संस्करण: 20 सितम्बर-2010  

 कुर्सी शरणम् गच्छामि उजागर हुआ

झारखंड में राजनैतिक दलों का असली चेहरा

 ? राजेंद्र जोशी

           

        संसार में सबका अपना-अपना सच होता है। एक के सच के मायने किसी दूसरे के सच से मेल नहीं खाते। राजनीति भी एक ऐसा क्षेत्र है जहां प्रत्येक दलों के अपने-अपने सच होते हैं। विभिन्न राजनैतिक दलों के लिए अब अपनी अपनी राजनीति का मतलब दलों की नीतियों और उनके सिध्दांतों की मर्यादाओं के भीतर सीमित नहीं रह गया है, बल्कि राजनीति का मुख्य एजेंडा सत्ता हासिल करने तक सीमित रह गया है। राजनैतिक दलों का अब बस एक ही उसूल रह गया है कि ऐन केन प्रकरेण वे कैसा भी करके सत्ता की कुर्सी हथिया लें। चाहे, ऐसा करने के लिए उन्हें अपने सच को अवसर के मुताबिक रातों-रात बदलना ही क्यों न पड़े।

            राजनैतिक दल सत्ता प्राप्ति के लिए तरह-तरह के धत्करम में व्यस्त देखे जा सकते हैं। तांत्रिक अनुष्ठानों के साथ ही वे कुर्सी की इबादत कर रहे हैं और 'कुर्सी शरणम गच्छामि' के मंत्रों का पाठ करते हुए सत्य और असत्य के बीच की खाई को पाटते जा रहे है। जिस पार्टी के आचरण का सत्य आज की तारीख में कुछ है तो कल की तारीख में वह सत्य सत्ता-पिपासा के लिए भी जाता है। राजनैतिक दलों के सत्यों के बदलते स्वरूप का ताजा उदाहरण झारखंड है जहां दो राजनैतिक दलों के सत्यों ने उजागर कर दिया है कि यदि कोई चीज़ सच है तो वह है सत्ता। संसद के सत्र के दौरान जब यू.पी.ए. सरकार को अपने एक महत्वपूर्ण मुद्दे पर बहुमत की जरूरत थी तब झारखंड मुक्ति मोर्चा ने राज्य की सत्ता में अपने सहयोगी दल भारतीय जनता पार्टी की सहमति के बगैर केन्द्रीय सत्ता को समर्थन दे दिया था। उस वक्त इतना अधिक बवाल मचा था कि भाजपा और झारखंड मुक्ति मोर्चा में भारी मतभेद बढ़ गया और भाजपा के वरिष्ठ केन्द्रीय नेताओं ने क्रुद्ध होकर राज्य की सत्ता से अपना समर्थन वापिस ले लिया था। परिणाम स्वरूप झारखंड को राष्ट्रपति शासन के दिन देखना पड़े थे। वह उस समय का सत्य था भाजपा ने मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व वाली सरकार से अपना समर्थन वापिस लेकर अपना राजनैतिक शुचिता और अपनी नीतियों और सिध्दांतों की रक्षा करने की दुहाई दी थी। राज्य की सरकार को बचाये रखने के लिए गठबंधन के नेतृत्व उस समय भाजपा का गुस्सा शांत करने के प्रयासों में मुंह की खाली पड़ी थी।  उस वक्त ऐसा लग रहा था मानों भाजपा अपने आंतरिक मैलेपन को छुपाकर उस पर टिनोपाल से घुली अपने चरित्र की सफेद झक चादर का कव्हर चढ़ा रही हो। भाजपा के उस चरित्र की बुलंदी की सर्वत्र सराहना भी हुई थी। सत्तारूढ़ गठबंधन को मिले धोखे के प्रति सत्ता गिराना ही भाजपा ने अपना सच माना।

            ''मछली जल की रानी है/जीवन उसका पानी है/ हाथ लगाओ डर जायेगी/ बाहर निकालो मर जायेगी''। अब जब झारखंड में सत्ता हासिल करने का जब नज़ारा देखने को मिला, तो मछली के जीवन पर आधारित ये पंक्तियां ही राजनीति का सच हो गई है। राष्ट्रपति शासन के दौरान जब गठबंधन के थे दल कुर्सी विहीन हो गये तो इनकी स्थिति भी जल की मछली की तरह हो गई। यह भी एक हकीकत है कि राजनैतिक दल भी बिना सत्ता के तड़प उठते हैं। सत्ता प्राप्ति के खातिर भाजपा ने अपनी उस दिखावटी सफेद चादर को एक दिन उठाकर फेंक दिया जिसकी खोल के भीतर मैलापन छुपा हुआ था। अब भाजपा को झारखंड मुक्ति मोर्चा के संग एक ही दरी पर बैठना पड़ा।

            अपनी पार्टी की छवि लोगों को उजली दिखाने के चक्कर में झारखंड में जिस तरह से भाजपा ने राज्य की गठबंधन वाली सरकार से रिश्ता तोड़ लिया था, उस नाटक की हकीकत अब सामने आ गई जब एक बार फिर अपने निहित राजनैतिक स्वार्थ की पूर्ति के लिए भाजपा ने सत्ता के लिए फिर से झारखंड में अपने द्वारा तिरस्कृत पार्टी से फिर हाथ मिला लिया। दोनों दलों ने आपस में किसी करार के अधीन हाथ तो मिला लिए हैं किंतु अब समय बतायेगा कि उनके दिल आपस में मिल भी पायेंगे या नहीं। राजनीति की कहानी ही ऐसी है जिसके दो पात्र आपस में लड़ झगड़कर दूर हो जाते हैं किंतु चॉकलेट प्राप्त करने के लिए एक दूसरों को बाहों में भरकर एक दूसरे के गालों पर चुम्बन पर चुम्बन देने लगते हैं। इस तरह के चुम्बनों का दृश्य आम निर्वाचन के बाद दोनों पार्टियों के बीच दिखे थे, किंतु चुम्बन की प्रक्रिया के दौरान दोनों ने एक दूसरे के गाल काट खाये थे। अब फिर उसी तरह की प्रेमलीला के दृश्य दिखाई दे रहे हैं। यही राजनीति की माया हैं सच ही कहा गया है कि 'माया महाठगनी हम जानी'। ऐसे माहौल में जनता तो ठगी ही जा रही है, साथ ही गठबंधन के दल भी परस्पर एक दूसरे को ठगने के जाल फेंकते रहते हैं।

            गठबंधन की सरकारों की अलग अलग पार्टियों के बीच का राजनैतिक स्वार्थ तब खुलकर मैदान में दिखाई देने लगता है जब आम निर्वाचन का समय नजदीक आने लगता है। क्योंकि गठबंधन करते समय सत्ता में भागीदार होने का सच कुछ और होता है और आम निर्वाचनों में अपनी-अपनी पार्टी के लिए अलग जनादेश हासिल करने के स्वार्थ का एक अलग सच होता है। राजनैतिक दलों का लक्ष्य सिर्फ कुर्सी होता है न कि सत्ता पर काबिज होकर विकास और जनकल्याण के अपने दायित्वों के प्रति प्रतिबध्दता दिखाने का। अब तो राजनीति का सच यही रह गया है कि उसका कोई सच नहीं बचा। दलों का जो कुछ भी छुपा हुआ सच होता है, उस पर से तब पर्दा उठ जाता है जब कुर्सियों के लिए छीना-झपटी होने लगती है।


? राजेंद्र जोशी