संस्करण: 01 सितम्बर- 2014

5 सितम्बर : शिक्षक दिवस पर विशेष

शिक्षक भूल रहे अपना सामाजिक दायित्व

? डॉ. गीता गुप्त

          क जमाना था जब शिक्षक को राष्ट्र निर्माता के रूप में अपार सम्मान दिया जाता था। आज भी उसकी भूमिका बदली नहीं है मगर समाज में उसका सम्मान निरन्तर घटता जा रहा है। डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासनिक अधिकारी, न्यायाधीश, कलाकार आदि किसी से भी उसकी तुलना संभव नहीं है। इन सबको गढ़ने वाला शिक्षक ही है, फिर भी वह समाज में हाशिए पर है। इक्कीसवी शताब्दी के समाज को शिक्षक से बहुत अपेक्षाएं हैं। मगर सरकार, प्रशासन और समाज-किसी का भी ध्यान शिक्षा और शिक्षक की विडम्बनाओं पर नहीं है। इन दिनों शिक्षा की गुणवत्ता पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं, शिक्षा की दुर्दशा पर बहस की जा रही है और शिक्षकों को कठघरे में खड़ा करने की कोशिशें की जा रही हैं। यह दुर्भाग्यपूर्ण है।

                    गम्भीरतापूर्वक विचार करें तो स्पष्ट हो जाएगा कि वर्तमान में शिक्षक एक वेतनभोगी कर्मचारी मात्र है, जो कठपुतली की तरह सरकारी अधिकारियों के इशारों पर नाचने के लिए विवश है। अधिकारी पाठयक्रम तय करते हैं, शिक्षा पध्दति निर्धारित करते हैं, परीक्षा के नियम बनाते हैं, मूल्यांकन के मानदण्ड निरूपित करते हैं, परीक्षा और शिक्षा की रूपरेखा, समय-सारिणी-सब कुछ वही तय करते हैं। इनमें शिक्षक की कोई भूमिका नहीं होती। वह तो यंत्रवत सारे कार्य संचालिक करता है, जो उसे सौंपे जाते हैं। और जरा सी भी चूक होने पर दण्ड भुगतने के लिए विवश होता है क्योंकि अधिकारियों की दृष्टि में वह एक तुच्छ प्राणी है, उसकी हैसियत एक 'कर्मी' की तरह है। प्राथमिक शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक के शिक्षकों की स्थिति एक समान है। दु:खद बात यह है कि शिक्षक, केवल अपने अधिकारों की चिंता करते हैं, अपने कर्तव्यों एवं सामाजिक सरोकारों का या तो उन्हें बोध नहीं है अथवा जानबूझकर उसकी अवहेलना करते हैं।

                     समूचे देश में शिक्षा में अनेक विसंगतियां व्याप्त हैं लेकिन उनके निराकरण हेतु शिक्षकों की ओर से कोई पहल दिखाई नहीं देती। वे वेतन वृध्दि के लिए तो आन्दोलन करने सड़कों पर उतर आते हैं मगर एकजुट होकर कभी इस बात के लिए सरकार पर दबाव नहीं बनाते कि पूरे देश में विद्यार्थियों के हित में समान शिक्षा पध्दति लागू की जाए, त्रिभाषा फार्मूले को अपनाया जाए, पहली कक्षा से लेकर आठवीं कक्षा तक विद्यार्थियों को परीक्षा से मुक्त रखने की गलत परंपरा समाप्त की जाए, पारम्परिक शिक्षा में सेमेस्टर प्रणाली लागू न की जाए, शिक्षा में राजनीतिक हस्तक्षेप पूर्णत: निषिध्द हो, शिक्षा से जुड़े प्रत्येक कार्य में शिक्षकों की ही भूमिका सुनिश्चित की जाए, उनसे गैर शिक्षकीय कार्य लेना पूरी तरह बन्द किया जाए, उनकी सेवा-शर्तों और स्थानांतरण में पारदर्शिता नीति अपनायी जाए, आदि-आदि। इन तमाम बिन्दुओं पर शिक्षकों का मौन यही सिध्द करता है कि उन्होंने विडम्बनाओं को अपनी नियति मान लिया है और यह भी कि उनके लिए सब कुछ सरकार ही तय करेगी, उन्हें स्वयं कुछ करने की जरूरत नहीं है। इसी कारण विसंगतियां बढ़ती जा रही हैं। शिक्षक मूक दर्शक बने देख रहे हैं।

                  निश्चय ही, शिक्षा और शिक्षक दोनों का अवमूल्यन हो रहा है। यह चिंताजनक है। शिक्षा व्यावसायिक हो चली है अतएव गुरु-शिष्य की आदर्श प्राचीन परम्परा अब दिखाई नहीं देती। शिक्षण संस्थान व्यावसायिक संस्थानों में परिणत हो गए हैं। उनका उद्देश्य धन कमाना है और सूचनात्मक ज्ञान के बल पर धन उगाने वाले यंत्र-मानव या मानव यंत्रों का निर्माण करना है। वहां नैतिकता और आदर्श का कोई स्थान नहीं है। गुरु-शिष्य के बीच रागात्मक संबंध जैसी कोई बात नहीं है। शिक्षा संस्थानों की भूमिका दुकानदारों की तरह ले गई है। शिक्षा देने के नाम पर सस्ती महंगी दुकाने खुल गई हैं। कहीं शुल्क के नाम पर लूट मची है, कहीं फर्जीवाड़ा हो रहा है। डिग्रियां खरीदी-बेची जा रही हैं। सही अर्थों में शिक्षा देने वाले संस्थान और शिक्षक नाममात्र के रह गए हैं। इसलिए विद्यार्थी सच्ची शिक्षा से दूर होते जा रहे हैं। शासकीय शिक्षा संस्थानों में शिक्षकों का अभाव है। निजी संस्थानों में योग्य शिक्षक तो हैं मगर वे विद्यार्थियों के साथ व्यावसायियों की तरह पेश आते हैं इसलिए दोनों के बीच ऐसा नाता नहीं बन पा रहा है कि विद्यार्थी शिक्षक से चारित्रिक मूल्यों और जीवनादर्शों की शिक्षा प्राप्त कर सकें।

                 यह दु:खद सत्य है कि शिक्षक अपना सामाजिक दायित्व भूल गए हैं। यही वजह है कि जिस युवा ऊर्जा के बल पर स्वस्थ समाज का निर्माण होना चाहिए, वह रैगिंग, बलात्कार, लूटपाट, हिंसा और अनेकानेक अपराधों में लिप्त दिखाई दे रही है। जबकि ऐसी कोई सामाजिक विसंगति नहीं है जिसका निराकरण युवा शक्ति के बूते पर संभव न हो। दहेज, कन्या-भ्रूण-हत्या, महिला हिंसा, अपराध, नैतिक मूल्यों का पतन, साम्प्रदायिक भेद भाव आदि बुराइयों को समूल नष्ट करने में विद्यार्थी जगत अभूतपूर्व योगदान कर सकता है। मगर इसके लिए उसे प्रेरक और मार्गदर्शक की आवश्यकता है, जो शिक्षक से बढ़कर कोई और नहीं हो सकता। लेकिन शिक्षक स्वयं इन बुराइयों में लिप्त हो तो वह विद्यार्थियों को प्रेरणा कैसे देगा ?

                 यह विडम्बना ही है कि समूचे विश्व में शिक्षक ऐसा आचरण प्रस्तुत कर रहे हैं जो शिक्षा के भविष्य पर प्रश्नचिन्ह लगाता है और शिक्षकों को समाज व कानून के कठघरे में खड़ा करता है। आए दिन समाचार पत्रों में ऐसी खबरें सुर्खियों में होती है-'बच्चे चुप न हुए तो शिक्षक ने चाकू से हाथ जला दिए, सिर जमीन पर दे मारा,' बैग में मोबाइल रखने की सजा-टीचर ने कपड़े उतरवाए, छात्रा ने लगाई फांसी, छात्र पेन लाना भूला तो टीचर ने मंगवाई भीख, 'होमवर्क नहीं करने पर मासूम को स्केल से पीटा,' टाई की नॉट ढीली पाये जाने पर स्कूल में पिटाई से बच्चा हुआ बेहोश, टीचर की पिटाई से छात्र के कान का पर्दा फटा। ये तमाम सुर्खिया शिक्षक के आचरण का एक पक्ष उजागर करती है। अब दूसरा पक्ष उजागर करने वाली सुर्खियों पर भी ग़ौर करें-होनहारों के भविष्य से शिक्षकों ने किया मजाक़-पढ़ाने लगे प्रेम का पाठ, लगाई तंत्र-मंत्र की क्लास, छात्रा से गैंगरेप, प्रोफेसर निलंबित, महिला पॉलीटेक्निक कॉलेज की छात्राओं से शिक्षक कहते हैं-हमारे साथ बाथरूम चला करो, आदि-आदि। इन उदाहरणों से स्पष्ट है कि शिक्षकों के भीतर कितनी निर्ममता, कितनी वासना और कितनी कुत्सा भरती जा रही है ? हालांकि सभी शिक्षक निष्ठुर और कदाचारी नहीं होते परन्तु जिस तरह एक मछली पूरे तालाब को गंदा कर देती है, ठीक उसी तरह एक शिक्षक का गलत आचरण पूरे शिक्षक वर्ग को कलंकित कर उनकी प्रतिष्ठा को धूमिल कर देता है।

                शिक्षकों को कभी नहीं भूलना चाहिए कि वे समाज का आदर्श होते हैं। विद्यार्थी अपने माता-पिता से बढ़कर उनका सम्मान और अनुशीलन करते हैं। इसलिए निजी स्वार्थों से ऊपर उठाकर उन्हें समाज व राष्ट्र के हित में ऐसा आचरण करना होगा, जो दूसरों के लिए प्रेरणास्पद हो। वे विभिन्न क्षेत्रों के वेतनभोगियों की तरह स्वच्छंद आचार-व्यवहार करने हेतु स्वतंत्र नहीं हैं। उनपर स्वस्थ समाज और स्वस्थ राष्ट्र के निर्माण का दायित्व है। यह गौरवपूर्ण कार्य है, जिसे शिक्षक ही कर सकता है। आज यदि विद्यार्थी दिशाहीन और उच्छृंखल हो रहे हैं, समाज में विसंगतियां विकराल रूप धारण कर रही हैं, तो इसका मतलब साफ है कि शिक्षक अपने सामाजिक सरोकार से विमुख हो गए हैं। उन्हें आत्मावलोकन करना होगा। डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन जैसे शिक्षक यदि अपने व्यक्तित्व एवं कृतित्व से देश के सर्वोपरि पद पर पहुंच सकते हैं और यह गौरव पा सकते हैं कि उनकी जन्मतिथि शिक्षक दिवस के रूप में मनायी जाए, तो दूसरे शिक्षक अपने पदचिन्हों का अनुसरण कर कीर्तिमान स्थापित क्यों नहीं कर सकते ? यह प्रश्न हर शिक्षक के मन में उत्पन्न होना चाहिए। तभी शिक्षक दिवस का आयोजन सार्थक होगा।

 

? डॉ. गीता गुप्त