संस्करण: 06 सितम्बर-2010  

 यात्रियों की जलसमाधि चरमराती व्यवस्था का प्रतीक

? एल.एस.हरदेनिया

     

            प्रदेश में पिछले कुछ दिनों में हुईं त्रासदीपूर्ण घटनाओं ने प्रशासन में व्याप्त कमियों और भ्रष्ट आचरण को उजागर किया है।

            पहली घटना है देवास जिले में खातेगाँव के पास बागदी नदी में यात्रियों से खचाखच भरी बस का डूब जाना और दूसरी, रतलाम सहित कुछ अन्य स्थानों में हुई साम्प्रदायिक हिंसा। बागदी नदी में जो बस डूबी, उसमें लगभग सौ यात्री सवार थे। बस में इतनी भीड़ थी कि कुछ यात्री छत पर सवार थे। जब बस नदी पर बने रपटे के पास पहुंची उस समय रपटे पर पानी बह रहा था।  ड्राइवर ने बस रोकी परंतु यकायक उसने बस को बाढ़ग्रस्त नदी को पार करने के इरादे से आगे बढ़ा दिया। जब बस आगे बढ़ी तब अनेक यात्रियों ने ड्राईवर को टोका परंतु उसने यात्रियों की नहीं सुनी। नदी पर छोटा रपटा था जिसके ऊपर से पानी बह रहा था। रपटे पर प्रवेश करते ही बस बह गयी। थोड़े आगे बढ़ने के बाद पलट गई और उसके दोनों दरवाजे नीचे की तरफ हो गये जिससे बस में फंसे यात्री बाहर नहीं निकल सके। वैसे यह पहिली बार नहीं था जब कोई बस नदी में डूबी हो परंतु इस घटना के बाद जो तथ्य उभरकर आये हैं वे अत्यधिक चौंकाने वाले हैं। उनमें सबसे ज्यादा चौंकाने वाला तथ्य यह है कि बस बिना परमिट के चल रही थी। इसके साथ ही, बस का बीमा नहीं था। इन कमियों के बावजूद बस सड़क पर दौड़ रही थी। क्या यह तथ्य शासकीय अधिकारियों से छिपा था कि बस बस बिना परमिट व बीमे के चल रही है। मैं नहीं समझता कि ऐसा होगा।

            वास्तविकता तो यह रही होगी कि अधिकारियों को, विशेषकर परिवहन विभाग के अधिकारियों को, पूरी तरह से मालूम होगा कि बस बिना परमिट के चल रही है। यह जानते हुए भी बस मालिक के विरूध्द कोई कार्यवाही नहीं हुई। कारण स्पष्ट है कि अधिकारियों को ऑंखे बंद करने का पारिश्रमिक दिया जा रहा होगा। यह एक कडुवा यथार्थ है कि परिवहन विभाग में व्याप्त भ्रष्टाचार की ओर कोई नहीं देखता है। यह इसलिए कि परिवहन विभाग को प्रसन्न रखने के लिए एक होड़ सी मची रहती है।

            इस समय मध्यप्रदेश में सार्वजनिक परिवहन प्रायवेट आपरेटरों के हाथों में है। मध्यप्रदेश एक मात्र ऐसा प्रदेश है जहां शासकीय सड़क परिवहन निगम बंद कर दिया गया है। चूंकि यात्रियों की परिवहन व्यवस्था पूरी तरह से प्रायवेट आपरेटरों के हाथों में है इसलिए यात्री बसों का संचालन, नफा कमाने का बड़ा स्त्रोत बन गया है। चूंकि यह धंधा सोने की खान है इसलिए हर प्रभावशाली व्यक्ति अपनी बसें चलाना चाहता है। इस समय बसों के संचालकों में मंत्रियों के रिश्तेदार, सांसद, विधायक, प्रतिपक्ष के प्रभावशाली नेता, अधिकारी और स्वयं पुलिस वाले शामिल हैं। चूंकि सभी बस मालिक प्रभावशाली हैं इसलिए गैर-कानूनी रूप से चलने वाली बसों की जांच करने की हिम्मत किसी की नहीं होती।

            वैसे भी, परिवहन विभाग पहिले से ही एक बदनाम विभाग है। परिवहन विभाग के नियंत्रण में राज्यों की सीमा पर स्थित बैरियर हैं। इन बैरियरों पर पदस्थापना के लिए होड़ सी लगी रहती है। वहां  पदस्थापना के लिए मोटी रकम देनी होती है। यह मोटी रकम प्राय: सत्ताधारी पार्टी के खजाने में जाती है।

            इसके एवज में बैरियरों पर पदस्थ अधिकारियों, कर्मचारियों को लूट-खसोट की खुली छूट दी जाती है। ट्रक में क्या रखा है, उसका वजन कितना है, क्या वह नियमों के अनुसार लादा गया है? इन सबसे अधिकारियों को कोई मतलब नहीं होता। इसकी कीमत अधिकारियों और कर्मचारियों को समय-समय पर दी जाती है। यह रकम चुकाई जा चुकी है इसका सुबूत भी ट्रक ड्राईवरों के पास रहता है।

            यह व्यवस्था भले ही सत्ताधारी दल के लिए लाभप्रद हो, वह राष्ट्र व समाज के हित में नहीं है। चूंकि ट्रकों में लदे सामान की जांच-पड़ताल ठीक से नहीं होती है इसलिए कभी यह भी हो सकता है कि किसी ट्रक में आरडीएक्स या अन्य खतरनाक विस्फोटक रखा हो जिसे किसी आतंकवादी वारदात के लिए इस्तेमाल किया जाना हो। व्यक्तिगत या राजनैतिक पार्टी के क्षुद्र लाभ के लिए देश और समाज की सुरक्षा को खतरे में डाला जाता है।

           चूंकि यह काम विभाग के अधिकारियों से कराया जाता है, इसलिए वे अपने किसी भी कर्तव्य का पालन ठीक से नहीं करते। यही कारण है कि चाहे राज्यमार्ग हो या राष्ट्रीय राजमार्ग या शहरों-कस्बों की आंतरिक सड़कें-सभी पर अराजकता का माहौल रहता है। ट्रक ही नहीं बसें भी ठूंस-ठूंस कर भरी जाती हैं। कुछ ग्रामीण एवं कस्बाई मार्गों पर जीपें चलती हैं जिनकी स्वीकृत यात्री संख्या 8 या 10 होती है परंतु इनमें 35-40 लोग सवार रहते हैं। 8-10 लोग तो पायदान पर ही लटके रहते हैं और ड्राईवर स्टीयरिंग व्हील पकड़कर लटका रहता है। उसका लगभग पूरा शरीर वाहन के बाहर रहता है।

           इसी तरह अन्य नियम-कानूनों का भी खुलेआम उल्लंघन होता है परंतु संबंधित अधिकारी इस ओर कोई ध्यान नहीं देते।

          जहां हाल में हुई इस बस दुर्घटना ने यातायात संबंधी कमियों को उजागर किया है वहीं रतलाम और अन्य स्थानों पर हुई घटनाओं ने कानून-व्यवस्था की कमजोरियों को उजागर किया है। ज्ञातव्य है कि राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले में इलाहबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ बैंच का निर्णय आगामी 24 सितम्बर को आने वाला है। सभी लोग कलेजा थामकर उस दिन का इंतजार कर रहे हैं। इस दौरान साम्प्रदायिक तत्व लोगों की भावनायें भड़काने का प्रयास करेंगे। कुछ संगठनों ने घोषणा कर दी है कि यदि निर्णय उनकी इच्छा के विपरीत हुआ तो वे आंदोलन करेंगे और भारत बंद का आव्हान करेंगे। ऐसे में प्रशासन की भूमिका अहम हो जाती है। प्रशासन को पूरी तरह सतर्क रहना चाहिए और शरारती तत्वों की हर हरकत को पूरी सख्ती से दबा देना चाहिए। यदि अदालतों के निर्णय को लेकर आंदोलन होने लगे तो देश में कानून का राज कैसे कायम रहेगा? अभी यह प्रकरण हाईकोर्ट में है। हाईकोर्ट के निर्णय के बाद अंसतुष्ट पक्ष के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खुला है। सभी संबंधित पक्षों को यह बुनियादी बात समझकर शांति-व्यवस्था बनाए रखने में सहयोग करना चाहिए।


? एल.एस.हरदेनिया