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जैसे को तैसा की राजनीति में भाजपा और लालू
    लालू प्रसाद यादव ने वरूणगाँधी के कारनामों के बारे में जो प्रतिक्रिया दी है वह प्राथमिक दृष्टि से बहुत बुरी और लालू प्रसाद जैसे कद के नेता के अनुकूल नहीं थी जो केन्द्र की सरकार में न केवल केबिनेट मंत्री पद को ही सुशोभित  >वीरेंद्र जैन
 


समाजवादियों का असली चेहरा
       कठोपनिषद् में कहा गया है कि सच पर सौ पर्दे भी लगा दो तब भी वह किसी न किसी रूप में सामने आ ही जाता है। देश के तथाकथित नेताओं का सच भी इस चुनावी समर में सामने आ गया है, जो लबादा तो समाजवाद का ओढ़े हैं, लेकिन वास्तव में वे विशुध्द पूंजीवादी हैं। >महेश बागी


मध्यप्रदेश में भी दस्तक दी बुलेट ने

        मध्यप्रदेश में अब तक चुनाव बैलेट से लड़े जाते थे लेकिन अब लगता है कि बैलेट के बजाय बुलेट से ही फैसला होगा। 1952 से लेकर अब तक हुए राज्य विधानसभा और लोकसभा चुनाव में अपवादस्वरूप बुलेट का इस्तेमाल किया गया हो। अब मध्यप्रदेश में चुनाव रोंगटे खड़े कर दे रहा है।>राजेंद्र कुमार


भाजपा के घोषणा पत्र में पिटे-पिटाए नारों की भरमार

  क्या आप जानते हैं कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद सबसे बड़ा जनांदोलन कौनसा है ? इस प्रश्न के बाद सबसे बड़ा जनांदोलन अयोधया आंदोलन था। घोषणा पत्र में यह बात लालकृष्ण आडवाणी का परिचय देते हुए कहीं गई है। आडवाणी के संबंधा में कहा गया है >एल.एस.हरदेनिया


चुनाव प्रचार में अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल चिंतनीय आयोग ने दी राजनैतिक दलों को सख्त हिदायत
   प्रजातंत्रीय व्यवस्था में सत्ता संचालन का अधिकार जनता में से ही निर्वाचित प्रतिनिधियों को मिलता है। जन के लिए, जन के द्वारा, जन की सरकार के गठन के लिए हमारे देश में प्रत्येक पांच वर्ष के अंतराल में राजनैतिक दलों को जनादेश    >राजेंद्र जोशी


भाजपा : उग्र हिंदुत्व शरणम गच्छाम

    सत्ता का महासमर 2009 इस समय पूरे उफान पर है। शायद यह देश का पहला लोकसभा चुनाव है जिसमें न तो किसी के पक्ष में या विपक्ष में कोई लहर चल रही है और न ही कोई इतना बड़ा घोटाला प्रकाश में आया है जिसे उछाल कर सत्ता के शीर्ष तक पहुंचा जा सके >मोकर्रम खान


क्या स्त्रियां सिर्फ़ वोट बैंक हैं ?
     चाहे नगर-पालिका के चुनाव हों या विधान-सभा लोकसभा के, महिलाओं में मतदान के प्रति विशेष उत्साह नहीं देखा जाता। यह भी कटु सत्य है कि बहुत कम महिला मतदाताओं को चुनावी घोषणापत्र के बारे में जानकारी है  >डॉ.गीता गुप्त
 


जोखिम में मानवाधिकारों की हिमायत !मानवाधिकार कार्यकर्ता एडवोकेट नौशाद कासमजी के कातिलों की शिनाख्त कौन करेगा ?
      क्या एक पुराने वकील का न्यायाधीश के सामने बहस करने के लिए खड़ा होना राष्ट्र की सूर्खियों का सबब बन सकता है ? हिन्दोस्तां की हजारों अदालतों में कार्यरत लाखों वकीलों की तादाद  >सुभाष गाताड़े


ईमानदार प्रत्याशी यानी नक्कारखाने की तूती

        भारत में चुनाव आते ही विदेशी बैंकों से काफी धान निकाला जाता है। देश में विदेश से धान की आपूर्ति शुरू हो जाती है। भारत के नेता जो लगातार 5 वर्ष तक भ्रष्टाचार के रूप में जो कुछ कमाते हैं, उसका कुछ हिस्सा ही एक बार फिर चुनाव में प्रत्याशी बनकर इनवेस्ट >डॉ. महेश परिमल


वैश्विक अर्थव्यवस्था पूरब की ओर
        वैश्विक अर्थव्यवस्था सही मायनों में अब बहुधारुवीय होने जा रही है। अब तक दुनिया की आर्थिक दिशा और दशा तय करने का दारोमदार जी-सात देशों का था। इनका भी सिरमौर अमेरिका बना बैठा था। लेकिन अब जी-बीस देश इसका नेतृत्व करेंगे। मसलन विकसित  >प्रमोद भार्गव


क्रेडिट कार्ड से ऋण जाल में फंसते किसान

       बैंको के क्रेडिट कार्ड से फिजूलखर्ची कर आम उपभोक्ता कर्ज के जाल में फॅंस रहें है यह साधारण सी बात है,लेकिन किसानों की सुविधा के लिए उपलब्धा कराए जाने वाले क्रेडिट कार्ड भी किसान को कर्जग्रस्त बना रहें है। म.प्र. के होशंगाबाद जिले का एक छोटा सा गाँव >डॉ. सुनील शर्मा




 20अप्रेल 2009

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