये है कि यह नगद सब्सिडी सुपात्र हितग्राही के हाथों तक कैसे पहुचेगी ? इसका सीधा सा उत्तर है कि इन सबके बैंक खाते खोलकर सब्सिडी की राशि खाते मे जमा करा दी जाए। गरीबों और किसानों को नगद सब्सिडी का फायदा दिलाने का यह सबसे सहज और निरापद तरीका हो सकता है, क्योंकि गरीबों को नगद राशि या चैक वितरण से आधी राशि दलालों के हिस्से में जाएगी। क्रेन्द्र सरकार के इन दोनों कार्यक्रमों का फायदा देश के वंचित वर्ग को मिल सके इसके लिए अगले दस माह के दौरान बैंकों में करोड़ों की सॅख्या में नए खाते प्रारम्भ करना पड़ेगें तथा नगद धन स्थानांतरण की व्यवस्था के लिए बैंको को इंटरनेट सुविधाओं से लेस करना पड़ेगा। लेकिन बैंकों की वर्तमान व्यवस्था और कार्यप्रणाली से महसूस होता है कि यह कार्य वर्षों में भी संभव नहीं है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश के अधिकांश बैंक किसान क्रेडिट कार्ड जैसी महत्वाकांक्षी योजनाओं का लक्ष्य भी पूर्ण नहीं कर पाते हैं। इस संदर्भ में रिर्जव बैंक ऑफ इंडिया द्वारा जारी की रिपोर्ट स्पष्ट हुआ है कि वर्ष 2009-10 में सरकारी और निजी क्षेत्र के आधो से ज्यादा बैंक किसानों को कर्ज देनें के मामले में फिसड्डी साबित हुए हैं। रिपार्ट के अनुसार बैंक ऑफ बड़ौदा, सेन्ट्रल बैंक ऑफ इंडिया, यूनियन बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक जैसे बड़े बैंक भी इसमें शामिल है। कुल मिलाकर सरकारी क्षेत्र के 27 में से 15 एवं निजी क्षेत्र के 22 में से 11 बैंक कृषि के लिए पर्याप्त कर्ज नहीं बॉट पा रहें हैं।

बैंकिंग व्यवस्था का लाभ लेने के लिए पहली शर्त होती है कि हितग्राही का बैंक में खाता होना चाहिए। लेकिन आम आदमी के लिए बैंक में खाता खुल वाना बहुत ही कठिन कार्य है,इसके लिए उसे काफी चक्कर काटना पड़ता है खाता खोलने की तमाम औपचारिकताओं जैसे पहचान पत्र, पते का सत्यापन और किसी पुराने खाताधारी से पहचान का प्रमाणपत्र लेना पूर्ण करना पड़ता है।अगर बैंक द्वारा निर्धारित कागजात नहीं है तो खाता नहीं खुलेगा। रिजर्व बैंक द्वारा पुराने खाताधारी के परिचायक की औपचारिकता में शिथिलता दी है लेकिन बैंकों में यह अब भी अनिवार्य है। अगर खाता खुल गया तो फिर न्यूनतम बैंलेस का रगड़ा बैंको ने नियम बनाया है कि किसी भी खाताधारी के खाते में एक न्यूनतम निर्धारित राशि से कम राशि हुई तो जुर्माना राशि काट ली जाएगीं। बैकों के इस फंदे का शिकार गरीब, किसान और विद्यार्थी ही हो रहें है। एक तरफ तो रिजर्व बैंक इन वगों के लिए जीरो बैंलेस खाते की बात करता है दूसरी ओर बैंके न्यूनतम् बैंलेंस की कैंची चला रहीं हैं। वास्तव में किसी भी खाते के लिए न्यूनतम निर्धारित राशि का बंधन गलत और लूट की श्रेणी में माना जाना चाहिए। आजकल विद्यार्थियों को छात्रवृति चैक या बैंक खाते के जरिये दी जाती है इसके लिए इन्हें खाता खूलवाना पड़ता है तब इनसे भी तमाम औपचारिकताए मांगी जाती हैं एवं अपने पालकों के साथ चक्कर पर चक्कर काटने पड़ते हैं जबकि विद्यार्थियों के खाते के लिए उसका परिचय पत्र ही पर्याप्त होना चाहिए  तथा बैंकों को शिक्षण संस्थाओं में कैंप लगाकर विद्यार्थियों के खाता खोलने की व्यवस्था करना चाहिए। किसानों के मामले में उनकी भूअधिकार पुस्तिका ही पर्याप्त दस्तावेज माना जाना चाहिए तथा गांव गांव कैंप लगाकर खाता खोलने  की व्यवस्था बनना चाहिए। मजदुर और भुमिहीन वर्ग के लिए किसी सरकारी योजना का हितग्राही होने का कागज ही खाता खोलने के लिए मान्य दस्तावेज बनना चाहिए। बैकिंग कर्मचारियों की गैर जिम्मेदाराना कार्यप्रणाली भी उपभोक्ताओं को परेशानी और आर्थिक नुकसान का सबब बन रही है। क्योंकि उपभोक्ता भले ही पूरी जानकारी दे दे परन्तु यह बैंक कर्मचारी पर निर्भर है कि वह अपने कम्यूटर कितना फीड करता है? जैसे कि इंटरनेट बैंकिग के दौर खाताधारी के हस्ताक्षरों का स्केन चित्र होने से लेन देन की प्रक्रिया त्वरित हो जाती है। लेकिन बैंकों में इस कार्य के प्रति उदासीनता प्रदर्शित की जाती है जब तक खाताधारी अनेक चक्कर न काट ले तब तक यह स्केन रिकार्ड तैयार नहीं किया जाता है। बैंको का नियम है कि ऐसे उपभोक्ता जिनके खातों या एफडी पर सालाना पॉच हजार से ज्यादा ब्याज मिलता है वो आयकर विभाग द्वारा दिए गए प्रपत्र को भरें तथा पैन क्रमांक का उल्लेख करें, उपभोक्ता यह जानकारी बैंक को देता है अब मर्जी बैंक कर्मचारी की कि वो इसे रिकार्ड में रखता है या नहीं? उपभोक्ता को तो टैक्स कटने पर पता चलता है और बैंक कर्मचारी का सीधा जवाब रहता है आपने फलां जानकारी जमा नहीं की थी इसलिए आपका पैसा कट गया। बैकों द्वारा अनेक ऐसे चार्ज काट लिए जाते हैं जिनका उपभोक्ता को कोई अंदाज ही नहीं रहता है खासकर बैंको से ऋण लेने वाले उपभोक्ताओं के साथ ऐसा होता है। कुल मिलाकर प्रतीत होता है कि बैकों के राष्ट्रीयकरण के पचास बाद भी आम आदमी बैंकों की प्राथमिकता में नहीं है और उसे बोझ समझा जाता है,जबकि बैंकिग की व्यवस्था एवं प्रक्रिया में सरलीकरण आम आदमी के जीवन स्तर को सुधारने का एक औजार बन सकता है।


? डॉ. सुनील शर्मा