संस्करण: 01 सितम्बर- 2014

100 दिन, वादे लापता, इरादे जाहिर

? विवेकानंद

         रेंद्र मोदी सरकार के 100 दिन पूरे हो चुके हैं। चुनाव प्रचार के दौरान नरेंद्र मोदी और बीजेपी नेताओं ने जनता को कई तरह के सपने दिखाए। लेकिन यथार्थ के कठोर धरातल वे कितने फलीभूत हुए या होने की संभावना है, सरकार के 100 दिनों के कामकाज से स्वत: स्पष्ट हो जाता है। पिछले 100 दिनों में सरकार एक भी काम ऐसा नहीं किया जो उम्मीदें जगाता हो अलबत्ता कम से कम 10 ऐसे काम किए हैं जो सरकार और पार्टी के इरादे साफ जाहिर करते हैं।

                 पहला: नरेंद्र मोदी ने पराजित नेताओं को मंत्री बनाया और योग्य लोगों को दरकिनार किया। इनमें सबसे पहला नाम है वित्त मंत्री अरुण जेटली और दूसरा स्मृति ईरानी का। वित्त मंत्री अरुण जेटली चुनाव हार गए थे, बावजूद इसके उन्हें वित्त मंत्री बनाया गया। जबकि स्मृति ईरानी को एक ऐसा मंत्रालय सौंपा गया जिसके लिए कई ऐसे दक्ष सांसद बीजेपी के पास थे। उन्हें नजरअंदाज करके स्मृति ईरानी को नवाजा गया। जनता के साथ यह पहला छल था। जनता जिन्हें नकार चुकी थी उन्हें सरकार ने जनता के सिर पर बैठा दिया।

               दूसरा काम: मोदी ने न्यायपालिका की स्वतंत्रता में दखल दिया। सरकार ने  वरिष्ठ वकील गोपाल सुब्रह्मण्यम की सुप्रीम कोर्ट में नियुक्ती को बिना चीफ जस्टिस की सलाह के ठुकरा कर उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के सम्मान को चोट पहुंचाई, जिसके बाद चीफ जस्टिस को कहना पड़ा कि भविष्य में ऐसी गलती न हो। बहरहाल संवैधानिक संस्थाओं को तवजो न देना मोदी का पुराना स्टाइल है। गुजरात के मुख्यमंत्री रहते मोदी ने कैग की रिपोर्टों पर विधानसभा में कभी चर्चा नहीं कराई। विपक्ष को कभी तबजो नहीं दी। मुख्यमंत्री रहते मोदी ने कई बार अदालतों को नजरअंदाज करने की कोशिश की। चाहे वह लोकायुक्त की नियुक्ति का मामला हो या फिर उनके मंत्री के खिलाफ  केस चलाने का मामला हो, कोर्ट को सख्त होना पड़ा तब मोदी माने। प्रधानमंत्री का पद हासिल करने के बाद भी उनका यही रवैया बदस्तूर जारी है।

             तीसरा: दागी और भ्रष्ट नेताओं को तवजो मिली। ईमानदारी का राग अलापने वाले मोदी ने भ्रष्ट और दागी नेताओं को जमकर सिर आंखों पर बैठाया। यहां तक कि भ्रष्टाचार के आरोप में जेल गए कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा को भी सियासी मुनाफ के लिए मोदी महाशय पार्टी में ले आए। चौहद-चौहद दागी नेताओं को मंत्री बनाया। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने जब सलाह दी तब बीजेपी की ओर से कहा गया कि कोई भी दागी कैबिनेट में मंत्री नहीं है। जितने भी आरोप हैं वे सब अयोध्या आंदोलन से जुड़े हैं। यह सरासर झूठ है, कुछ ऐसे नेता भी मंत्री हैं जिन पर बलात्कार जैसा संगीन आरोप है और कोर्ट उन्हें तलब भी कर चुका है, बावजूद इसके बीजेपी उन्हें न केवल बचा रही है बल्कि मंत्री पद पर बैठाए हुए है।

            चौथा: मोदी सरकार महंगाई पर भी लगाम लगाने में नाकाम रही। यह वो मुद्दा था जिसने चुनाव जिताने में अहम भूमिका निभाई। महंगाई को लेकर बीजेपी और मोदी ने यूपीए सरकार पर जितने तंज कसे उसके मुकाबले एक प्रतिशत काम सत्ता में आने के बाद महंगाई पर लगाम लगाने के लिए नहीं किया। चुनाव प्रचार के दौरान बीजेपी महंगाई के लिए यूपीए सरकार की जिन नीतियों को देश विरोधी कहती रही उन्हीं को लेकर अब आगे बढ़ रही है। नरेंद्र मोदी का वह फार्मूला भी गायब है, जिसे वह मनमोहन सिंह को देकर महंगाई पर लगाम लगाने की बात कहते रहते थे। आर्थिक मोर्चे पर विपक्ष में रहते हुए बीजेपी को जिस-जिस नीति, जिस-जिस योजना से परहेज था आज नहीं है। अरुण जेटली द्वारा पेश किए गए जिस बजट को अच्छे दिनों की आहट बताया जा रहा है, वह भी मनमोहन सिंह सरकार की नीतियों पर ही आधारित है। बीमा क्षेत्र को जो एफडीआई के लिए खोला गया है ये कांग्रेस की शुरुआत थी जिसे मोदी सरकार ने पूरा किया है। रक्षा क्षेत्र में जो विदेशी निवेश का रास्ता खोला गया है वह भी एक पुराना कदम है। राजकोषीय घाटे का जो लक्ष्य पी चिदंबरम ने रखा था उसे अरुण जेटली ने भी अपने बजट में जगह दी है। डीजल पर सब्सिडी की यूपीए की नीति को अरुण जेटली ने अपनाया है। महंगाई के लिए भी जो तर्क दिए जा रहे हैं वो यूपीए से मिलते-जुलते हैं। जीएसटी का मसला यूपीए ने उठाया था लेकिन भाजपा के विरोध के कारण लागू नहीं हो पाया, जेटली जी अब इसे लेकर आश्वस्त हैं।

             पांचवा: कालाधन यूं तो सरकार की प्राथमिकताओं में था। बाबा रामदेव ने तो इसे मोदी के लिए चुटकियों का काम बताया था और खुद मोदी ने कालाधन वापस लाकर देशवासियों में बांटने की बात कही थी। वह भी सरकार बनने के केवल 100 दिनों में। लेकिन इन दिनों में केवल बातें ही हो रही हैं। हां कभी-कभी खबरें आती हैं कि बस कालाधन पता चलने वाला है, अगले दिन ही उसके खिलाफ खबर आ जाती है। कभी-कभी तो संदेह होने लगता है कि सरकार कहीं ऐसी खबरें प्लांट तो नहीं करा रही। बहरहाल कालाधन पर भी मोदी सरकार के पास वही तर्क हैं जो यूपीए के पास हुआ करते थे और तब बीजेपी उन्हें मानती नहीं थी।

            इसके अलावा पाकिस्तान और चीन की हरकतें नहीं थमीं, कूटनीतिक मोर्चे पर भी फेल साबित हुए। जबकि लोकसभा चुनाव के दौरान बीजेपी और उसके समर्थक नरेंद्र मोदी को इस तरह पेश कर रहे थे कि दुनिया भर में भारत की धाक होगी, चीन और पाकिस्तान तो घुटने ही टेक देंगे। लेकिन हुआ सबकुछ इसके उलट। और यह उलटी चाल चलना तो मोदी जी ने प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने से पहले ही शुरू कर दी थी। उन्होंने अपने शपथ समारोह में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ को न्यौता दिया था। इसे मोदी की डिप्लोमेसी बताकर इस तरह उछाला गया कि शरीफ फंस गए। पर शरीफ बाकायदा आए और बिरयानी खाकर चले गए। बदले में सीमा पर आतंकियों की बंदूकें गरज रही हैं। चीन की सेना भी सीमा पार कर लगातार भारत की सीमा में घुस रही है। पच्चीस-तीस किलोमीटर तक घुस रही है और सरकार मुंह ताक रही है। ब्रिक्स सम्मेलन में मोदी ब्राजील गए। मोदी के पास मौका था कि वे ब्रिक्स देशों पर तो कम से कम अपनी धाक जमाते। लेकिन चीन ब्रिक्स बैंक का मुख्यालय अपने यहां ले जाने में कामयाब रहा। भारत इतने पर ही इतराता रहा कि बैंक का पहला अध्यक्ष भारतीय होगा। लेकिन सच यह है कि बैंक का मुख्यालय पाकर चीन ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली है और नरेंद्र मोदी ऐसा नहीं करवा पाए। यानि 60 दिनों में मोदी कोई ऐसा काम नहीं कर पाए, जिस तरह उनको चुनाव के दौरान पेश किया गया था।

           राजनीति के लिए संघीय ढांचे पर चोट करने से भी मोदी नहीं चूके।  पिछले दिनों प्रधानमंत्री की मौजूदागी में तीन-तीन मुख्यमंत्रियों को अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ा। इसके बाद आजादी के बाद पहला मौका है जब किसी प्रधानमंत्री के कार्यक्रम का किसी मुख्यमंत्री ने बहिष्कार किया हो या किसी मुख्यमंत्री ने सीधे-सीधे यह चेतावनी दी हो कि वह केंद्रीय मंत्रियों को प्रदेश में घुसने नहीं देंगे। ऐसा भी कभी नहीं हुआ कि किसी रायपाल को इस बावत कोर्ट की शरण लेना पड़े कि उसे पद से हटाने के लिए दबाव बनाया जा रहा है। एक सप्ताह में तीन-तीन मुख्यमंत्रियों को प्रधानमंत्री के सामने उनके ही समर्थकों के कारण अपमानजनक स्थिति का सामना करना पड़ा हो। बीजेपी का तर्क है यह प्रधानमंत्री की लोकप्रियता और विपक्षी दलों की अलोकप्रियता का परिणाम है। लेकिन यह तर्क इसलिए गले नहीं उतरता क्योंकि संबंधित रायों के मुख्यमंत्री केवल एक ही कार्यक्रम में नहीं गए हैं, वे अपने राय में रोज ढेरों कार्यक्रमों में भाग लेते हैं, उन्हें कभी इस तरह की असम्मानजनक स्थिति का सामना नहीं करना पड़ा। यदि वे वाकई इतने अलोकप्रिय हो चुके होते कि उन्हें कोई सुनना पसंद नहीं करता तो हर कार्यक्रम में उनके खिलाफ  हूटिंग होनी चाहिए। यह तभी क्यों हुआ जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ उन्होंने मंच साझा किया। इससे स्पष्ट होता है कि यह एक सुनियोजित राजनीति षडयंत्र का हिस्सा है।

            नवमें और दसवें काम में मोदी सरकार और पार्टी की नीयत दिखाई देती है। पार्टी और सरकार यूपी में हुए दंगों के दागियों को सम्मानित कर रही है उन्हें जेड प्लस सुरक्षा दे रही है, दूसरी ओर उसके नेता वोटों के धु्रवीकरण के लिए जहरीले बोल बरसा रहे हैं। लव जेहाद, यह शब्द कहां से आया और किसकी ईजाद है, इसको शायद ही बहुत लोग जानते हों। लेकिन पिछले एक सप्ताह में अधिकांश लोग न केवल यह जानने लगे हैं बल्कि अपनी-अपनी अकल लगाकर इसके अपने-अपने मतलभ भी निकाल चुके हैं। आजकल यह शब्द राजनीतिक लाभ, वोटों के ध्रुवीकरण और संप्रदायों में नफरत का जहर घोलने का काम बखूबी कर रहा है। टीवी मीडिया भी दो गैर संप्रदायों के युवक युवती की दर्दनाक दास्तां को इसी टैग नाम से सुबह से शाम तक दिखा रहा है।  बीजेपी ने इस तरह के संबंधों को लव जेहाद का नाम देकर इससे राजनीतिक लाभ लेने की शुरूआत की। यह कहना अतिश्योक्ति न होगी कि इसी तरह के लव जेहादियों को पार्टी अपनी गोद में बैठाए हुए है। बीजेपी के उपाध्यक्ष मुख्तार अब्बास नकवी और पार्टी प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन ने हिंदू महिलाओं से विवाद किया है, क्या उन्होंन लव जेहाद के लिए शादी की थी। सुब्रह्मण्यम स्वामी की बेटी सुहासिनी ने भी नदीम हैदर से शादी की है। बीजेपी सांसद हेमा मालिनी ध्रमेंद्र से इस्लाम धर्म कबूल करके ये शादी रचाई थी। यदि बीजेपी के तथाकथित हिंदू धर्मध्वजा रक्षक लव जेहाद के खिलाफ लड़ना ही चाहते हैं तो इनसे इतना प्रेम क्यों? क्या ये सभी लव जेहादी हैं? कतई नहीं और न ही बीजेपी नेता इन्हें ऐसा मानते हैं। यह सब जनता को भड़काने और बांटने की चाल है। जो बताती है कि बीजेपी और सरकार इस देश को किस दिशा में और कहां ले जाना चाहती है। इसका मूल्य कौन चुकाएगा सरकार को इससे कोई मतलब नहीं।

? विवेकानंद