संस्करण: 20 मई -2013

CLICK HERE TO DOWNLOAD HINDI FONT


दिग्विजय सिंह

के नाम से कुछ लोगों को गुस्सा क्यों आता है

       र्नाटक में बीजेपी की हार के बाद उस हार के कारणों का विश्लेषण अब एक कुटीर उद्योग का रूप ले चुका है। एक नए विश्लेषक भी मैदान में हैं ।

               शिवसेना के सांसद संजय राउत ने हार के कारणों में हिंदुत्व से दूरी को बताया है। अपनी पार्टी के अखबार सामना के सम्पादकीय में उन्होंने लिखा है कि अगर बीजेपी ने हिंदुत्व को फोकस में रखा होता तो कर्नाटक में इतनी बड़ी हार न होती। 

? शेष नारायण सिंह


नमो : असली फेकू

कर्नाटक चुनाव के नतीजों पर एक नज़र

मोदी का काफूर होता जादू

       च्चाई जरूर कड़वी होती है, मगर आज नहीं तो कल लोगों को उसे स्वीकारना ही पड़ता है। अब कर्नाटक के चुनावों में अपनी उपस्थिति से किसी करिश्मे की आंस लगाए सूबा गुजरात के मुख्यमंत्री को भी सच्चाई स्वीकारनी ही पड़ी है। आखिर कितने दिन तक अपने दांत के दर्द का बहाना बना कर पत्रकारों से आंख चुराते रहते। (जी, कर्नाटक में मिली शिकस्त के बारे में ओढ़े हुए मौन को लेकर उनके दफ्तर की तरफ से यही सफाई दी गयी थी।) और उन्होंने जुबां खोल दी है।

? सुभाष गाताड़े


अपनों की नसीहत पर

ध्यान दे भाजपा

      ह संयोग है या कलह, जिस वक्त भारतीय जनता पार्टी की युवा इकाई भारतीय जनता युवा मोर्चा के लोग प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के आवास पर प्रदर्शन कर रहे थे और राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली एक टेलिवीजन चैनल पर प्रधानमंत्री का इस्तीफा मांगते रहने की बात दोहरा रहे थे,उसी वक्त पार्टी के सबसे बड़े नेता लालकृष्ण आडवाणी,पार्टी पर भ्रष्टाचार को लेकर दोहरा रवैया रखने की तोहमत जड़ रहे थे। दूसरी ओर भाजपा की समान विचारधारा वाली पार्टी तथा एनडीए की अहम शिवसेना प्रधानमंत्री बनने के लिए लालायित गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को नसीहत दे रही थी कि वे ....

? विवेकानंद


पटना की परिवर्तन रैली

क्या खोई सत्ता पा सकेंगे लालू?

      टना में आयोजित विशाल परिवर्तन रैली का आयोजन करके लालू यादव ने साबित कर दिया है कि वे सत्ता से बाहर रहकर भी गांधी मैदान में लोगों की भारी भीड़ जुटा सकते हैं। जुटी हुई भीड़ के आकार को देखते हुए लालू की यह रैली सफल कही जाएगी। यह रैली निश्चय ही नीती कुमार द्वारा आयोजित रैली से बहुत बड़ी थी। सच कहा जाय,तो लालू का जनाधार अभी भी नीती के जनाधार से बहुत बड़ा है। यदि नीती अकेले लालू के खिलाफ मैदान में उतर गए,तो वे बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री के आगे कहीं भी टिक नहीं पाएंगे।

? उपेन्द्र प्रसाद


गाँधी के देश में

विशिष्ट होने का रोग

         जाति, धर्म, लिंग, वर्ण, भाषा, रंग, आदि का कोई भेद किये बिना सभी को समान नागरिकता देने वाली हमारी आदर्श संवैधानिक व्यवस्था में व्यक्तिवादी राजनीति के उभार ने देश के लोकतंत्र को बहुत नुकसान पहुँचाया है। दुखद है कि देश के बहुत सारे क्षेत्रीय और कुछ राष्ट्रीय राजनीतिक दल व्यक्ति आधारित हैं व उन्होंने बहुत सारे छुटभैए राजनीतिक कार्यकर्ताओं में जल्दी विशिष्ट होने की बीमारी बो दी है। सिध्दांतविहीन राजनीतिक दलों के सदस्यों में ऐसे लोगों की संख्या समुचित है जो स्वयं को समाज में विशिष्ट बनाने के लिए ही दल की खास वर्दी में दल के नेताओं के इर्दगिर्द मंडराते रहते हैं। 

 ?   वीरेन्द्र जैन


दलित-आदिवासी और स्त्रियों का

धर्म आधारित उत्पीड़न हमारी चिन्ता क्यों नहीं?

                  पिछले कुछ समय से मीडिया की मेहरबानी से कुछ चतुर, चालाक, भ्रष्ट और कट्टरपंथी ताकतों ने देश की राजधानी नयी दिल्ली को अपनी प्रायोजित ताकत दिखाने और संवैधानिक सरकारों को बदनाम करने का नया तरीका ईजाद कर लिया है। जिसकी बड़ी और सार्वजनिक शुरुआत अन्ना हजारे आन्दोलन के समय हुई। इस आन्दोलन को कथित रूप से विदेशी ताकतों और देशी-विदेशी कॉर्पोरेट घरानों का खुला समर्थन था। कुछ ही समय में इस कथित जन आन्दोलन की और इसके कर्ताधार्ताओं की चारित्रिक सच्चाई देश के सामने आ गयी।  

? डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश'


मप्र में राजनीति-नौकरशाही का नापाक गठजोड़

      हते हैं कि नौकरशाही राजनीति को भ्रष्ट करती है। बदले में राजनेता भ्रष्ट नौकरशाहों का बचाव करते हैं। मध्यप्रदेश के राजनीतिक पटल पर यह तथ्य साफ रेखांकित होता दिखाई देता है। ऐसे एक नहीं,सैकड़ों मामले प्रकाश में आ चुके हैं,जब सरकार ने खुल कर भ्रष्ट नौकरशाहों का न सिर्फ बचाव किया,बल्कि उन्हे मलाईदार पदों से नवाज़ा भी गया। उधर कर्नाटक के चुनाव परिणामों ने मुख्यमंत्री सहित मंत्रियों और लगभग सौ विधायकों की नींद उड़ा दी है।

? महेश बाग़ी


कर्नाटक-कांग्रेस का

खुल गया फाटक

      राजनीति के रणक्षेत्र में कांग्रेस पार्टी की चारों तरफ से, विपक्षी पार्टियों ने, विशेषकर भारतीय जनता पार्टी ने जिस तरह से घेराबंदी की थी उसपर तमाम विपक्षी पार्र्टियां मुगालते में आकर अपना स्वमूल्यांकन नहीं कर पाई। कर्नाटक विधानसभा के निर्वाचन के नतीजों के पहले जिस मुद्रा में भारतीय जनता पार्टी के तेवर थे उनकी हवा निकल गई। भारतीय जनता पार्टी का कर्नाटक के निर्वाचन के पहले मूंछ पर ताव दिखाना उसे ही महंगा पड़ गया।

? राजेन्द्र जोशी


डा ॅ. असगर अली इंजीनियर का देहावसान

एक मूर्धन्य विद्वान, निर्भीक मैदानी कार्यकर्ता और संवेदनशील चिंतक का चला जाना

        भी कुछ दिन पहले डॉ. असगर अली इंजीनियर की आत्मकथा प्रकाशित हुई थी। आत्मकथा का शीर्षक है ''आस्था और विश्वास से भरपूर जीवन, शांति, समरसता और सामाजिक परिवर्तन की तलाश'।

               आत्मकथा का यह शीर्षक असगर अली इंजीनियर की जिंदगी का निचोड़ हमारे सामने प्रस्तुत करता है। मैं असगर अली को कम से कम पिछले 40 वर्षों से जानता हूं। मैंने उनके साथ कई गतिविधियों में भाग लिया है और अनेक यात्राएं की हैं। देश के दर्जनों शहरों में मैंने उनके साथ सेमीनारों, कार्यशालाओं, सभाओं और पत्रकार वार्ताओं में भाग लिया है।

? एल.एस.हरदेनिया


देशी गायों की लुप्त होती नस्लों का संरक्षण जरूरी

       मारे किसानों और पशुपालकों का हमेशा से यही बताया गया है कि देशी नस्ल की गाय अनुत्पादक है,वह कम दूध देती है और किसानों को महॅगी पड़ती है। इसलिए श्वेत क्रांति के शुरूआत से  यही बात कही जाती रही है कि अगर देश में दूध घी की नदिया बहाना है तो हमे ज्यादा दूध देने वालीं संकर नस्ल की गायों को बढ़ावा देना होगा और इसी सीख के चलते संकर नस्ल की गायें तेजी से देशी नस्ल की गायों की जगह लेती जा रही हैं।संकर नस्ल की गायों को कृत्रिम तरीके से विदेशी नस्ल से पैदा किया जाता है। जिससे नस्लों की शुद्वता तेजी से समाप्त होती जा रही है जिसकी वजह से कई नस्लों के प्राकृतिक और विशेष गुण भी तेजी से विलुप्त हो रहें है। 

 

? डॉ. गीता गुप्त


विनाश के रास्ते से आता विकास

        हा जाता है कि विकास विनाश से ही संभव है। पर ऐसा भी विकास किस काम का, जो लाखों मौतों की बुनियाद पर खड़ा हो। ऐसा विकास किसी को भी स्वीकार्य नहीं होगा। आज हमारा देश हर क्षेत्र में तेजी से प्रगति कर रहा है। इस विकास की चर्चा भी विश्व परिदश्य में है। विकास की इस दौड़ में हम यह भूल गए हैं कि हमने क्या-क्या खोया? हम इतना अधिक विकास कर चुके हैं कि अब हमारे पास खोने के लिए कुछ भी नहीं बचा। बहुत कुछ खोया है हमने। रासायनिक खाद का अधिक इस्तेमाल करने से हमारे गिध्द अब लुपतप्राय हैं। चिडियों ने अब सुबह चहचहाना कम कर दिया है।

? डॉ. महेश परिमल


पुलिस व्यवस्था में

सुधार की दरकार

       न दिनों दिल्ली समेत समूचे देश की पुलिस आलोचनाओं से घिरी है। महिला-हिंसा में वृध्दि ने पुलिस के विरुध्द जनाक्रोश को और भी बढ़ा दिया है। वैसे भी पुलिस का चरित्र जनता में विश्वास जगाने में कभी सफल नहीं रहा। उसके आचरण से ही उसकी संवेदनहीनता उजागर हो जाती है। जब दिल्ली में दुष्कर्म पीड़िता पांच वर्षीया गुड़िया के पिता को दो हज़ार रुपये थमाकर पुलिस टाल देना चाहती है या दुष्कर्म के विरुध्द प्रदर्शन करती युवती को पुलिस उपायुक्त चांटे जड़ देते हैं या अलीगढ़ में पीड़िता के माता-पिता को पुलिसकर्मी पीटते हैं

 

? डॉ. गीता गुप्त


  20 मई -2013

Designed by-PS Associates
Copyright 2007 PS Associates All Rights Reserved