संस्करण: 01 सितम्बर- 2014

स्कूलों तक पहुॅचा  रैंगिंग का आतंक ?

?  डॉ. सुनील शर्मा

         ग्वालियर के सिंधिया स्कूल का हाइप्रोपाइल रैंगिग मामला चर्चा में है। रैंगिंग से पीड़ित बच्चा जिंदगी और मौत के बीच संघर्ष कर रहा है। स्कूल प्रशासन पालकों से माफी मॉग रहा है और सरकार न्यायिक जॉच की बात कर रही हैं। हो सकता है प्रशासनिक जॉच में दोषी पाए छात्रों को दंडित किया जाए?या फिर यह भी संभव है कि उन्हें भविष्य में सुधरने की चेतावनी देकर छोड़ दिया जाएगा क्योंकि आखिर बच्चे तो हैं?लेकिन जिंदगी और मौत के संघर्ष में विजय के बाद भी नवीं कक्षा के इस बच्चे ने अपने वरिष्ठ छात्रों का जो आतंक भोगा है, वह उसके मस्तिष्क पर सारी जिंदगी छाया रहेगा जो कहीं न कहीं उसके विकास को प्रभावित करेगा?अब प्रश्नचिन्ह तो यह है कि ग्वालियर का सिंधिया जो कि सारे देश में प्रतिष्ठा रखता है अगर वहॉ भी बच्चे सुरक्षित नहीं हैं तो देश के अन्य स्कूलों के हालात् कैसे होगें?वास्तव में हालात बहुत गंभीर हैं एवं अधिकांश स्कूलों में छोटे बच्चे रैंगिंग के आतंक से जूझ रहें हैं यह रैंगिग कहीं प्रताड़ना के नाम पर है तो कहीं अनुशासन के नाम पर ?भोपाल के नामी माउण्ट कार्मेल स्कूल का अभी हाल की वाकया उल्लेखनीय है कुछ दिन पूर्व छुट्टी के दौरान बस में चढ़ने के लिए दौड़ते बच्चों में खौफ पैदा करने के लिए है 12 वीं कक्षा के एक सीनियर छात्र ने तीसरी कक्षा के छात्र  के गर्दन पकड़ी और हवा में लहरा दिया, बच्चा दर्द से तड़फता रहा, चीखता रहा लेकिन किसी ने उसे रोका नहीं कुछ देर बाद बड़ी मुश्किल से अपने सीनियर की गिरफ्त से मुक्त हुआ। डर के कारण बच्चे ने तुरन्त तो घर में नहीं बतलाया लेकिन गर्दन में दर्द बढ़ने पर अपने सीनियर भैया की करतुत पालकों को बतलाई। घबड़ाए पालक स्कूल प्रबंधन के पास आए तो प्रबंधन के पास क्षमा याचना के अलावा कोई शब्द नहीं थे। इस घटना से बच्चा अभी तक दहशत में है और स्कूल जाने में आनाकानी करता है। वास्तव में सीनियर छात्र की यह हरकत जानलेवा बच्चे के लिए हो सकती थी।

                 अब इस घटना का दोषी कौन? निश्चित तौर पर स्कूल प्रबंधन, क्योंकि यह सीनियर विद्यार्थी बस में चढ़ने के दौरान छोटे बच्चों में अनुशासन देखता था, जो कि स्कूल प्रबंधन द्वारा तय किया गया था। जब बच्चों को बच्चों में अनुशासन रखने की जिम्मेदारी दी जाएगी तो इस प्रकार की घटना होना सुनिश्चित ही है। क्या भारी भरकम फीस लेने वाले स्कूल प्रबंधन के पास छुट्टी के दौरान बच्चों को बस में चढ़ने की व्यवस्था देखने के लिए शिक्षकों की व्यवस्था नहीं करनी चाहिए थी?चाहे बोंर्डिग स्कूल हो या डे स्कूल बड़े बच्चे जूनियर बच्चों को तंग करते है, और इसमें गल्ती स्कूल प्रबंधन की ही होती है क्योंकि जहॉ निजी स्कूल पर्याप्त शिक्षकों और कर्मचारियों की नियुक्ति से परहेज कर अपनी आय में कटौती नहीं करने के लिए कृतसंकल्पित रहते हैं। वहीं सरकारी विद्यालय भी या तो स्टाफ की कमी से परेशान होकर या फिर काम टालने की स्थिति में सीनियर छात्रों को छोटे बच्चों अनुशासन रखने की जिम्मेदारी डाल देते हैं। और यह जिम्मेदारी बच्चों को निरकुंश बना देती है फिर मीडिया और फिल्मों में छाई रैंगिग संबंधी घटनाएॅ और चित्रण उनमें भी ऐसा कुछ करने का कौतुहल पैदा करता है।नवोदय विद्यालय जो कि ग्रामीण पृष्ठ भूमि के बच्चों के लिए बेहतरीन शिक्षा देने के लिए जाने जाते है और ये रहवासी विद्यालय हैं मगर इनमें भी इस तरह की घटनाए अक्सर सुनमें में आती है।  अनेक छात्र भी बतलाते हैं कि उन्हे बड़े भैया लोगों के कपड़े साफ करने से लेकर पैर दबाने तक का काम करना पड़ता है, लेकिन भयवश वो अपनी पीड़ा किसी को बतलाने से डरते हैं,कई बार तो सीनियर बच्चों की दहशत से छोटे बच्चों के विद्यालय से भागने की घटनाएॅ सामने आई है। सिंधिया विद्यालय जैसे रहवासी पब्लिक स्कूल जो कि काफी महॅगें होते हैं और इनमें सम्पन्न और रसूखदार घरों के बच्चे पढ़ने आते हैं और   सीनियर सेंकेडरी कक्षाओं तक पहॅुचते एक तो इन बच्चों में अपनी पारिवारिक स्थिति का दंभ आ जाता है दूसरा मीडिया के जरिये कालेजों से आती रैंगिंग संबंधी खबरें उन्हें अपने विद्यालय में यह सब दोहराने प्रोत्साहित करते हैं। जिसका शिकार मासूम बच्चें बनते है।

                प्रश्न यह है कि स्कूलों में लगातार बढ़ रही इस तरह की घटनाओं को रोकने के लिए क्या किया जाएॅ? निश्चित तौर इस विषय पर स्कूल प्रबंधन की जिम्मेदारी तय होनी चाहिए और  प्राचार्य सहित जिम्मेदार शिक्षको,स्कूल प्रबंधकों पर आपराधिक मुकदमा दर्ज होना चाहिए। रहवासी विद्यालयों में छोटे बच्चों के लिए अलग छात्रावास बनाया जाएॅ तथा बच्चों में अनुशासन बनाने की जिम्मेदारी किसी भी स्थिति में छात्रों को नहीं सौपी जानी चाहिए।अगर ऐसा किया जाता है तो स्कूल की मान्यता समाप्त होना चाहिए। शिक्षकों को इस बात की जिमेदारी निर्धारित की जाए कि वो कम से कम सप्ताह में एक बार छात्रों में इस विषय पर चर्चा करें और उनके साथ रैंगिंग संबंधी घटना होने की स्थिति पैदा होने से रोंकें। बाल आयोग एवं शिक्षा विभाग के अधिकारी भी समय समय पर बच्चों के बीच में जाएॅ और समय निकालकर उनके मन की बात सुनें।

                 वास्तव में स्कूली बच्चों में सीनियरों की प्रताड़ना और दहशत गंभीर चिंता का विषय है। इस पर मनन आवश्यक हैं क्योंकि अगर इसे रोका नहीं गया तो यहॉ पर कालेजों से ज्यादा गंभीर स्थिति पैदा हो जाएगी क्योंकि स्कूली बच्चों में सिर्फ कौतुहल होता है और परिणाम की अज्ञानता!

?   डॉ. सुनील शर्मा