संस्करण: 01 सितम्बर- 2014

'......गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं ! '

? सुनील अमर

          विता-कहानियों में प्राय: यह बताया जाता है कि सपनों के टूट जाने पर कैसे लोग चिल्ला उठते हैं लेकिन जागी ऑंख के सपने टूटने पर जो हताशा और ठगे जाने का भाव पैदा होता है उसे इन दिनों देश में देखा जा सकता है। दुष्यन्त कुमार का एक मशहूर शेर है - 'कैसे मंजर सामने आने लगे हैं, गाते-गाते लोग चिल्लाने लगे हैं।' अच्छे दिन लाने के घनघोर वादे के साथ जो सरकार सत्ता में आई है वह अब इसकी चर्चा करना भी पसंद नहीं करती। इस सरकार के जो नायक पहले समाचार माध्यमों में ही सोना-जागना पसंद करते थे, उन्हें अब इससे भय लगता है। प्रबन्धकीय कौशल के साथ जिन अखबारों-चैनलों को 'मैनेज' किया गया है, उन्हें भी तो आखिर अपना अखबार-चैनल चलाना ही है। चरणगान की तमाम खबरों-विज्ञापनों के बीच अगर कुछ सही और सामयिक खबरें नहीं होगीं तो क्यों कोई उन्हें पढ़ना-देखना चाहेगा? प्रधानमन्त्री मोदी अब पत्रकारों से यूँ दूर रह रहे हैं मानों वे छूत के विषाणु हों! एक अलिखित रवायत अब तक चली आ रही थी कि अपनी विदेश यात्राओं में प्रधानमंत्री के विशेष विमान में भरकर तमाम पत्रकार उनके साथ जाते थे लेकिन प्रधानमन्त्री मोदी ने फिलहाल इस रवायत को बन्द कर दिया है। अब उनके साथ सिर्फ सरकारी पत्रकार ही जाते हैं।

                   यह सच है कि देश की जनता मँहगाई से त्रस्त थी। वह इसका निदान चाहती थी और मोदी ने सब्जबाग दिखाया कि वे अच्छे दिन ला देंगें। विशेषज्ञ तो जानते हैं कि मँहगाई के लिए जितने घरेलू कारण जिम्मेदार होते हैं, उतने ही अन्तरराष्ट्रीय भी। इसलिए मँहगाई को जादू की छड़ी से तो दूर नहीं किया जा सकता लेकिन आम जनता इसे नहीं जानती। वह इतना भर जानती है कि प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठा व्यक्ति बेहद ताकतवर होता है और वह जो चाहे कर सकता है। मोदी ने ऐसा किया भी। पहले ही दिन से उन्होंने नियमों-कानूनों-परम्पराओं को अपने हिसाब से मरोड़ना शुरु किया है। जाहिर है कि वे शासन को अपने अनुकूल बनाने के साथ ही जनता को यह संदेश भी देना चाहते होंगें कि वे सम्प्रभु हैं। यह सन्देश जनता में गया भी। अब जनता इस सम्प्रभु से जानना चाहती है कि वे मॅहगाई और कानून-व्यवस्था को कब काबू में करेंगें। अब उसका धैर्य जवाब दे रहा है। इसमें जनता का कोई दोष नहीं। परिवर्तन का स्वाद उसे आम आदमी पार्टी ने चखाया था। शपथ ग्रहण करने के साथ-साथ उस सरकार ने पेयजल और बिजली के बिल सम्बन्धी घोषणा तत्काल ही कर दी थी। जनता समझ रही थी कि मोदी भी सत्ता में आऐंगें तो ऐसा ही कुछ करेंगें लेकिन अब वह हैरान और हतप्रभ है! सत्ता संभालने के तीन सप्ताह के भीतर ही उसे कठोर फैसलों के लिए तैयार रहने को कह दिया गया! उसे धमकी के स्वर में चेताया जा रहा है कि राशन, उर्वरक, डीजल, मनरेगा और रसोई गैस आदि पर दी जा रही छूट को समय आते ही खत्म किया जा सकता है। जनता स्तब्ध है!

                  सरकार कह रही है कि अभी तो उसके 100 दिन भी पूरे नहीं हुए हैं तो अभी से उससे ऐसी फैसलाकुन अपेक्षाऐं क्यों की जा रही हैं। बात तो सही है लेकिन 100 दिन पूरा होने से काफी पहले ही इस सरकार ने ऐसे कई फैसले कर दिए हैं जिसे करने के लिए संप्रग सरकार 10 साल हिम्मत ही नहीं कर पाई थी। इसमें से एक बहुचर्चित और विवादित मामला जैव संवर्धित बीजों का है। पिछली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इस मसले की जाँच और सुझाव के लिए एक संसदीय समिति का गठन कर दिया था जिसने अपने अध्ययन के बाद इस तरह के बीजों के भारत में परीक्षण न करने की सलाह दी थी लेकिन केन्द्र में सत्तारुढ़ भाजपा की सरकार ने बीती 18 जुलाई को ऐसे 15 बीजों के देश में परीक्षण किए जाने की चुपचाप अनुमति प्रदान कर दी है। भाजपा सरकार के इस कदम का अन्य तमाम संगठनों के अलावा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आनुषांगिक संगठन 'स्वदेशी जागरण मंच' ने भी विरोध किया है। ध्यान रहे कि वर्ष 2002 में भाजपा नीत राजग ने ही सर्वप्रथम जैव संवर्धित बीजों को बीटी कॉटन यानी कपास के रुप में देश में प्रवेश कराया था! यह चर्चा किए जाने की जरुरत है कि सरकार के इस कदम के पीछे देश में खाद्यान्न बढ़ाने की मंशा काम कर रही है या भारी-भरकम विदेशी कम्पनियों को देश के किसानों को लूटने का मौका देने की। देश में खाद्यान्न की कमी है कहाँ? लाखों करोड़ टन अनाज तो हर साल सरकारी संरक्षण में सड़ जाता है और सरकार के पास उसे रखने की जगह ही नहीं है।

                ऐसा ही एक फैसला रिलायन्स समूह द्वारा निकाली जा रही केजी बेसिन की गैस के दाम बढ़ाने का है। जानकार लोग बता रहे हैं कि गैस का दाम प्रति यूनिट दोगुना करने की सारी कार्यवाही मोदी सरकार में पूरी हो चुकी है। किसी दिन चुपके से इसे लागू कर दिया जाएगा। इसका तात्कालिक असर यह होगा कि गैस आधारित बिजली कारखाने, रासायनिक उर्वरक तथा गैस से बनने वाली अन्य तमाम वस्तुऐं मँहगी हो जाऐंगीं। रिलायन्स द्वारा आपूर्ति की जा रही गैस से नेशनल थर्मल पॉवर कार्पोरेशन बिजली बनाता है। रिलायन्स द्वारा शर्तों के उल्लंघन किए जाने पर कार्पोरेशन ने बम्बई उच्च न्यायालय में लगभग दस साल से एक मुकदमा कर रखा है। उसे निपटाने के बजाय मौजूदा सरकार रिलायन्स की पीठ ठोंकने का काम कर रही है।

               और भी बहुत से लोग हतप्रभ हैं। दिल्ली में हुए निर्भया बलात्कार-हत्याकांड के समय जिस भाजपा ने जोर-शोर से ऐसे अपराधों के खिलाफ आवाज उठायी थी,सत्ता में आने पर उसी भाजपा के सबसे कद्दावर मंत्री अरुण जेटली कह रहे हैं वह तो एक छोटी से घटना थी!जेटली तो मुलायम सिंह यादव के छोटे भाई सरीखे हो गए हैं जिन्होंने बलात्कार की बढ़ती घटनाओं पर कहा था कि लड़कों से ऐसी गलती हो ही जाती है! गैर भाजपाई मुख्यमंत्री तक हैरान हैं! प्रधानमंत्री की मौजूदगी में मंच पर उन्हें भाजपाई कारकुनों द्वारा अपमानित किया जाता है और मोदी साहब मुस्करा कर भीड़ को शान्त रहने की हिदायत देते हैं! हरियाणा, महाराष्ट्र और झारखंड में लगातार ऐसा हो चुका। हालत यह है कि प्रधानमंत्री के साथ मंच पर बैठने से अब गैर भाजपाई मुख्यमंत्री बचने लगे हैं। इसी से समझ लेना चाहिए कि अच्छे दिन का क्या मतलब था। अपने चुनावी भाषणों में मोदी साहब ने गन्ना किसानों की दशा पर काफी रोना रोया था लेकिन सत्ता में आने पर उन्होंने जो तात्कालिक काम किया वह चीनी मिल मालिकों को राहत देने का था। देश में चीनी मिलों पर गन्ना मूल्य का 11000 करोड़ रुपये बकाया है। केन्द्र सरकार द्वारा मिल मालिकों को 6600 करोड़ रुपए का ब्याजमुक्त कर्ज पाँच सालों के लिए दिया गया है लेकिन फिर भी किसानों को भुगतान शुरु नहीं हुआ है। सरकार किसानों के बजाय मिल मालिकों को किस तरह लाभ पहुँचाने में लगी है यह इससे पता चलता है कि मिल मालिकों के दबाव में सरकार ने चीनी आयात शुल्क को बढ़ाकर 40प्रतिशत कर दिया ताकि सस्ती विदेशी चीनी देश में न आ सके। इसका नतीजा यह हुआ कि बाजार में चीनी के दाम बेतहाशा बढ़ने लगे हैं। ये सब तो अभी शुरुआती लक्षण है। 'इब्तदा-ए-इश्क है, रोता है क्या, आगे-आगे देखिए होता है क्या।'

? सुनील अमर