संस्करण: 21 फरवरी -2011

उपवास का उपहास

? महेश बाग़ी

 

रह-तरह की नौटंकिया कर मीडिया की सुर्खियां बटोरने वाले मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान इस बार अपने ही बुते जाल में फंस गए। केन्द्र सरकार पर पक्षपात का आरोप लगा कर वे सविनय उपवास पर बैठने जा रहे थे। इसके प्रचार-प्रसार से लेकर आंदोलन तक की सारी तैयारियां कर ली गई थीं, किंतु ऐन मौके पर शिवराज ने क़दम पीछे खींच लिए और कहा कि प्रधानमंत्री के आश्वासन पर वे उपवास स्थगित कर रहे हैं। शिवराज की इस नौटंकी का सबसे रोचक पहलू यह है कि भाजपा नेता ही उनके इस क़दम को पचा नहीं पा रहे हैं और कुछेक नेताओं ने तो खुल कर विरोध भी जताया। इस पूरे प्रकरण में संघ भी उनसे नाराज़ दिखाई दिया और शिवराज अलग-थलग पड़ गए।

दरअसल, शिवराज सिंह यह तय ही नहीं कर पा रहे हैं कि उन्हें या उनकी सरकार को क्या करना है। आए दिन नई-नई नौटंकियां कर मीडिया में छाए रहने की उनकी मानसिकता इस बार उन्हीं पर भारी पड़ गई। वे केन्द्र सरकार पर आरोप लगाते रहे हैं कि वह मध्यप्रदेश के साथ पक्षपातपूर्ण रवैया अपना रही है और राज्य को पर्याप्त मदद नहीं दे रही है। लेकिन यह सच नहीं है। आंकड़े गवाह हैं कि भाजपा नेतृत्व वाली राजग सरकार में मध्यप्रदेश को जितनी केन्द्रीय सहायता मिली, उससे अधिक सहायता संप्रग सरकार के दौरान मिली है। कई मामलों में तो यह तथ्य भी सामने आया कि सरकार मिले धन का उपयोग ही नहीं कर पाई और वह 'लेप्स' हो गया। मनरेगा में मिली धनराशि में तो इतना भ्रष्टाचार किया कि खुद राज्य सरकार को चंद अधिकारियों के विरुध्द कार्रवाई करने को मजबूर होना पड़ा। इसके बावजूद सरकार नहीं जाग पाई और अब भी मनरेगा में भ्रष्टाचार की ख़बरे छन-छन कर आ रही है।

ऐसी स्थितियों में शिवराज सिंह का केंद्र पर पक्षपात का आरोप लगाना न सिर्फ़ निराधार है, बल्कि दुर्भावनापूर्ण भी है। यदि वास्तव में केन्द्र राज्य के साथ पक्षपात कर रहा है, तो भाजपा सांसद यह मामला संसद में क्यों नहीं उठाते ? यह सवाल उस समय भी उठा था, जब कोयले की कथित कमी को लेकर शिवराज ने 'न्याय यात्रा' की नौटंकी की थी। भाजपा सांसदों ने इस मामले में भी संसद में मौन साधे रखा था। इसकी वजह यह है कि यदि यह मामला सदन में उठाया जाता, तो सच्चाई सामने आ जाती। सच्चाई यह है कि तब राज्य सरकार ने कोयला कंपनियों की उधारी नहीं चुकाई थी और उधारी पर फिर कोयला मांग रही थी। किसानों को राहत देने के लिए केंद्र से जो राशि मिली है, राज्य सरकार उसका वितरण करने में भी नाकाम रही है। उस पर तुर्रा यह कि शिवराज और अधिक धनराशि की मांग कर बैठे, जो पूरी न होने पर उपवास करने की घोषणा कर दी।

शिवराज के उपवास का आयोजन पूर्णत: राजनीतिक उद्देश्य की पूर्ति के लिए था, लेकिन इसमें प्रशासनिक अमले को भी झोंक दिया गया। आला अफ़सरान से लेकर दिहाड़ी मज़दूर तक आयोजन की तैयारी में जुट गए। जंबूरी मैदान में मुख्यमंत्री के लिए एक विशेष कक्ष का निर्माण रातों-रात किया गया। यहीं पर सभा कक्ष भी बनाया गया, जहां कैबिनेट की बैठक करने की तैयारी थी। यहीं पर विशाल मंच भी बनाया गया। राजधानी में बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाए गए। इतनी सारी तैयारियों के बाद जब उपवास पर बैठने की बारी आई तो शिवराज ने प्रधानमंत्री के आश्वासन का हवाला देकर उपवास स्थगित करने की घोषणा कर डाली। मंच पर बैठे भाजपा नेता शिवराज के इस क़दम से अवाक रह गए। उपवास स्थगित करने से पहले उन्होंने संगठन को भी विश्वास में लेना ज़रूरी नहीं समझा। सत्ता और संगठन में दरार का नज़ारा आम हो गया और शिवराज अपने लाव-लश्कर के साथ वापस लौट गया।

सवाल यह है कि जब शिवराज सिंह को उपवास पर बैठना ही नहीं था, तो इसकी इतनी बड़ी तैयारी क्यों की गई ? आयोजन स्थल पर जो सरकारी धन फूंका गया, उसकी भरपाई कौन करेगा ? जब यह आयोजन भाजपा का था, तो उसमें प्रशासनिक अमले को क्यों झोंका गया ? क्या इन अधिकारियों के ख़िलाफ़ कार्रवाई करने की ज़हमत सरकार उठाएगी ? ये वे सवाल हैं, जिनका सरकार के पास कोई जवाब नहीं है। कांग्रेस ने मांग की है कि इस आयोजन की तैयारियों पर ख़र्च किए गए धन की वसूली मुख्यमंत्री से की जाए। यहां यह बताना ग़ैर जरूरी नहीं होगा कि मध्यप्रदेश के संसदीय इतिहास में शिवराज सिंह चौहान पहले ऐसे मुख्यमंत्री है, जो सरकारी ख़जाने से घर का ख़र्चा उठा रहे हैं। आरटीआई के तहत मांगी गई जानकारी से ख़ुलासा हो चुका है कि मुख्यमंत्री निवास में सरकारी धन का किस तरह दुरुपयोग हो रहा है। ऐसे मुख्यमंत्री से पार्टी के आयोजन पर हुए खर्च की भरपाई की उम्मीद कैसे की जा सकती है ?

जो सरकार अपने दायित्वों से किनारा कर पंचायतों, महापंचायतों, इन्वेस्टर्स समिट और अंत्योदय मेलों की नौटंकियों में ही व्यस्त हो, उस सरकार से प्रदेश के विकास की उम्मीद कैसे की जा सकती है ? अपनी नाकामियों का ठीकरा केन्द्र के माथे मढ़ना और विरोध की नौटंकियां करना इस सरकार का शग़ल बन गया है। लेकिन इस बार शिवराज मदारी की बजाय बंदर बन कर उपहास के पात्र बन गए। उपवास मामले में मुंह की खाने के बाद शिवराज सिंह से यह अपेक्षा की जा सकती है कि वे व्यर्थ की नौटंकियों से बाज आएं और प्रदेश के विकास पर ध्यान लगाएं। बेलगाम होती नौकरशाही और भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे अधिकारियों पर नकेल डालें। यदि अब भी वे नहीं जागे, तो इतिहास में उन्हें एक नौटंकीबाज़ और निकृष्ट मुख्यमंत्री के रूप में ही याद किया जाएगा।


? महेश बाग़ी