संस्करण: 01 सितम्बर- 2014

स्वागत हिन्दू पाकिस्तान

? सुभाष गाताडे

         हा जाता है कि आदतें मनुष्य का पीछा नहीं छोड़ती और संघ परिवार उसका अपवाद नहीं है। दरअसल उसने इसने इसमें महारत हासिल की हो। ऐसी आदतों में शुमार है उसके अगुआओं की पुरानी फितरत कि विवादास्पद बातें कह देना, लोगों की प्रतिक्रिया जांचना और अगर मामला उल्टा पड़े तो तुरन्त कह देना कि उसे मीडिया ने तोड़ा मरोड़ा था।

                 जनाब मोदी के सत्तारोहण के बाद तो ऐसे बयानों, ऐसी कार्रवाइयों का अनवरत सिलसिला चल पड़ा है और यह दिखने लगा है कि किस तरह सचेतन ढंग से समाज में समुदायों के बीच आपसी नफरत की भावना पैदा करने की, अल्पसंख्यक समुदाय को निशाना बनाने की कोशिशें चल पड़ी हैं। विश्व हिन्दू परिषद के नेताओं - सिंघल और तोगड़िया - द्वारा 'अल्पसंख्यकों को अपनी हैसियत में रहने' या उन्हें 'गुजरात 2002 के सबक याद रखने' की दी गयी धमकी और गोवा के एक ईसाई मंत्री द्वारा किसी अलसुबह अपने आप को 'ईसाई हिन्दू' घोषित करने के मामले को लेकर मचा हंगामा, अभी समाप्त नहीं हुआ था कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सुप्रीमो भागवत द्वारा धर्म के आधार पर देश की एकांगी तस्वीर खींचने की कोशिशें सामने आयी हैं।

                पिछले दिनों कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर विश्व हिन्दू परिषद के स्वर्णजयन्ती कार्यक्रम का उद्धाटन करते हुए जनाब भागवत ने यह साफ कहा कि ''भारत एक हिन्दू राष्ट्र है.. इस राष्ट्र की आत्मा हिन्दुत्व है और हिन्दु धर्म बाकी धर्मो को अपने अन्दर समाहित कर सकता है।'' जब इस बयान की जबरदस्त आलोचना हुई, कइयों ने उसकी भर्त्सना की, कांग्रेस के लीडर दिग्विजय सिंह ने टिव्टर पर यह तक कहा कि 'हमें लग रहा था कि भारत में एक ही हिटलर आकार ले रहा है, मगर इस बयान से स्पष्ट हो गया कि अब दो हिटलर आकार ले रहे हैं।' तब हाल हाल तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रवक्ता रहे राम माधव - जो इन दिनों भाजपा में पदाधिकारी के पद पर नियुक्त हुए हैं - ने एक तरफ यह कहा कि दरअसल भागवत के बयान को मीडिया ने तोड़ा मरोड़ा है और साथ ही साथ यह भी कहा कि उनके बयान में गलत क्या है।

                वैसे हाल के समयों में यह दूसरी दफा था कि उन्होंने ऐसा प्रलाप किया था। पिछले ही सप्ताह कटक में मोहन भागवत ने कहा था ''सभी भारतीयों की सांस्कृतिक पहचान हिन्दुत्व है और देश के मौजूदा निवासी उसी महान संस्कृति के वंशज हैं।.. अगर इंग्लैण्ड के निवासी इंग्लिश कहलाते हैं, जर्मनी के जर्मन कहलाते हैं, संयुक्त राज्य अमेरिका के निवासियों को अमेरिकी कहा जाता है तो हिन्दुस्तान के तमाम निवासियों को हिन्दू क्यों नहीं समझा जाता।''

              शायद कोई भागवत से संविधान पलटने की सलाह देता जिसमें महज दो शब्दों 'भारत' और ' इंडिया' का जिक्र है।

             क्या यह शरारतीपूर्ण नहीं है कि उन्होंने अपने संकीर्ण एजेण्डे को आगे बढ़ाने के लिए जानबूझ कर हिन्दुस्तान की बात कही। यह अकारण नहीं कि उनके इस बयान पर एक व्यक्ति की फेसबुक टिप्पणी थी कि उन्हें कहना चाहिए था कि 'भारत के तमाम निवासी भारतीय हैं।' कोई भी यह उम्मीद करेगा कि संघ सुप्रीमो द्वारा जब ऐसी बातें जब कही जा रही हों - जो सारत: संविधान के बुनियादी उसूलों के खिलाफ हैं, जिनसे इस बहुधर्मीय समाज में आपस में तनाव बढ़ सकता है- तो 'संविधान के सबसे पवित्र किताब' होने का ऐलान करनेवाले, प्रधानमंत्री के तौर पर संसद की पहली यात्रा में पहली सीढ़ी पर माथा टेक कर उसे 'लोकतंत्र का मंदिर' घोषित करनेवाले जनाब मोदी इसके बारे में कुछ बोलेंगे। मगर ऐसे सभी मामलों में उन्होंने मौन बने रहने का निर्णय लिया है और शायद इसी वजह से उन्हें 'मौनेंद्र मोदी' भी कहा जाने लगा है।

            याद करे कि किस तरह पिछले दिनों संसद के पटल पर गोरखपुर के विवादास्पद सांसद ने काफी भडकाऊ बातें कही थीं। (देखें अमर उजाला, 19 अगस्त 2014) 'सांप्रदायिक वे हैं जो कहते हैं कि मेरा ईश्वर, मेरा पैगम्बर सबसे महान है, जो इनमें विश्वास करते है, केवल उन्हें ही जीने का अधिकार है ..हिन्दु दर्शन इसकी इजाजत नहीं देता। .. हिन्दु राष्ट्रवाद का प्रतीक है। अगर कोई राष्ट्रवाद के प्रतीक हिन्दुत्व को बदनाम करेगा तो उसे उसकी कीमत चुकानी होगी।' मगर मोदी खामोश रहे थे। या पुणे में जब एक मुस्लिम कम्प्युटर प्रोफ्रेशनल को हिन्दु अतिवादियों ने पीट पीट कर मार डाला था या महाराष्ट्र सदन में शिवसेना के सांसद ने एक मुस्लिम कर्मचारी को रमजान के महिने में जबरदस्ती रोटी खिलायी थी, ऐसे सभी मामलों में मोदी चुप ही रहे थे। वैसे ऐसी संविधानविरोधी बयानों पर पर प्रधानमंत्राी मोदी का मौन दरअसल संघ परिवार द्वारा अलग अलग आनुषंगिक संगठनों के बीच विकसित 'श्रम विभाजन' को ही उजागर करता है। अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में भी यह बात सामने आती थी। इस श्रम विभाजन के अन्तर्गत जो व्यक्ति प्रत्यक्ष सत्ता की बागडोर सम्भाले हुए है, वह एक तरफ आपसी सद्भाव, संविधान की रक्षा की बात करता रहेगा, मगर उसके आनुषंगिक संगठनों के ऐसे हिस्से जो प्रत्यक्ष सत्ता में नहीं है वह खुल्लमखुल्ला समुदाय विशेष के खिलाफ जहर उगलते मिलेंगे। वैसे अगर हम मोहन भागवत के बयान पर फिर लौटें तो उसमें एक और चालाकी नज़र आती है। वह हिन्दुत्व और हिन्दु धर्म को समकक्ष ठहराते दिखते हैं, जबकि दोनों में गुणात्मक अंतर है।

          चन्द लोग तुरन्त यह कहते मिलेंगे फिर इसमें क्या फर्क ? यह समझने की जरूरत है कि हिन्दु धर्म जहां धर्म पर केन्द्रित है तो हिन्दुत्व एक राजनीतिक परियोजना का हिस्सा है। यूं तो सितम्बर 2008 में सामने आए मालेगांव बम धमाके, जब मालेगांव के मुस्लिम बहुल इलाके में बम रख कर मासूमों को मारने की कोशिश की गयी थी और जांबाज पुलिस अफसर हेमन्त करकरे ने उसकी तहकीकात कर देश भर में फैले हिन्दुत्व आतंकी नेटवर्क का खुलासा किया था, उन दिनों  'हिन्दू धर्म' और 'हिन्दुत्व' की गुणात्मक भिन्नता पर बात हो चुकी है, मगर उसे यहां संक्षेप में दोहराना यहां समीचीन होगा।  अगर फरक को ठीक से समझना हो तो हिन्दुत्व फलसफे के शुरूआती महारथी कहे जा सकनेवाले सावरकर की ओर लौट सकते हैं, जिनकी किताब 'हिन्दुत्व' आज भी तमाम हिन्दुत्ववादी जमातों में बाइबिल समझी जाती है। संघ के संस्थापक हेडगेवार या मुंजे हो, बाद के सुप्रीमो गोलवलकर हो या बाद की पीढ़ी नेता हों , सभी के लिए यही किताब एक मार्गदर्शक ग्रंथ है।

           सावरकर 'हिन्दुत्व' शीर्षक इस किताब में हिन्दु धर्म और हिन्दुत्व में साफ फरक करते हैं। वह कहते हैं दरअसल हिन्दुइजम (अर्थात हिन्दु धर्म) हिन्दुत्व की व्युत्पत्तिा, अंश या हिस्सा है। जब तक इस बात को स्पष्ट नहीं किया जाता कि हिन्दुत्व के क्या मायने हैं, हिन्दुइजम अनाकलनीय और अस्पष्ट रहता है। इन दो शब्दों के फरक को स्पष्ट न कर पाने के चलते हिन्दू सभ्यता की साझी विरासत  का वाहक विभिन्न समुदायों में जबरदस्त गलतफहमी और परस्पर सन्देह पैदा हुए हैं।...यहां इस बात को रेखांकित करना काफी है कि हिन्दुत्व को हिन्दुइजम (अर्थात हिन्दु धर्म) के समकक्ष नहीं समझा जा सकता। मेरे खयाल से इसके पहले कि भागवतजी के कथन से लोग दिग्भ्रमित हों, उन्हें चाहिए कि सावरकर की इस चर्चित किताब 'हिन्दुत्व' को ठीक से पढ़ें, तभी वह जान सकते हैं कि हिन्दु धर्म और हिन्दुत्व में क्या अंतर है। उन्हें यह समझना होगा कि जिस तरह इस्लाम और पोलिटिकल इस्लाम को, यहुदी धर्म और जियनवाद को एक ही पलड़े पर नहीं रखा जा सकता, उसी तरह हिन्दुइजम और हिन्दुत्व को एक ही तराजू पर नहीं रखा जा सकता। वैसे भारत को सारत: हिन्दुओं का मुल्क साबित करने की ऐसी तमाम कवायदें भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के उस कथन की याद ताजा करती हैं जिसमें वह धर्मनिरपेक्षता के आधार पर स्वाधीन भारत का निर्माण एवं विकास करने का खांका खींचने के बजाय उसे धार्मिक आधारों पर पुनर्गठित करने के लिए आमादा हिन्दुत्ववादी ताकतों को बेपर्द करते दिखते हैं। नेहरू कहते थे कि ऐसे लोग दरअसल 'हिन्दू पाकिस्तान' का निर्माण करना चाह रहे हैं। भागवतजी, आप सुन रहे हैं ?

? सुभाष गाताडे