संस्करण: 21 फरवरी -2011

पाकिस्तान का सूरज अस्ताचल की ओर...
 

? डॉ. महेश परिमल

 

जिस दरख्त से पंछी अपना नाता तोड़ दें, जिस सागर से प्राणी अविश्वास करने लगे, जिस भूमि से लोग पलायन करने लगे, सोचो किन हालात में वे ऐसा करते होंगे? कुछ ऐसी ही स्थिति इन दिनों पाकिस्तान की हो गई है। उस देश से अब देशवासियों का मोहभंग होने लगा है। जिस देश का शासन हथियारबंद लोगों के हाथ में हो, जिस देश में एक आम आदमी ही नहीं, बल्कि सुविधा सम्पन्न वर्ग भी अपने को असुरक्षित महसूस कर रहा हो, इनकी सुरक्षा के लिए सरकार कोई कदम न उठा रही हो, ऐसे देश में भला कौन रहना चाहेगा? आज पाकिस्तान के हालात ऐसे ही हैं। अब लोगों ने अपना बोरिया-बिस्तर बाँधना शुरू कर दिया है। क्या बड़े-क्या छोटे, क्या अमीर-क्या गरीब सभी यही चाहते हैं कि किसी भी तरह से इस देश से जाकर कहीं और अपना आशियाना बना लिया जाए। अपने मादर-ए-वतन को अलविदा कहना मुश्किल अवश्य है, पर क्या करें, हालात ही ऐसे हैं कि अपनी ईमानदार और निष्ठा के साथ तो वहाँ अब रहा ही नहीं जा सकता। यही सोच अब पाकिस्तान को आंतरिक कलह की ओर ले जा रही है। लोग रोज-रोज के खून-खराबे से बचना चाहते हैं, उन्हें तलाश है सुकून की, जो अब पाकिस्तान में तो मयस्सर नहीं।

कल तक जिस करांची में शाम को जगमगाहट देखने को मिलती थी, विदेशी कार्स, विदेशी शिक्षा प्राप्त दोस्तों के साथ महफिल जमती थी, पार्टियों और विभिन्न खुशबूओं से सराबोर स्थान आज वीरान है। अधिकांश हवेलीनुमा बंगले खाली पड़े हैं। वहाँ रहने वाले बाशिंदे किसी महफूज इलाके में चले गए हैं। रोज-रोज हिंसा और रक्तपात से लोग आजिज आ चुके हैँ। अंततरू वे अपनी मातृभूमि को छोड़कर चले गए। पाकिस्तान के प्रसिध्द स्तंभकार कामरान शकी ने पिछले सप्ताह ही लिखा था कि जो धन से आबाद हैं, वे तो कनाडा, इग्लैंड, मलेशिया या दुबई चले गए हैं। इन लोगों का कहना था कि करांची का धीरे-धीरे तालिबानीकरण हो गया है। पाकिस्तान छोड़ने वालों में इस्लाम के विश्वप्रसिध्द स्कॉलर अल्लामा जावेद धामीदी ने भी पाकिस्तान को अलविदा कह दिया है। वे लोगों को इस्लाम का सच्च अर्थ समझाते थे, इसलिए उन्हें धमकी मिल रही थी।

इंसान अपने व्यापार और धंधो के लिए स्थान छोड़ता है, यह समझ में आता है, पर पाकिस्तान में तो इसका उल्टा हो रहा है। लोग अपने जानमाल की सुरक्षा के लिए यहाँ से रहे हैं। कहने को तो सरकार है, पर वह लोगों की सुरक्षा करने में पूरी तरह से नाकाबिल है। अपहरण, हत्या, बलात्कार जैसी घटनाएँ वहाँ आम हो गई हैं। यही नहीं, जिनके पास हथियार हैं, वे रगदारी दिखाकर लोगों से वसूली कर रहे हैं। कई बार धन मिल जाने के बाद भी रंगदार लोग अपनी धाक जमाने के लिए उसकी दिन-दहाड़े हत्या कर देते हैं। बाद में यह अफवाह फैलाई जाती है कि वह काफिर था। उसकी हरकतें इस्लाम विरोधी थीं। ये हथियारबंद लोग मजहब के नाम पर खून की नदियाँ बहा रहे हैं। एक तरह से देश सिविल वार की ओर बढ़ रहा है।

अब तक तो पाकिस्तान से केवल हिंदू और ईसाई समुदाय के लोग जा रहे थे, पर अब वहाँ से अल्पसंख्यक माने जाने वाले अहमदिया लोग भी रुखसत करने लगे हैं। इसी तरह से अपहरण और लूटपाट से तंग आकर व्यापारियों और उद्योगपतियों ने भी स्वेच्छा से देश छोड़ रहे हैं। जब से पंजाब के गवर्नर सलमान तासीर की हत्या उनके ही अंगरक्षकों ने की है, तब से हालात और बेकाबू होने लगे हैं। ब्रिटिश कॉमनवेल्थ ब्रोडकॉस्टिंग कापरेरेशन के मोनीसा हाशमी और पाकिस्तानी सेना में व्याप्त भ्रष्टाचार पर किताब लिखने वाली आएशा सिद्दिकी जैसी नेता कह रहीं हैं कि अब उदारवादी बने रहने में खतरा बढ़ गया है। अदनान रहमत जैसे वरिष्ठ पत्रकार तो बड़े अफसोसे के साथ कहते हैं कि 1760-1970 के दशक में तो इसी करांची शहर के कई इलाकों में साड़ी और सलवार-कुर्ते में हिंदू औरतें विभिन्न रेस्तरां में लजीज व्यंजनों का आनंद लेते हुए देखी जा सकती थीं, दाढ़ीधारी-बुर्काधारी तो दिखते ही नहीं थे, पर अब वह स्थान वीरान हो गया है। यह स्थिति देखकर लोग कहते हैं कि कहाँ गए वो दिन! कई बार ऐसा होता है कि हत्यारा अधिक चर्चित होता है। जिसकी हत्या की गई वह सहानुभूति का पात्र नहीं बन पाता। कुछ ऐसा ही हुआ, सलमान तासीर के हत्यारे के साथ। उसे काफी लोकप्रियता प्राप्त हो रही है। फेसबुक और इंटरनेट पर सबसे अधिक प्रशंसा मुमताज कादरी को मिली है। ये सच्चई पाकिस्तान के बुध्दिजीवी वर्ग के लिए चिंता का विषय है। लाहौर युनिवर्सिटी के मैनेजमेंट साइंसेज के प्रमुख डॉ. रसूल बख्श कहते हैं कि ये लोग हथियार रखकर धर्म की बातें करते हैं। इस्लाम तो शांति का मजहब है, मजहब की बात में हथियार कहाँ से घुस आए? गली-मोहल्लों में लोगों को इकट्ठा कर मजहब के नाम पर मस्तिष्क में जहर घोलने का काम हो रहा है। भीड़ की मानसिकता का गलत फायदा उठाया जा रहा है। इसे ही दूसरे शब्दों में च्द न्यूजलाइनज् के संपादक रेहाना हकीम ने लिखा है, उनके पास मशीनगन है, हमारे पास कुछ भी नहीं। वे मजहब के नाम पर कुछ भी कर सकते हैं, हम कुत्तो की मौत नहीं मरना चाहते, वे शहीद को जन्नतनसीं होना चाहते हैं। हम तो यहीं शांति से रहना चाहते हैं। पर इन्हें शांति मंजूर नहीं।

आतंकवादियों ने पाकिस्तान सरकार के सामने खुली चुनौती दी है कि जो चाहो कर लो। पर सरकार इतनी कमजोर साबित हो रही है कि कुछ न कर पाना उसकी मजबूरी बन गई है। उसे हमेशा सेना को खौफ सता रहा है। समाज शिक्षा से बदलता है। यदि सरकार पूरे देश में एक जैसी शिक्षा लागू करनी चाहिए। यहाँ तो हालात यह हैं कि जो मुल्ला-मौलवी चाहते हैं, वैसी शिक्षा दी जा रही है। ये मुल्ला-मौलवी जो अभी तक यह ठीक से समझ नहीं पाए हैं कि आखिर सच्च इस्लाम है क्या?  वे ही बच्चों को क्या पढ़ा पाएँगे। यानी जड़ों को ही कमजोर बनाया जा रहा है। उन्हें एक ऐसे हालात के लिए तैयार किया जा रहा है, जहाँ केवल मौत ही उनका इंतजार करती है। जिंदगी उनके आगे हमेशा हार जाती है। समूचे पाकिस्तान के बुध्दिजीवी यही कहते हैं कि कल क्या होगा, कोई नहीं जानता।


? डॉ. महेश परिमल