संस्करण: 01 सितम्बर- 2014

मीडिया से दूर आदिवासी के सवाल 

? अमिताभ पाण्डेय

              प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण में आदिवासी समुदाय का योगदान महत्वपूर्ण है। शहरी मानसिकता  और उसके पीछे छिपे बाजार ने अपने स्वार्थ की खातिर जल, जंगल, जमीन,जानवर को काफी नुकसान पहॅुचाया है। बाजारवाद और शहरीकरण की कीमत हमें बिगडते पर्यावरण, बढते प्रदूषण ,लगातार नष्ट होती जैव विविधता के रूप में चुकानी पड रही है। बाढ, सूखा, भूकम्प, गिरते पहाड, भूस्लखन सहित अन्य प्राकृतिक आपदाएं सीधा इशारा करती हैं कि प्रकृति का बेहिसाब दोहन बंद किया जाये। मुनाफे के लालच में शुभ को छोडकर केवल लाभ ही लाभ देखने कमाने की प्रवृति ने प्रकृति और मनुष्य के तालमेल को बिगाडकर रख दिया है। अब हाल यह है कि मनुष्य प्रकृति के साथ स्वस्थ -मस्त रहने की बजाय अपने फायदे के लिए प्रकृति को ही नष्ट करने में लगा है। जिसको जहॉ मौका मिले वहीं प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहॅुचाने में जुट जाता है। ऐसा लगता है कि प्राकृतिक संसाधनों को खत्म करने की अघोषित प्रतिस्पर्धा सी चल रही है जिसमें हर कोई प्राकृतिक संसाधनों पर कब्जा करके उनको खत्म कर देना चाहता है। प्राकृतिक संसाधनों की दिनों दिन बढती लूट को रोकने के लिए बनाये गये कानून बेअसर साबित हो रहे हैं। इस कारण जल,जंगल,जानवर,जमीन,जानवर के अस्तित्व पर संकट बढ गया है। वन,वन भूमि,वन्य जीव-जंतु , नदी-नाले , पहाड , दुलर्भ जडी बूटियॉ , और अन्य कई प्राकुतिक संसाधन लगातार कम होते जा रहे हैं ,नष्ट होते जा रहे हैं। मनुष्य के लालच ने प्रकृति के संतुलन को बिगाडकर रख दिया है।  

                          बाजारवाद और शहरीकरण से नष्ट हो रहे प्राकृतिक संसाधनों की लूट को रोकने के प्रयास विफल हो रहे हैं। इसके बाद ही हमारे समाज में एक समुदाय ऐसा है जो प्रकृति से अपना रिश्ता लगातार कायम रखे हुए हैं। यह समुदाय बरसों से प्रकृति के साथ, प्राकृतिक वातावरण में ही अपना जीवन यापन करता है। यह समुदाय आदिसासी का है जो प्रकृति के बीच,प्रकृति के साथ रहते हैं। प्रकृति की पूजा करते हैं। पेड,पशु,नदी,पहाड जिनके लिए दोहन का नहीं पूजन का विषय है। आदिवासी समुदाय आज भी प्रकृति के संरक्षण संवर्ध्दन में जुटा है। आज हमारे देश मे जंगल और अन्य प्राकृतिक संसाधन केवल उन्हीं इलाकों में बचे हैं जहॉ आदिवासी समुदाय के लोग निवास करते है। यह दुख का विषय है कि शहरी सभ्यता से आदिवासी कुछ नहीं मागंते फिर भी शहर ,शहर के लोग, उन लोगों के पीछे खडा बाजार आदिवासियों के लिए, वे जहॉ निवास करते है उस जंगल के लिए मुसीबत बन रहा है। शहर के लोगों उनके द्वारा बनाये गये कानून आदिवासी से उसका जंगल में रहने का हक अधिकार छीन रहे हैं। आदिवासी समुदाय को जंगल छोडने के लिए तरह तरह के नियम कानून के बहाने मजबूर किया जा रहा है। जो आदिवासी शहरी सभ्यता की चालाकियों,बाजार के स्वार्थ से अनजान है उसे जंगल से धकेलकर बाहर किया जा रहा है। जंगल से निकालने के लिए तमाम तरह की कोशिशें हो रही है जिनके चलते आदिवासी समुदाय के लोगों का जीना मुशिकल होता जा रहा है। उनके साथ हो रहे अन्याय , जगंल में ही जीवन बिताने के  लिए उनके द्वारा जो संषर्घ  किये जा रहे है वे शहरी सभ्यता के आचार-विचार-व्यवहार पर गंभीर सवाल खडे करते है। ये सवाल आदिवासी समुदाय के शोषण,उपेक्षा ओर अपमान के साथ ही प्रकृति पर बाजार के कारणआये संकट से भी जुडे है। मुख्यधारा कें मीडिया में जहॉ समाज के उच्च वर्ग ,मध्यम वर्ग और निम्न वर्ग के लोगों की खबरोंको भी स्थान मिल जाता है वहीं आदिवासी समाज उनकी समस्याओं ,उनके साथ हो रहे अन्याय को उतना महत्व नहीं मिल पाती। उनके शोषण अन्याय की कहानियॉ कई बार जंगल में दबकर रह जाती है। आदिवासी समुदाय की समस्याओं पर चर्चा ओर चिंतन के लिए हाल ही में सामाजिक सरोंकार से जुडी एक संस्था विकास संवाद ने सेंमिनार का आयोजन किया। मीडिया और आदिवासी विषय पर आयोजित इस सेमिनार में आदिवासी समुदाय के बारे में चिंतन, अध्ययन करने वाले सामाजिक कार्यकर्ताओं और मिडीया विशेषज्ञों ने अपने विचार प्रकट किये। इस सेमिनार में आये वक्ताओं ने स्वीकार किया  कि मीडिया में आदिवासी समुदाय के सवाल प्रमुखता से नहीं उटाये जाते। यह समुदाय मीडिया की उपेक्षा का शिकार है। यदि हमें आदिवासी समुदाय से जुडी समस्याओं को आम जनता तक पहुॅचाना है तो मीडिया की मुख्यधारा में आदिवासी समुदाय के पत्रकारों की संख्या बढे इस पर ध्यान देना होगा। मीडिया में अभी जो पत्रकार काम कर रहे हैं उनकी आदिवासी मुद्दों के प्रति समझ कैसे बढे, उनकी संवेदनशीलता कैसे बढे ? इस पर भी ध्यान देना होगा। इस सेमिनार में आये वक्ताओं ने आदिवासी समुदाय की संस्कृति,उनकी जीवनशैली, खाघ सृरक्षा ,प्रकृति संरक्षण में उनकी भूमिका पर विस्तार से चर्चा की। चर्चा के दौरान यह निष्कर्ष भी निकलकर आया कि यदि आदिवासियों को उनकी परम्परा अनुसार रहने,खाने के लिए छोड दिया जाये ,उन पर शहरी जीवनशैली को महिमामंडित करने के प्रयास बंद कर दिये जाये तो भी उनको लाभ होगा। आदिवासी समुदाय के मन से हीनता का बोध पूरी तरह खत्म करने के प्रयास तेज किये जान चाहिये। सेमिनार में मीडिया विशेषज्ञं ने कहा कि मीडिया में आदिवासी समुदाय से जुडी घटनाओं और समाचारों को कई बार गैरजिम्मेदारी और अपूर्ण तथ्यों के आधार पर प्रस्तुत किया जाता हे इस पर रोक लगाने की जरूरत हे। आदिवासी समुदाय में जो अच्छा हो रहा है उसको की सकारात्मक तरीके से मीडिया में लाना चाहिये। उनके सवाल ,उनकी समस्याओं पर समाज में अधिक से अधिक चर्चा हो सके इसके लिए सुनियोजित रणनीति बनाये जाने और उसको लागू किये जाने की जरूरत है। हमारे समाज का बडा वर्ग ऐसा जो आदिवासी समुदाय की पर्यावरण संरक्षण संबंधी परम्पराओं,उनके सहअस्तित्व की भावना, उनकी स्वस्थ जीवनशैली के कारण,सहित अनेक अनेक अच्छे गुणों से अनजान है।मीडिया में आदिवासी समुदाय की अच्छी परम्पराओं का फिलहाल उतना जिक्र नहीं किया जा रहा हे जितना कि होना चाहिये। यदि इस बारे मे मीडिया की ओर से प्रयास किये जायें तो शेष समाज भी आदिवासी समुदाय की अच्छी परम्पराओं उनके रीति रिवाज के बारे में बेहतर तरीके से अपनी जानकारी बढा सकेगा। ऐसा होने से उनकी समस्याओं के समाधान की राह भी जरूर निकलेगी। सरकारी स्तर पर भी आदिवासी समुदाय से जुडी समस्याओं के समाधान त्वरित गति से हो सकें इसके लिए प्रभावशाली कार्ययोजना को लागू किये जाने की आवश्यकता हे। ऐसा हो सका तो आदिवासी समुदाय को उपेक्षित जीवन से मुक्ति मिलेगी।

 

? अमिताभ पाण्डेय