संस्करण: 21 फरवरी -2011

 

सर्वोच्च न्यायालय का अहम फैसला :

ग्रामसभा, ग्रामपंचायत जैसी साझी जमीनों पर कब्जों को खाली करना होग
 

? सुभाष गाताड़े

 

म्पत्तिशाली लोगों, वर्चस्वशाली उद्यमियों को माटी के मोल या अवैध ढंग से आवंटन का सवाल दिल्ली से लेकर गांव की गलियों तक का जिंदा सवाल बन गया है। जनहित के नाम पर जमीन का अधिग्रहण करना और उसे निजी बिल्डरों या कार्पोरेट सम्राटों को सौंपने की नीतियां विभिन्न सत्ताधारी सियासी पार्टियों की कार्यप्रणाली का अहम हिस्सा बन गयी हैं। पंजाब हरियाणा हाईकोर्ट का हाल का फैसला इसी परिघटना पर नये सिरे से रोशनी डालता है। गुडगांव जिले के सिलोखेरा एव सुखबली में जनहित के नाम पर 215 एकड़ जमीन अधिग्रहित की गयी थी जिसे बाद में बिल्डरों को बेच दिया गया था। एक जनहितयाचिका के संदर्र्भ में पंजाब -हरियाणा हाईकोर्ट ने हरियाणा सरकार को आदेश दिया है कि छह माह के अन्दर इन जमीनों पर हुआ निर्माण गिरा दे और जमीन वापस ले ले।

इसे इत्तोफाक ही कह सकते हैं कि पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के इस विशिष्ट फैसले के वक्त सूबा हरियाणा के जीन्द जिले जुलाना के दलितों के साथ हुई ज्यादती का प्रसंग भी उभरा है। वंचितों एवं गरीबों की जमीनों के हस्तगतकरण का एक दूसरा नमूना यहां हमारे सामने नमूदार होता है। मालूम हो कि यहां का निर्माणाधीन बस अड्डा अब एक पुराने खंडहर में तब्दील हो गया है। हालांकि बहुत कम लोग इस बात को जानते हैं कि बस अड्डे के नींव का पत्थर दलितों को आवंटित जमीन पर हुआ था, जिसके बदले उन्हें न जमीन मिली और न ही आज तक उसका मुआवजा मिला है। (द ट्रिब्युन, 6 फरवरी 2011)

ऐसा नहीं कि विगत ढाई दशक में पीड़ित समुदाय के लोगों ने -धानक एवं चमार बिरादरी के छह सौ से अधिक परिवारों ने -अपने अधिकारों को हासिल करने के लिए अलग अलग नेताओं, अफसरों के दरवाजे नहीं खटखटाये। मगर हर जगह उनके हाथों में आश्वासनों का पुलिन्दा ही पकड़ाया गया। क्या कांग्रेस, क्या इने लोकदल, क्या भाजपा किसी ने भी चकबन्दी के समय इन्हें आवंटित साडे चार एकड़ जमीन के बदले में उन्हें जमीन दिलाने की या मुआवजा दिलाने की कोई पहल की। पिछले दिनों सम्पन्न राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग के अध्यक्ष के जुलाना दौरे के वक्त भुक्तभोगियों ने उनके संज्ञान में इस मामले को रखा है। अब यह देखना बाकी है कि इस मामले में कोई कार्रवाई सम्भव हो पाती है या नहीं ?

गौरतलब है कि जनान्दोलनों या मीडिया की सक्रियता के कारण या आम जनों द्वारा सूचना के अधिकार के इस्तेमाल के चलते जहां महानगरों में भूमि अधिग्रहण में बरती जानेवाली अनियमितताओं के कुछ काण्डों का खुलासा हो पाता है, मगर एक दूसरे तरीके से साझी जमीनों को हस्तगत करने का जो सिलसिला लम्बे समय से चल रहा है, उस पर बात भी नहीं हो पाती है। कोई व्यापक आन्दोलन होना तो दूर की बात है। इस पृष्ठभूमि में पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट की मार्कण्डेय काटजू एवम ज्ञानसुधा मिश्रा की द्विसदस्यीय पीठ द्वारा दिया गया फैसला, इस मसले को फिर एक बार केन्द्र में लाता दिखता है।

पंजाब के पटियाला जिले के रोहर जागीर ग्राम में तालाब के तौर पर नक्शे में दर्ज जमीन के अनधिकृत अधिग्रहण करने के खिलाफ दायर याचिका के बारे में सुप्रीम कोर्ट का प्रस्तुत फैसले का दूरगामी महत्व इस बात में भी है कि न केवल अदालत ने उपरोक्त मामले में ग्रामसभा की जमीन के कब्जे और उस पर निर्माण को गलत साबित किया है बल्कि इस बहाने अलग अलग स्तरों पर मौजूद निहित स्वार्थी तत्वों द्वारा इस कब्जे को वैध बनाने की कोशिशों को भी गैरकानूनी बताया है और साथ ही साथ सभी राज्यों एवं केन्द्रशासित प्रदेशो के मुख्य सचिवों को इस आदेश की प्रति भेज कर उनसे अपने यहां की स्थिति स्पष्ट करने को कहा है। तीन मई को इस सम्बन्ध में उपलब्ध प्रमाणों पर सुप्रीम कोर्ट फिर विचार करेगा।

मालूम हो कि ग्रामीण इलाकों में जिसे ग्रामसभा, ग्राम पंचायत भूमि, शामलात देह (पंजाब आदि क्षेत्रों में) और मण्डावेली और पोरमबोके जमीन (दक्षिण भारत में) कहा जाता है, जिसका इस्तेमाल विभिन्न सामुदायिक कामों के लिए होता है, उसे पैसा, धनबल और राजनीतिक दबदबे के आधार पर कब्जा करने का सिलसिला लम्बे समय से चल रहा है। अक्सर ऐसे कब्जे को वैध घोषित करने के लिए पिछले दरवाजे से हथकण्डे भी अपनाए जाते रहे हैं। इसका एक तरीका ग्राम समाज के जमीन पर इस अवैध कब्जे के लिए कब्जाधारी से जुर्माना वसूला जाता रहा है। उपरोक्त मामले में भी यही सिलसिला चला, यहां तक कि गांव के तालाब की जमीन पर कब्जा करनेवाली पार्टी इतनी वर्चस्वशाली थी कि उसने चुनी हुई ग्रामपंचायत के सदस्यों का भी मुंह बन्द कराने में सफलता हासिल की। इसके बाद गांव के कुछ लोगों ने उच्च अदालत में जाना तय किया। नतीजा सबके सामने है।

प्रस्तुत फैसले के बहाने कुछ अहम बातें स्पष्ट होती हैं :

एक, सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया है कि ग्राम सभा की जमीन पर गांव के निवासियों के साझे अधिकारों को राज्य में निहित सम्पत्ति के अधिकार के नाम पर खारिज नहीं किया जा सकता, जिसके लिए उसने चिगुरूपति वेंकण्टा शुभयया बनाम पालाडुगे अंजयया मामले में सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले का भी हवाला दिया है।

दूसरे, अनुसूचित जाति एवं जनजातियों को आवण्टन जैसे अपवादात्मक मसले को छोड़ दें तो किसी भी मामले में ग्रामसभा की जमीन का निजी हाथों में हस्तांतरण उचित नही माना जा सकता। कुछ जुर्माना लेकर रोहर जागीर के कब्जे को वैध कराने के लिए पंजाब के मुख्य सचिव द्वारा लिखे पत्रा को भी उसने गैरकानूनी घोषित किया है। इतनाही नहीं 'एम आई बिल्डर्स बनाम राधोशाम साहू' 1999 (6) एससीसी 464' केस का हवाला देते हुए उसने यहभी जोड़ा कि ऐसे अवैध कब्जों पर करोड़ों रूपए लगा कर किए गए निर्माण का तरीका भी इस भूखण्ड के फिर एक बार सामुदायिक हाथों में हस्तांतरण को रोक नहीं सकता। मालूम हो कि इस मामले में पार्टी ने भूखण्ड पर 100 करोड़ की लागत से शॉपिंग मॉल का भी निर्माण किया था। सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया कि मॉल को गिरा कर पहले से वहां मौजूद पार्क का निर्माण किया जाए।

तीसरे, तालाब के नाम पर दर्ज जमीन पर अवैध निर्माण के अन्य मुकदमे (हिंच लाल तिवारी बनाम कमला देवी, एआईआर 2001 एससी 3215 ) का हवाला देते हुए उसने कहा कि ऐसी सामुदायिक जमीन को किसी भी सूरत में मकान निर्माण में दिया नहीं जा सकता।

चौथे, ग्राम सभा की जमीनों को किस तरह निजी हाथों में सौंपा जाता है, इसके लिए उत्तर प्रदेश में प्रयुक्त एक 'नायाब' तरीके का भी अदालत ने विशेष उल्लेख करना जरूरी समझा। मालूम हो कि जमीन के एकत्रीकरण के लिए बने चकबन्दी कानून में चकबन्दी अधिकारियों की मिलीभगत से या नकली आदेशों के जरिए ऐसी स्थिति तैयार की जाती है कि लम्बे दौर में राजस्व के मूल रेकार्डों के साथ तुलना करना असम्भव हो जाता है।

अपने आदेश के अन्त में सर्वोच्च न्यायालय ने सभी राज्य सरकारों को आदेश दिया है कि वह ग्राम सभा/ग्राम पंचायत/शामिलात देह जैसी साझी जमीनों पर अवैध कब्जे को समाप्त करने के लिए  योजना बनाए और इस बात को सुनिश्चित करे कि ऐसी साझी जमीनें ग्राम सभा को साझे इस्तेमाल के लिए वापस मिलें।

जैसा कि हम उल्लेख कर चुके हैं कि 5 मई 2011 को इस मामले को लेकर विभिन्न राज्यों के मुख्य सचिवों को रिपोर्ट पेश करनी है। अगर जगह जगह जनता का दबाव बन सकता है तो राज्य सरकारों को भी इस के बारे में एक पारदर्शी रिपोर्ट पेश करनी होगी, वरना वह आंकड़ों का एक ऐसा पुलिन्दा अदालत के सामने पेश कर देंगे, जो वास्तविकता से मेल नहीं खाता हो। क्या देश की जनपक्षीय ताकतें ऐसा दबाव बनाने के लिए तैयार हैं।


? सुभाष गाताड़े