संस्करण: 21 फरवरी -2011

कृषि क्षेत्र में बेहतरी की स्थाई आस ?

? डॉ. सुनील शर्मा

 

मानसून की मेहरबानी से इस सत्र में कृषि क्षेत्र में बेहतरी की आस नजर आ रही है। पिछले सप्ताह केन्द्रीय कृषि मंत्री द्वारा जारी ऑकडों के अनुसार इस चालू सत्र में खाद्यान्न उत्पादन 23 करोड़ 20 लाख 70 हजार टन के स्तर पर पहुचने का अनुमान है तथा कृषि क्षेत्र की विकास दर 5.4 फीसदी रहने का अनुमान है जो कि पिछले सत्र मे मात्र 0.4 फीसदी रही थी। इस बर्ष गेहू और चावल का उत्पादन बढ़ा है और दालों के मामले में भी अच्छे संकेत है। लगातार मँहगाई और खेती की बर्बादी की खबरों के बीच यह अच्छी खबर है।संभव है कि इस सत्र में हम मुद्रास्फीति के मुकाबले गेहू,चावल और दालों का स्वाद की लगभग स्थिर कीमतों पर ले पाएगें।  लेकिन  खाद्यान्न उत्पादन का यह ऑकड़ा 2008-09 के सत्र से भी कम है और जनसंख्या वृध्दि की रतार वही है। अत: कृषि क्षेत्र में मात्र इस सत्र में पॉच फीसदी से अधिक की वृध्दि दर होने पर ज्यादा खुशफहमी पालने की स्थिति नहीं बन पा रही है हॉ अगर यह वृध्दि दर स्थाई बनी रहे तो देश का और किसानों का कृछ भला होगा,वास्तव में योजनाकारों को इस दिशा में विमर्श करना चाहिए।

पिछले लम्बे समय से देश में किसानी के हालात अच्छे नहीं है।खेती अब भी मानसून की मेंहरबानी पर निर्भर है,भण्डारण के अभाव में प्रतिवर्ष लाखों टन अनाज सड़कर नष्ट हो रहा है, चूहों और दीमक का निवाला बन रहा है।कृषि में सार्वजनिक निवेश भी लगातार घट रहा है जिसके चलते अस्सी के दशक से कृषि क्षेत्र की विकास दर दो फीसदी के आसपास स्थिर है। पिछले दो दशकों के दौरान देश में अनाज उत्पादन की दर में गिरावट आई है। पिछले दशक में देश में अनाजों के उत्पादन की वृध्दि दर औसतन 1.6 फीसदी रही है, जो कि देश की जनसंख्या वृध्दि दर 1.7 फीसदी से पीछे है। खेती के बुरे हालात से आज देश के 90 फीसदी किसान कर्ज में फंसे हुए हैं तथा 60 फीसदी किसान खेती तुरन्त छोड़ने इच्छुक हैं। पिछले एक दशक के दौरान कर्ज और घाटे की कृषि से त्रस्त किसान लगातार आत्महत्या की राह चुनने मजबूर हैं। अब मात्र एक सत्र की बेहतरी से खेती और किसानों की हालात में सुधार होने की संभावना मात्र मृगतृष्णा ही प्रतीत हो रही है। चुकि कृषि देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है अत: देश की बेहतरी कृषि से ही संभव है। आज जरूरत इस बात की है कि देश के कृषि जगत को सदाबहार क्रांति का वरदान मिले। इसके लिए कृषि के समक्ष उत्पन्न चुनौतियों जैसे-देश में समुचित कृषि नीति का अभाव, मानसून पर खेती की निर्भरता,जलवायु परिवर्तन और नकारात्मक अंतर्राष्ट्रीय आर्थिक माहोल पर गंभीरता से विचार की जरूरत है। क्योंकि ये मुद्दे भविष्य में देश की कृषि और कृषक को तबाह करने वाले हैं।    

जलवायु परिवर्तन देश की खेती पर एक बड़ा खतरा साबित होने वाला है, एक अनुमान के मुताबिक अगले तीन दशकों में जलवायु परिवर्तन के चलते देश की कृषि पैदावार में 4.5 से 9.0 फीसदी तक की गिरावट आ सकती है,अगर पैदावार में इतनी गिरावट आती है तो देश के सकल घरेलू उत्पाद में 1.5 फीसदी की कमी आ सकती है क्योंकि देश के सकल राष्ट्रीय उत्पाद में कृषि क्षेत्र का योगदान 15 फीसदी है। चूकि भारत दुनिया के कुल नुकसानदेह कार्बन उत्सर्जन में मात्र 4 फीसदी का भागीदार है जो यह प्रर्दशित करता है कार्बन उत्सर्जन में कमी की कोशिशें वैश्विक स्तर पर ज्यादा कारगार नहीं होने वाली है बल्कि देश की कृषि प्रणाली ऐसी हो जिससे जलवायु परिवर्तन के नुकसान कम हो सकें,इसके लिए देश में जैविक कृषि एवं सिंचाई सुविधाओं के विस्तार के साथ बीजों के मामले में शोध की जरूरत है। पिछले तीन दशकों से कृषि में सार्वजनिक निवेश लगातार घटता जा रहा है जबकि कृषि में सार्वजनिक और निजी निवेश को बढ़ाने की जरूरत है,उल्लेखनीय है कि छठवीं पंचवर्षीय योजना(1980-85) से नवीं पंचवर्षीय योजना(1997-2002) तक कृषि में सार्वजनिक निवेश घटता रहा है,जहॉ छठवीं योजना में 64,012 करोड़ रूपए का सार्वजनिक निवेश हुआ था वहीं सातवीं योजना में 52,108 करोड़ रूपए, आठवीं योजना में 45,565 करोड़ रूपये तथा नवमी योजना में घटकर मात्र 42226 करोड़ रूपये रह गया। जब कृषि क्षेत्र के लिए ऐसी उलटी गंगा बहेगी तो विकास कैसे होगा? हालॉकि दसवीं पंचवर्षीय योजना में इसमें वृद्वि कर 67,267 करोड़ रूपये का आवंटन किया गया। कृषि में सिंचाई सुविधाओं की अनदेखी अब भी जारी है। विकास से बढ़ते औद्योगीकरण और शहरीकरण की वजह से कृषि भूमि लगातार घटती जा रही है तथा सिंचाई के लिए भी पानी की उपलब्धता में कमी आई है क्योंकि खेतों में इस्तेमाल किए जा सकने वाला पानी कारखानों और शहरों में  भेजा जा रहा है अनुमान है कि वर्ष 2020 तक सिंचाई के लिए 25 फीसदी अधिक पानी की जरूरत होगी जबकि पानी उपलब्धता 12 फीसदी घट जाएगी अर्थात आज की तुलना में वर्ष 2020 तक पानी की उपलब्धता में 37 फीसदी का अंतर हो  जाएगा तब खेती कैसे होगी? इस समय देश में भूक्षरण की समस्या भी विकराल हो रही है। वर्तमान में देश की 6 करोड़ 15 लाख 80 हजार हेक्टेयर भूमि भूक्षरण से प्रभावित है। कृषि को समस्या मुक्त क्षेत्र बनाने के लिए कृषिशोध एवं अनुसंधान सुविधाओं का विकास आवश्यक है। वर्तमान में देश में कृषि विकास हेतु सकल घरेलू उत्पाद का मात्र 0.3 प्रतिशत ही शोध एवं अनुसंधान कार्यों पर खर्च किया जा रहा है, जो कि विकसित देशों के न्यूनतम 2 प्रतिशत से काफी कम है। कृषि अनुसंधान के जरिए फसल उत्पादकता में वृध्दि, लागत में कमी, भू क्षर्रि तथा जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न समस्याओं से भी छुटकारा पाया जा सकता है। कृषि की बेहतरी के लिए आज देश को भण्डारण और विपणन के क्षेत्र में बड़ी क्रांति की आवश्यकता है।

वास्तव में देश की कृषि को योजनाकारों की बेरूखी और बाजार की मनमानी ने भी बर्बाद किया है। वर्तमान परिस्थितियों में किसानों की समस्या का हल राजनीतिक नाटकों से होने वाला नहीं है जैसे कि आजकल नीति निर्धारक ही स्वयं को किसान हितेषी प्रदर्शित करने के लिए अनशन का नाटक करने लगें है जबकि वो किसानों की समस्याओं के निराकरण और कृषि के विकास के लिए स्पष्ट और प्रभावकारी नीतियों के निर्माण, निर्धारण और क्रियान्वयन के लिए सक्षम और जिम्मेदार है ।


? डॉ. सुनील शर्मा