संस्करण: 21 फरवरी -2011

अनशन के नाटक से हुई चौहान और भाजपा की जगहंसाई
 

? एल.एस.हरदेनिया

 

ध्यप्रदेश तो क्या, पूरे देश में शायद ही कोई मुख्यमंत्री इतनी मखौल और दया का पात्र बना होगा, जितना कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को बनना पड़ा। शिवराज सिंह चौहान ने केन्द्र सरकार के विरूध्द अपना आक्रोश प्रगट करने के लिए 13 फरवरी से अनिश्चितकालीन अनशन प्रारंभ करने की घोषणा की थी। परंतु परिस्थितियों ने कुछ ऐसा मोड़ लिया कि प्रारंभ होने के पहले ही अनशन स्थगित हो गया। स्थगित की घोषणा भी इतनी जल्दबाजी में करनी पड़ी कि वह अपने आप में मखौल का कारण बन गई।

मंच पर बैठे अनेक नेताओं, जिनमें भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष प्रभात झा भी शामिल थे, को भी पता नहीं था कि मुख्यमंत्री अनशन को स्थगित करने वाले हैं।

वैसे तो ऊपरी तौर पर यह बताया गया कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आश्वासन पर अनशन स्थगित किया गया। परंतु कुछ विश्वस्त सूत्रों के अनुसार स्थगन का असली कारण कुछ और है। 13 फरवरी को अनशन प्रारंभ करने के पूर्व मुख्यमंत्री, राज्यपाल से मिलने राजभवन पहुचे। वहां राज्यपाल ने उन्हें सलाह दी कि वे अनशन पर न बैठें। इसका अच्छा परिणाम नहीं होगा। बताया गया कि राज्यपाल ने उन्हें सूचित किया कि उन्होंने केन्द्र को जो रिपोर्ट भेजी है, उसमें उन्होंने इस बात की आशंका जताई है कि मुख्यमंत्री के अनशन से प्रदेश का शासन ठप्प हो सकता है और कहीं  ऐसा न हो कि मजबूरी में राज्य में राष्ट्रपति शासन लागू करना पड़े। राज्यपाल ने अप्रत्यक्ष रूप से यह भी चेतावनी दी थी कि कहीं यह मुख्यमंत्री की पार्टी के ही किसी नेता का षडयंत्र न हो। राज्यपाल ने मुख्यमंत्री से मिलने के पहिले प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह से भी बात की और उनसे यह अपेक्षा की कि वे इस मामले में हस्तक्षेप करें और प्रदेश को यथासंभव सहायता दें। इस पर प्रधानमंत्री ने कहा कि राज्य की ओर से पूर्व में दी गई राशि का हिसाब-किताब प्राप्त हो तो आगे सहायता दी जाय। राज्यपाल ने प्रधानमंत्री से मुख्यमंत्री की बात भी करवाई। उन्होंने मुख्यमंत्री ने हर संभव सहायता का आश्वासन दिया और थोड़ी देर में दिये गये आश्वासन को फैक्स के माध्यम से मुख्यमंत्री के निवास पर पहुचाया। राज्यपाल से मिलने और प्रधानमंत्री से बातचीत के बाद मुख्यमंत्री धरना स्थल पर पहुचे। मुख्यमंत्री के पहुचते ही प्रभात झा ने शायद मन में यह कहते हुये उन्हें तिलक लगाया कि चढ़ जा बेटा सूली पर। परंतु प्रभात झा को इस बात का रंच मात्र भी ज्ञान नहीं था तो कुछ ही क्षणों में मुख्यमंत्री अनशन प्रारंभ नहीं बल्कि स्थगन की घोषणा करने वाले हैं।  

यह भी बताया गया है कि मुख्यमंत्री ने अनशन स्थगन का निर्णय करने के पहिले भाजपा के अखिल भारतीय नेताओं से संपर्क कर उनसे सलाह मशविरा किया। उन्होंने भी मुख्यमंत्री को अनशन स्थगित करने का मशविरा दिया। अनशन स्थल पर अपने भाषण के प्रारंभिक दौर में उन्होंने केन्द्र सरकार की आलोचना की और अपने भाषण के अंत में प्रधानमंत्री के आश्वासन का उल्लेख करते अनशन के स्थगन की घोषणा कर दी। इस घोषणा को सुनकर प्रभात झा समेत अनेक नेताओं के होश उड़ गये। बाहर से आये पार्टीजन आक्रोशित और निराश हो गए।

जिस तरह से अनशन के स्थगन की घोषणा की गई, वह पार्टी के अनेक वरिष्ठ नेताओं को पसंद नही आया। प्रभात झा  के अतिरिक्त पूर्व मुख्यमंत्री कैलाश जोशी ने इस संबंध में मुख्यमंत्री से अपनी नाराजगी जाहिर की । उन्होंने मुख्यमंत्री से कहा कि खुद के भाषण के बाद उन्हें स्थगन की घोषणा की जिम्मेदारी प्रभात झा को देनी चाहिए थी।

जिस ढंग से अनशन के स्थगन की घोषणा की गई वह तो मखौल का सबब बना ही, अनशन स्थल पर जो भारी भरकम इंतजाम और साज सज्जा की गई थी, वह भी चर्चा का विषय बन गया था। जो इंतजाम अनशन स्थल पर किये गये थे उनसे लगता था कि पूरी की पूरी सरकार अनशन पर बैठ रही है। अनशन स्थल पर मुख्यमंत्री का कक्ष, मंत्रिमंडल की बैठकों के लिए कक्ष व अधिकारियों के लिए कक्ष बनाये गये थे। आम लोग कह रहे थे कि अनशन के लिए वैसे ही इंतजाम किये गये थे जैसे किसी पांच सितारा होटल में होते है। अनशन प्रारंभ होने के पूर्व भी कुछ दिलचस्प घटनायें हुईं। जैसे कुछ लोगों का आरोप है कि प्रभात झा ने मुख्यमंत्री से बगैर पूछे ही उनके अनशन की घोषणा कर दी थी। यह भी बताया गया कि घोषणा के करने के बाद मुख्यमंत्री ने अपने मंत्रिमंडलीय सहयोगियों को विश्वास में लिया। जब उन्होंने मंत्रिपरिषद में अपने अनशन के इरादे से सहयोगियों को अवगत कराया तो कुछ मंत्रियों ने सुझाव दिया कि सभी मंत्री संभाग और जिला मुख्यालयों में अनशन पर बैठे। ऐसा करने से पूरे प्रदेश में केन्द्र के विरूध्द वातावरण बनाने में मदद मिलेगी।

ज्ञात हुआ है कि इस सुझाव का मंत्रिपरिषद के वरिष्ठतम सदस्य एवं पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल गौर ने जोरदार विरोध किया। उनका तर्क था कि ऐसा करने से केन्द्र और राज्य के संबंधों में गहरी खटास आ जायेगी। गौर के विरोध के बाद उस सुझाव पर आगे चर्चा नहीं हुई।

अनशन के संबंध में एक और आपत्तिजनक बात सामने आई। अनशन स्थल, भारत हैवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड के स्वामित्व की भूमि पर था। यह कारखाना भारत सरकार के नियंत्रण में है। इस पर कांग्रेस ने यह सवाल उठाया है कि भेल के अधिकारियों ने वहां  अनशन करने की इजाजत क्यों दी।  

धरना स्थल के ठीक सामने कार्मल कान्वेन्ट स्कूल स्थित है। इस स्कूल में तीन हजार से ज्यादा छात्रायें पढ़ती है। अनशन स्थल पर शोर शराबा स्वाभाविक था। इसके अतिरिक्त वहां असामाजिक तत्वों के पहुचने की पूरी संभावना थी। इस तरह स्कूल की छात्राओं की सुरक्षा व पढ़ाई-लिखाई के वातावरण पर विपरीत प्रभाव पड़ने की आशंका थी। स्कूलों की सालाना  परीक्षाएं भी प्रारंभ हो चुकी है। 

एक बात और। अनशन स्थल पर सारी सुविधायें सरकारी खर्च पर जुटाई गई थीं। कांग्रेस का प्रश्न  है कि क्या एक राजनीतिक गतिविधि के लिए सरकारी खर्च उचित है। इसलिए अब मांग उठ रही है कि मुख्यमंत्री स्वयं या पार्टी उस खर्च की भरपाई करें।

कुल मिलाकर अनशन के निर्णय से मुख्यमंत्री और उनकी पार्टी को लाभ कम घाटा ज्यादा हुआ है।


? एल.एस.हरदेनिया