संस्करण: 21 फरवरी -2011

शिवराज का खंड-खंड पाखंड

? विवेकानंद

 

चपन में एक कहानी पढ़ी थी...एक लड़का बार-बार चिल्लाता था शेर आया...शेर आया, लोग परेशान होकर दौड़े चले आते थे। एक बार सचमुच शेर आया और लड़का चिल्लता रहा पर कोई नहीं आया। भारतीय जनता पार्टी के आंदोलन, प्रदर्शन रैलियां और उपवास ठीक ऐसे ही हैं। इन आडंबरों का पाखंड इतनी बार खंड-खंड हो चुका है कि अब लोग इन्हें खास महत्व नहीं देते, लेकिन भाजपा नेता हैं कि बाज नहीं आते। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने किसानों की मदद के लिए केंद्र सरकार विरोध में चार सूत्री मांगों को लेकर सविनय आग्रह उपवास का भव्य आयोजन किया। शिवराज केंद्र के खिलाफ पहले भी इस तरह के उपक्रम करते रहे हैं, उन्हें जन समर्थन भी मिला है लेकिन इस बार इसका कोई खास प्रभाव आम जनता पर नहीं दिखा। उल्टे इसका नुकसान जरूर पार्टी के खाते में जा सकता है। इसका सबसे बड़ा कारण है उपवास का उपक्रम। उपवास साधारण अवस्था में किया जाता है लेकिन शिवराज के उपवास की तैयारियों पर जनता यही देखकर भौचक थी कि जिसका 'उपवास' ऐसा आलीशान है उसका 'मूलवास' कैसा होगा। शिवराज के उपवास स्थल पर 50 लाख रुपए खर्च कर दिए गए और सरकारी मशीनरी 15 दिन तक सब कामकाज छोडक़र सीएम का 'उप-वास' तैयार करने में लगी रही सो अलग। दूसरा कारण उपवास का समय। नि:संदेह मान लेते हैं कि मुख्यमंत्री की मांगें जायज हैं। लेकिन यह अचानक पैदा हुई हों ऐसा बिल्कुल नहीं है। मुख्यमंत्री चाहते थे इससे पहले भी उपवास पर बैठ सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐन 13 फरवरी को उपवास की ठानी क्योंकि 14 फरवरी को प्रदेश की दो विधानसभा सीटों पर वोट डाले जाने थे। पार्टी को सियासी घाटा यदि होता है तो उसका तीसरा सबसे अहम कारण बनेगा लाखों रुपए खर्च करने के बाद उपवास का अचानक रोक देना। शिवराज सिंह चौहान का अचानक उठाया गया यह कदम से न केवल आम जनता बल्कि पार्टी संगठन को भी अटपटा लगा। कहा जा रहा है कि उपवास का भव्य आयोजन प्रधानमंत्री के आश्वासन के बाद रोका गया। लेकिन इसके पीछे की असल कहानी दूसरी है। दरअसल शिवराज सिंह चौहान स्वयं को कानूनी पचड़े में फंसता देख भयभीत हो गए। शिवराज जिस समय उपवास के लिए जाने वाले थे, उन्हें रायपाल ने राजभवन बुलाकर सुप्रीम कोर्ट की उन आधा दर्जन व्यवस्थाओं से परिचित कराया जिनमें लोकसेवक के कर्तव्यों की विधिवत व्याख्या की गई है। इन्हें समझकर शिवराज के होश फाख्ता हो गए और किसान-गरीब प्रेम जाता रहा। दशहरा मैदान में शिवराज ने पर्याप्त आडंवर किया, केंद्र को कोसा भी और उजैन से विशेष से बुलाए पुजारियों से तिलक भी कराया, जबकि वे पहले ही तय करके आए थे अब उपवास पर नहीं बैठना है।

शिवराज सिंह राजनीति के उन चतुर सुजान लोगों में जो जनता की नब्ज जानते हैं, खासतौर पर गांव के भोले-भाले लोगों की। इसलिए वे इस तरह के काम करते रहते हैं जिससे लोगों को उनके समर्पित नेता होने का अहसास होता रहे। इस उपवास आयोजन के पहले उन्होंने कोयले की कमी के लिए कोयला सत्याग्रह किया, पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने पर महंगाई के विरोध सीएम हाउस से मंत्रालय तक साइकिल चलाई, इस दौरान हालांकि जनता को मुश्किल हुई पर दुनिया ने देखा कि एक मुख्यमंत्री ईंधन महंगा होने से साइकिल तो चला सकता है पर राय में उसी ईंधन पर लगने वाले करों का कम करने के विषय में उसके बजीर-ए-खजाना विचार तक करने को राजी नहीं होते। वैसे भी केंद्र पर असहयोग का आरोप लगाना विपक्षी दलों की सरकारों का जन्मसिध्द अधिकार है, सो अनेकों योजनाओं का करोड़ों रुपए सरकारी मशीनरी के कारण लैप्स हो जाता है और सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी रहती है। मंत्री हर मंच से घोषणा करते हैं कि प्रदेश में रोजाना 20 किलोमीटर सड़कें बन रही हैं, जहां से इन्हें खुद गुजरना है वहां की सड़क साल में दो बार बनती है, फिर भी सड़कों की बदहाली का ठीकरा केंद्र के सिर फोड़ते हैं।

अब कहा जा सकता है कि फिर शिवराज को दूसरी बार जनादेश क्यों मिला। वस्तुत: इसमें चतुर सुजान चौहान की लोकप्रियता कम विपक्ष की नाकामी अधिक है। प्रदेश में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस का ऐसा कोई नेता नहीं है जो शिवराज सिंह चौहान की धारा प्रवाह दिल को छू लेने वाली मीठी बातों के पीछे छिपे सरकार के असली कारनामों को जनता के बीच ले जा सके। गहराई से देखें तो भाजपा सरकार के पिछले सात साल में तीन साल तो आपसी खींचतान में ही चले गए। पहले उमा भारती जी ने पंज-ज की नींव डाली, जब तक जनता इन्हें समझ पाती दीदी को पार्टी ने ही दगा दे दिया। फिर बाबूलाल गौर ने प्रदेश के ग्रामों को गोकुल बनाने का बीड़ा उठाया। जब तक गांव गोकुल बनते गौर को व्याकुल मन से पदावनति स्वीकार करनी पड़ी। गौर देश के ऐसे पहले नेता होंगे जिन्होंने मुख्यमंत्री रहने के बाद अपनी ही सरकार में मंत्री का पद स्वीकार किया हो। बहरहाल बाबूलाल गौर के बाद शिवराज ने सत्ता संभाली और आते ही जनता से जुड़े ऐसे मामलों पर ध्यान केंद्रित किया जिनका त्वरित लाभ दिखता है। यह उनकी सियासी समझ का नमूना था, उन्होंने पंज-ज और गोकुल ग्राम योजनाओं को दरकिनार करते हुए गरीब बच्चियों के विवाह और लाड़ली लक्ष्मी योजनाओं जैसे कार्यक्रम शुरू किए। यह व्यक्तिगत लाभ के विषय थे जिनसे जनता प्रभावित हुई। उधर लोकसभा चुनावों में मिली करारी हार से पार्टी का शीर्ष नेतृत्व इसकदर सिर फुटब्वल में उलझा कि बड़े-बड़ों को अपनी जमीन बचाना मुश्किल लगने लगा। जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा, अरुण शौरी जैसे नेताओं ने जमकर हो हल्ला किया। इस विवाद में आडवाणी जैसे नेता को कुर्सी छोड़नी पड़ी फिर शिवराज को कौन पूछे। इधर प्रदेश में विपक्ष भी सुसुप्त अवस्था में था इसलिए चिंता की कोई बात नहीं थी। अन्यथा चौहान साहब के कार्यकाल में प्रदेश सरकार को सर्वाधिक अपराध होने, बलात्कार होने का तमगा मिल चुका है। प्रदेश के मंत्रियों और अफसरों के तो कहने ही क्या, घोटालों के सरताज बने हुए हैं। यहां के अफसर नोटों के बिस्तर पर सोते हैं, मामूली से इंजीनियर इतने काबिल हैं कि चंद बरसों में ही अरबों रुपए कमा डालते हैं, बड़े तो दूर छुटभैये नेता जिनके बाप-दार कलारी के सामने मंगोड़े का ठेला लगाते थे, किसी संस्था के अध्यक्ष बनते ही स्कार्पियो जैसी महंगी गाड़ियों में घूमते हैं। भूमाफियाओं के खिलाफ चीख-चीख कर विरोध होता है और भ्रष्ट मंडली मंजीरे बजा-बजाकर भजन गाती रहती है, शिवराज प्रवचन देते रहते हैं, पाखंड खंड-खंड होकर जनता के सामने बिखरते रहते हैं।


? विवेकानंद