संस्करण: 21 फरवरी -2011

धर्मांतरण रोकने के बहाने कुटिल राजनीति
 

? वीरेन्द्र जैन

 

सुप्रसिध्द कथाकार प्रेमचन्द ने आज से सत्तर साल पहले लिखा था कि फासिस्म धर्म और देशभक्ति के मुखौटे लगा कर ही समाज के सामने प्रकट होता है। मध्य प्रदेश के मंडला में नर्मदा किनारे नर्मदा कुम्भ के नाम से जो आयोजन किया गया उसमें एक ओर तो अपने जीवन में बदलाव की इच्छा रखने वाले आदिवासियों की यथास्तिथि बनाये रख कर उन्हें यथावत शोषण का शिकार बनाने वालों की मदद करने की योजना नजर आती है, वहीं दूसरी ओर धर्मांतरण के नाम पर ईसाइयों पर हल्ला बोल, कांग्रेस और यूपीए की अध्यक्ष सोनिया गान्धी को लपेट कर कांग्रेस पर हमला करना रहा है।

देश को आजादी दिलाने के संग्राम में नेतृत्व करने वाली कांग्रेस आज एक अव्यवस्थित पार्टी है जो विभिन्न तरह के क्षेत्रीय, जातिवादी, या सामंती नेताओं का सहयोग लेने को विवश है। ऐसे आयतित गैर राजनीतिक नेता सत्ता का महत्वपूर्ण हिस्सा पाने और उसमें अपना वर्चस्व बनाये रखने के लिए आपस में एक दूसरे से गहरी प्रतिद्वन्दिता रखते हैं और पार्टी को कमजोर करते हैं। अंत:पुर की इस लड़ाई का इकलौता हल नेहरू परिवार के वंशज का नेतृत्व स्वीकारना है, जिस पर वे सब एकमत होते हैं। यही कारण है कि कभी राजनीति से उदासीन सोनिया गान्धी को, कांग्रेस को बचाने के लिए अंतत: उसका नेतृत्व करना स्वीकारना पड़ा। इससे पहले उन्होंने श्री राजीव गांधी के दुखद निधन के दस साल तक कांग्रेस का नेतृत्व स्वीकार करने से दूरी बनाये रखी। यही कारण है कि कांग्रेस के कमजोर होने की प्रतीक्षा में आशान्वित भाजपा, कांग्रेस को एकजुट बनाये रखने वाली इकलौती नेता सोनिया गान्धी को कमजोर करना अपना मुख्य कार्यक्रम बनाये हुये है, ताकि अन्य विकल्प न होने का लाभ लेकर वे आसानी से सत्ता पा सकें। सोनिया गान्धी पर हमला करने का उनके पास सबसे बड़ा हथियार उनका इटली के ईसाई परिवार में जन्म लेना है। इसी कारण से उन्होंने धर्मपरिवर्तन को आधार बना कर ईसाई बनाम हिन्दू का मुद्दा उभारने की योजना बनायी है।

उल्लेखनीय है कि वे पहले हिन्दू बनाम मुसलमान का विभाजन बना कर कांग्रेस पर मुसलमानों के तुष्टीकरण का आरोप लगाते रहे हैं। भोले भाले धर्मभीरु लोगों को बहकाने के लिए तब श्रीमती इन्दिरा गान्धी पर तो वे यह आरोप लगाते रहे हैं कि फीरोज गांधी से शादी करके वे मुसलमान हो गयीं थीं, ख्जबकि फीरोज गान्धी पारसी थे।

ईसाई मिशनरियां सारी दुनिया में अपने धर्म प्रचार का काम दीन दुखियों निर्धनों को शिक्षा और स्वास्थ की सुविधाएं देकर करती रही हैं तथा पिछले दो सौ साल से हिन्दुस्तान में वे यही करती आ रही हैं। किसी समय जब देश में दूर दूर तक अस्पताल नहीं होते थे तथा चेचक, प्लेग, और हैजे आदि से गाँव के गाँव साफ हो जाते थे तब इन मिशनरियों ने अस्पताल खोल कर और कैम्प लगा कर लाखों जानें बचायी थीं, यह ऐसा रौशन इतिहास है जिससे इंकार नहीं किया जा सकता। इसलिए भारतीय निर्धन जन के मन में उनके लिए सदैव श्रध्दा रही है। हिदुत्व के नाम पर वोटों की राजनीति करने वाले संघ परिवार ने जिसकी स्थापना 1925 में हुयी थी, धर्म परिवर्तन के नाम इन मिशनरियों पर हमले की शुरुआत सोनिया गान्धी के राजनीति में प्रवेश के बाद ही की। इसमें कोई सन्देह नहीं है कि ईसाई मिशनरियाँ समाज सेवा के साथ साथ अपने धर्म का प्रचार भी वैसे ही करती हैं, जैसा कि कभी बौध्दों ने किया होगा जो पूरे एशिया में अपना प्रसार करने में सफल रहे थे। दूसरी ओर हिन्दुओं के सवर्ण समाज से शोषित उपेक्षित दलित और आदिवासी जब उनसे अपने लिए मानवोचित समान व्यवहार पाते हैं, तो वे उनकी सेवा से ही नहीं, उनके धर्म से भी प्रभावित होते होंगे और उसे स्वेच्छा से अपना भी लेते होंगे। यही कारण है कि ईसाई धर्म अपनाने वालों में सर्वाधिक संख्या दलितों और आदिवासियों की ही होती है न कि सवर्णों, जैनों, बौध्दों, या मुसलमानों की होती है।

हमारे संविधान ने जहाँ अपने नागरिकों को कोई भी धर्म अपनाने और उसका पालन करने का अधिकार दिया हुआ है वहीं उसने जबरदस्ती या लालच से धर्म बदलवाने को अपराध भी घोषित किया हुआ है। प्रत्येक कलैक्टर को अपने जिले में हुए धर्म परिवर्तनों के बारे में प्रतिमाह एक रिपोर्ट भेजनी होती है। देखा गया है कि संघ परिवार द्वारा धर्म परिवर्तन के बारे में किया जाने वाला दुष्प्रचार जिलाधीशों की रिपोर्टों के सर्वथा विपरीत होता है। जब पूरे देश में जबरदस्ती धर्म परिवर्तन कराये जाने की कोई रिपोर्ट नहीं होती तब भी जिलाधीशों के द्वारा भेजी गयी रिपोर्टों से कई कई गुना धर्म परिवर्तन की अफवाहें संघ परिवार फैलाने में लगा रहता है। धर्म परिवर्तन तो अम्बेडकर ने भी कराया था और अभी भी अनेक दलित नेता सामूहिक रूप से बौध्द धर्म अपनाने के आयोजन करते रहते हैं, किंतु संघ परिवार वोटों के भय में उनके धर्म परिवर्तन पर चुप्पी साधो रहते हैं।

उल्लेखनीय है कि आदिवासी समाज हिन्दुओं के देवताओं और पूजा पध्दतियों को नहीं मानता रहा है अपितु उनके देवता तो पेड़ पौधों के आसपास स्थापित अमूर्त किस्म के स्थान देवता ही होते रहे हैं। उन्हीं आदिवासियों को अब संघ परिवार के लोग हिन्दू पूजा पध्दतियों में बाँध कर उनका धर्म परिवर्तन करा रहे हैं व प्रदेश सरकार की उपस्तिथि में सरकारी मदद के लालच से करा के कानून को धता बता रहे हैं। इतना ही नहीं वे भविष्य में उनकी जीवन पध्दतियों में भी हस्तक्षेप करने से नहीं चूकेंगे। अनेक आदिवासियों द्वारा गौवंश के माँस का सेवन किया जाता है जो उनके हिन्दू जीवन पध्दति न मानने का प्रमाण है। क्या उन्हें अपनी जीवन पध्दति बदलना होगी! आदिवासी महिलाओं में वस्त्र पहिनने की जो प्रथा है वह उच्च, मध्यम वर्गीय सवर्ण हिन्दुओं के यहाँ स्वीकार्य नहीं हो सकती। क्या उन्हें अपना पहनावे का अन्दाज बदलना होगा!

संघ परिवार के कुछ अनुसांगिक संगठन वैलेन्टाइन डे के विरोध से लेकर लड़कियों के लिए ड्रैस कोड तक लादने की कोशिश करते हैं। इस तरह लगता तो ये है कि ये आदिवासियों की अपनी संस्कृति के अनुसार आयोजित होने वाले भगोरिया का भी विरोध करेंगे! इसे आदिवासी समाज कैसे स्वीकार करेगा!

भाजपा शासित मध्यप्रदेश की सरकार जनता पर टैक्स थोप कर उसकी गाढी कमाई से उगाही गयी राशियों को किसानों और दैनिक वेतन भोगी कर्मचारियों के लिए न खर्च करके अपने राजनीतिक हित साधन में फूंक रही है। नर्मदा कुम्भ के नाम पर करोड़ों रुपये बरबाद कर दिये गये जिससे न तो आदिवासियों का ही भला हुआ है और ना ही किसानों व कर्मचारियों का। जनता के पैसे से ऐसे कुटिल राजनीतिक अभियान रुकना चाहिए।


? वीरेन्द्र जैन