संस्करण: 20 सितम्बर-2010

 

शादी आजकल

? अंजलि सिन्हा

              

             दिल्ली सरकार के मंत्रिमण्डल ने हिन्दू विवाह अधिनियम 1956 के धारा 7 की उपधारा को दिल्ली राज्य के लिए बदल दिया है जिसके चलते अब दिल्ली के बाहर के युवा भी यहां आकर अपनी शादी का पंजीकरण करा सकेंगे और जरूरत पड़ने पर सुरक्षा की गुहार भी लगा सकेंगे। इसके पहले शादी का पंजीकरण कराने के पहले दम्पति को यह प्रमाणपत्र जमा करना पड़ता था कि उन दोनों में से किसी एक के माता पिता कमसे कम 30 दिन से दिल्ली के निवासी हैं। यह भी कहा गया है कि अब शादी करने के लिए कोर्ट में एक माह का नोटिस देना भी जरूरी नहीं होगा।

            'इज्जत के नाम की जा रही हत्याओं के माहौल' में जबकि माता पिता खुद अपनी सन्तानों द्वारा अपने मन से की जा रही शादी के रास्ते में बड़े बाधक दिखते हैं, उस पृष्ठभूमि में दिल्ली सरकार का यह कदम निश्चित ही स्वागतयोग्य है। लेकिन शादी को आसान, सुरक्षित और प्रगतिशील बनाने के लिए अभी और भी तरह के बदलाव की जरूरत होगी तथा केन्द्र सरकार को भी इस मामले में विशेष पहल करनी चाहिए।

            यद्यपि केन्द्र सरकार के कानून मंत्री ने कहा है कि जल्दी ही बिल पेश होगा, लेकिन अन्तरजातीय के साथ अन्तरधर्मीय शादी को भी लक्ष्य कर उसे भी आसान बनाना चाहिए। यूं तो ऐसे मामलों के लिए 'विशेष विवाह अधिनियम' बना है, किन्तु उसमें एक माह का नोटिस देना जरूरी होता है। दूसरी अहम बात यह है कि इस अधिनियम के बारे में बहुत कम लोगों को पता है कि आजाद भारत में बिना धर्म परिवर्तन किए आप विवाह कर सकते हैं। वकील भी आम तौर पर इस अधिनियम का इस्तेमाल नहीं करते हैं और विभिन्न धर्मों से आनेवाले दम्पति अक्सर धर्मपरिवर्तन करके किसी एक धर्म के बनकर ही शादी कर लेते हैं। यह लोगों के व्यक्तिगत आस्था का अधिकार छीनता भी है। हाल में विधि आयोग ने सिफारिश की थी कि हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 2 में कोई संशोधन नहीं किया जाए तथा धर्मपरिवर्तन का पंजीकरण भी अनिवार्य हो। विधि आयोग के सदस्य पी वी रेड्डी तथा सदस्य सचिव बी ए अग्रवाल ने अपने एक संक्षिप्त रिपोर्ट में कहा था कि अन्तरधर्मीय शादी के पंजीकरण  से पहले अपीलकर्ता को पर्याप्त समय दिया जाए ताकि वह समझ सके कि जिस धर्म को वह अपनाने जा रहा है उसका कानूनी प्रावधान क्या है ? दरअसल विधि आयोग ने यह सलाह केरल हाईकोर्ट के एक केस के सन्दर्भ में दी है जिसमें हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 (बी) शामिल है, जो आपसी सहमति से तलाक का कानून है। इसमें लड़की ईसाई थी जिसने हिन्दू धर्म अपना कर शादी की थी, लेकिन तलाक के लिए कारण में उसने अपने धर्म में लौटना बताया। यहीं पर यह समझने की जरूरत है कि समस्या तलाक कानून की जटिलता है। यदि दोनों सहमति से तलाक की अर्जी दे रहे हैं तो उसमें कारण गिनाने की जरूरत क्यों है ? दूसरी बात यह कि शादी के समय ही लड़की को धर्म बदलने की क्यों जरूरत पड़ी ? वह विशेष विवाह अधिनियम में शादी करती और यदि फिर भी हिन्दू धर्म अपनाना था तो अलग से अपना सकती थी। यानि शादी करने या तलाक लेने के लिए आधार धर्म क्यों बने ? आज भी वह शादी जो मन्दिरों में या सामाजिक रीतिरिवाज के माधयम से होती है उसमें विधर्मी शादी मंजूर नहीं है यानि वे कानून के निगाह में वैध नहीं होगा और उनका पंजीकरण नहीं हो सकता है।

            चण्डीगढ़ हाईकोर्ट के पास हिन्दू-मुस्लिम दम्पति का एक मसला इसी महिने आया था जिसमें कोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे इस दम्पति को परिवार द्वारा दी जा रही धमकियों के मद्देनज़र सुरक्षा की व्यवस्था दी। दरअसल वह पंजाबी लड़की और मुस्लिम लड़का अपनी खुशी से सहजीवन में नहीं थे, वे तो शादी करना चाहते थे लेकिन गुरूद्वारा और मस्जिद दोनों जगह के धर्माधिकारियों ने उनका विवाह नहीं कराया और कोर्ट में भी शादी के लिए एक महीने का समय लगता इसलिए उन्होंने कोर्ट से सुरक्षा की गुहार लगायी। चण्डीगढ़ हाईकोर्ट इस मसले में तारीफ के काबिल है कि उसने कदम आगे बढ़ा कर लिव इन रिलेशनशिप की दम्पति को सुरक्षा व्यवस्था दी। लेकिन व्यवस्था तो ऐसी रहनी चाहिए कि यदि दोनों अपनी शादी कानूनी करना चाहते थे तो वह भी तुरन्त हो जाती विशेष विवाह अधिनियम के तहत। यदि दो बालिग व्यक्ति शादी के रिश्ते में बंधाना चाहें तो एक महीने का इन्तज़ार या घरवालों को सूचना देने की व्यवस्था खतम ही होनी चाहिए। बाद में किसी एक के शादीशुदा होने का खतरा या धोखे की सम्भावना जो इस नियम का कारण बताया जाता है उससे समाधान नहीं निकलता है। एक महीने की नोटिस पर भी घरवाले कुछ नहीं करते या करना सम्भव नहीं होता है। इससे धोखाधाड़ी का बचाव पूरी तरह होता नहीं तथा उल्टे नवदम्पतियों को कानूनी सुरक्षा नहीं मिल पाती है। यह जरूर होना चाहिए कि दोनों सदस्य और हमारे जैसे समाज में विशेषत: लड़की यह जरूर जानकारी एकत्र कर ले कि उसके पार्टनर की पारिवारिक पृष्ठभूमि क्या है ? यदि दोनों जागरूक हैं तो यह जानकारी एकत्र करना असम्भव नहीं है।

 

? अंजलि सिन्हा