संस्करण: 21 फरवरी -2011

विश्वग्राम में बढ़ता नस्लभेद

? प्रमोद भार्गव

 

पूरी दुनिया में मानवाधिकारों की वकालात करने वाले व उसकी शर्तें विकासशील देशों पर थोपने की तानाशाही बरतने वाले अमेरिका की सरजमीं पर नस्लवाद कितना वीभत्स है, यह हाल ही में अमेरिका के ट्राई वैली नामक फर्जी विश्व विद्यालय में पढ़ने वाले भारतीय छात्रों के टखनों में 'वितंतु पट्टा' (रेडियो कॉलर) पहनाकर उन पर नजर रखने के पशुवत व्यवहार के रूप में सामने आया है। इस दंभी आचरण की कार्यशैली को क्या कहा जाए, अमेरिकी मानव प्रजाति को सर्वश्रेष्ठ जताने की हठी कोशिश अथवा इस अमानवीय बद्तमीजी को नस्लभेदी मानसिकता का पर्याय माना जाए ? क्योंकि पश्चिमी देशों में अब ये घटनाएं रोजमर्रा का हिस्सा बनती जा रही हैं। दरअसल भारतीयों की श्रमसाध्यर् कत्ताव्यनिष्ठा का लोहा वैश्विक परिप्रेक्ष्य में दुनिया मान रही है। परंतु भारतीयों का नियोक्ता राष्ट्र के प्रति यही समर्पण और शालीन सज्जनता कुछ स्थानीय चरमपंथी समूहों के लिए विपरीत मनस्थितियां पैदा करती है। जिसके तईं स्थानीय नागरिक भारतीयों की अपने देशों में प्रभावशाली उपस्थिति को मौलिक अधिकारों के हनन के रूप में देखते हैं और जाने अनजाने ऐसा बर्ताव कर जाते हैं जो नस्लभेद के दायरे में आता है। अमेरिका और आस्ट्रेलिया में जहां ऐसी घटनाओं का अंजाम छात्रों के साथ हिंसक व्यवहार के रूप में सामने आ रहा है, वहीं ब्रिटेन में सिख समुदाय के लिए पगड़ी और कटार धारण नस्लभेदी संकट का कारक बन रहे हैं। विश्वग्राम के बहाने साम्राज्यवादी अवधारणा के ये ऐसे सह-उत्पाद हैं, जो यह तय करते हैं कि धर्मनिरपेक्षता राष्ट्राध्यक्षों का मुखौटा है। उसके भीतर जातीय और नस्लीय संस्कार तो अंगड़ाई लेते ही रहते हैं।

आज कमोबेश पूरी दुनिया में वैश्विक व्यापार की विस्तारवादी सोच की आड़ में राजनैतिक चेतना, समावेशी उपाय करने में पिछड़ती दिखाई दे रही है। परिणामस्वरूप सामाजिक सरोकार और प्रगतिशील चेतनाएं हाशिये पर धकेल दी जा रही हैं। उपेक्षापूर्ण कार्यशैली की यही परिणति प्रतिरोधी शंखनाद का ऐसा चेहरा है जो मनुष्यताद्रोही है। बाजारवादी संस्कृति की यह क्रूरता और कुरूपता सांस्कृतिक बहुलतावाद को भी आसन्न खतरा है। योरोपीय मूल के लोगों में ही नहीं एशियाई और दक्षिण व मध्य एशियाई मूल के लोगों में भी प्रतिरोध की यह धारणा बलवती हो रही है। अरब देशों में हिंसक प्रदर्शन और सूडान का विभाजन इसके ताजा उदाहरण हैं।

अमेरिका में भारतीय छात्रों के साथ घृण के व्यवहार की शुरूआत एक अभियान के तहत आंध्रप्रदेश के छात्र श्रीनिवास चिरकुरी की हत्या के साथ करीब डेढ़ दशक पहले हुई थी। दो अज्ञात अमेरिकी युवकों ने उसे जिंदा जलाकर मार डाला था। यह वीभत्स घटना उस समय घटी थी जब श्रीनिवास अमेरिका के नेबादा राज्य विश्वविद्यालय परिसर की प्रयोगशाला में प्रयोगों में तल्लीन था। हत्यारे हमलावर युवकों ने उसके शरीर पर ज्वलनशील पदार्थ डालते हुए कहा भी था कि हम विश्वविद्यालय में किसी विदेशी छात्र को नही रहने देना चाहते। अमेरिका में हिंसक हो रही युवा पीढ़ी की यह कुंठा थी, जो आवेग में अनायास ही हत्यारे युवकों की जबान पर आ गई थी। मंदी की जबरदस्त मार झेल रहे अमेरिका के मौजूदा हालातों में बेरोजगारी की दर 9 से 15 फीसदी के बीच डोल रही है। ऐसे में रोजगार की हकमारी कर रहे विदेशी युवकों के प्रति अमेरिकी युवकों की दमित कुंठा या अधिकारियों का जंगली व्यवहार क्या कहर ढाएंगे यह तो आने वाला समय ही तय करेगा। लेकिन ये घटनाएं ऐसी चेतावनियां है जो नस्लभेद और जन्मजात जातीय संस्कारों के वजूद के प्रति सचेत करती हैं। ये घटनाएं इस बात का भी संकेत हैं कि यदि पूंजीवादी सरकारों के हित साधन के लिए बहुसंख्यक समाज को वंचित बनाए जाने की नीतिबध्द योजनाएं इसी तरह क्रियान्वित होती रहीं तो कई देशों में वंचितों की बढ़ती दर जातीय और सांप्रदायिक वैमनस्यता के बूते गृहयुध्द के हालात पैदा कर देगी। भारत में बढ़ता व फैलता नक्सलवाद ऐसी ही एकपक्षीय सरोकारों से जुड़ी नीतियों की देन है। इन नीतियों के निहितार्थ दुनिया की आबादी को भोगवादियों की संख्या में समेट देने में भी निहित हैं।

अमेरिका में रंगभेद, जातीय भेद व वैमनस्य का सिलसिला नया नहीं है। इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। इन जड़ों की मजबूती के लिए इन्हें जिस रक्त से सींचा गया था वह भी अश्वेतों का था। हाल ही में अमेरिकी देशों में कोलंबस के मूल्यांकन को लेकर दो दृष्टिकोण सामने आए हैं। एक दृष्टिकोण उन लोगों का है जो अमेरिकी मूल के हैं और जिनका विस्तार व वजूद उत्तारी व दक्षिणी अमेरिका के अनेक देशों में है। दुसरा दुष्टिकोण या कोलंबस के प्रति धारण उन लोगों की है जो दावा करते हैं कि अमेरिका का अस्तित्व ही हम लोगों ने खड़ा किया है। इनका दावा है कि कोलंबस अमेरिका में इन लोगों के लिए मौत का कहर लेकर आया। क्योंकि कोलंबस के आने तक अमेरिका में इन लोगों की आबादी बीस करोड़ के करीब थी, जो अब घटकर दस करोड़ से भी कम रह गई है। इतने बड़े नरसंहार के बावजूद अमेरिका में मौजूदा इस हिंसक प्रवृत्ति से अमेरिका अभी भी मुक्त नहीं हो पाया है, यह भारतीय छात्रों के दखनों में वितंतु पट्टा बांधने की घटना से साबित होता है।

फौरी तौर से इस घटना को न तो राजनीतिक दृष्टिकोण से देखना चाहिए और न ही राजनीतिक रंग देने की कोशिश करनी चाहिए। वैसे भी ऊपरी तौर से यह घटना प्रशासनिक अव्यवहार से जुड़ी है। हमारे विदेश मंत्री एसएम कृष्णा ने इस घटना को अमानवीय बताकर इतिश्री कर ली है। जबकि इस पर सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ही तरफ से मजबूत प्रतिरोध जाहिर होना चाहिए था। यह इसलिए जरूरी था क्योंकि विश्वविद्यालय के गैरकानूनी होने की तसदीक केवल अमेरिका के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में था। छात्रों के अपराधी होने का तो कोई आधार ही नहीं बनता। इसके बावजूद उनसे मनुष्य विरोधी आचरण किया गया। राजनेताओं के कमोबेश खामोश रवैये से साबित होता है कि हमारे नेता कितनी सतही, विदेशी दबाव से प्रभावित और पक्षपातपूर्ण राजनीति करते हैं। दरअसल अमेरिका ने भारत और अन्य तीसरी दुनिया के देशों को जानवरों की तरह हांक लगाकर दबाव का जो वातावरण बनाया है उससे अमेरिकी जनमानस में इन देशों के प्रति दोयम दर्जे का रूख अपनाने की मनोवृत्ति पनपी है। अमेरिकियों में पैदा हुए इस मनोविज्ञान के चलते भारतीय मूल के छात्रों व अन्य अप्रवासियों के खिलाफ वैमनस्य का माहौल तैयार हुआ है, जिसकी परिणति अब क्रूरता के रूप में घटित हो रही है।

इस घटना के लिए विदेशी शिक्षा हासिल करने की वह भारतीय मानसिकता भी जिम्मेबार है, जो जोखिम उठाने से भी नहीं कतराती। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह भी है कि हमारे देश से जो प्रतिभावान छात्र पलायन कर योरोपीय देशों में पहुंचते हैं, वे जिस किसी भी बौध्दिता से ताल्लोक रखने वाले क्षेत्र में हों अपने विषयी कार्यक्षेत्र में इतने दक्ष औरर् कत्ताव्य के प्रति इतने सजग रहते हैं कि अपनी सफलताओं और उपलब्धियों से वे खुद तो लाभान्वित होते ही हैं, नियोक्ता राष्ट्रों को भी लाभ पहुंचाने में कोई कोर कसर नहीं छोड़ते। अलबत्ता इतना जरूर है कि इन भारतीयों ने अपनी कर्मठता व योग्यता से जो प्रतिष्ठा व सम्मान अमेरिका, ब्रिटेन अथवा आस्ट्रेलिया की धरती पर अर्जित किया, वही अब इनके लिए अभिशाप साबित हो रहा है। क्योंकि इन समर्पित भारतीय मूल के बौध्दिकों ने अमेरिकी व ब्रिटेन मूल के बौध्दिकों को कहीं बहुत पीछे खदेड़ दिया हैं। बौध्दिक वजूद की भारतीय और योरोपीय मूल के छात्रों के बीच प्रचलित इस होड़ में जब योरोपीय छात्र पिछड़ रहे हैं तो उनकी मनोवृत्ति में बदलाव आ रहा है। अब ये छात्र हमारी बिल्ली हमसे ही म्यांऊ की तर्ज पर भारतीय छात्रों को आतंकित कर रहे हैं।

जानकारी तो यहां तक मिल रही है कि अमेरिका, ब्रिटेन और आस्ट्रेलिया में नस्लीय आतंक और हिंसा में लगातार इजाफा हो रहा है। फलस्वरूप प्रतिक्रियावादी संगठन भी इन देशों की धरती पर खड़े हो रहे हैं। 'क्लू क्लाक्स क्लोने' और 'स्किन हैड' जैसे हथियारों से लैस संगठन वजूद में आ गए हैं। जो नस्लभेद से जुड़ी हिंसक वारदातों को अंजाम देने में लगे हैं। अमेरिका शासन तंत्र को इन कट्टर जातिवादी संगठनों की जानकारी है। भारतीय मूल के लोग भी प्रशासन को ज्ञापन देकर ध्यान आकर्षित कर चुके हैं।

इस समय तीन चीजें कथित विश्वग्राम में तब्दील कर दी गई तीसरी दुनिया के देशों को झकझोर रही है। एक एडम स्मिथ द्वारा रचित अमेरिकी हित साधक पूंजीवादी अर्थशास्त्र, दूसरा नवऔद्योगिक व प्रौद्योगिक साम्राज्यवाद और तीसरा विदेशी अंग्रेजी शिक्षा का सम्मोहन। इन तीन परिवर्तनकारी कारकों ने इराक, वियतनाम, कोरिया और अफगानिस्तान को धूल-धवस्त किया। पाकिस्तान और मिश्र इन कारकों की आंधी में झुलस रहे हैं। भारत का परंपरागत समाज इसी प्रगति और विकास के बहाने अपनी अकूत प्राकृतिक संपदा को बहुराष्ट्रीय कंपनियों को दोहन की खुली छूट देकर अपने पैरों में खुद ही कुल्हाड़ी मार रहा है। नतीजतन हम अपने प्राकृतिक संसाधनों को वैश्विक आर्थिकी के मायावी छल के चलते 10-12 प्रतिशत की तेज गति से खोते जा रहे हैं। दुनिया में आई आर्थिक मंदी ने वैश्विकरण के जन विरोधी चेहरे को बेनकाब भी कर दिया है। इसके बवजूद हम हैं कि अमेरिकी पूंजीवादी अर्थशास्त्र और विदेशी शिक्षा को राम की खड़ाऊं मानकर चल रहे हैं। इससे मुंह मोड़ने के सार्थक नीतिगत उपाय नहीं किए गए तो पश्चाताप के आंसू निकालना भी मुश्किल होगा।


? प्रमोद भार्गव