संस्करण: 01 नवम्बर-2010  

विज्ञापन और टीआरपी के बोझ

तले दम तोड़ती पत्रकारिता

 ? मोकर्रम खान

           

        कुछ दिनों पूर्व राजनेताओं तथा इलेक्ट्रॉनिक मीडिया एलायंस ने अयोध्या पर आ रहे कोर्ट के फैसले को लेकर देश में तनावपूर्ण वातावरण निर्मित करने के प्रयास किये इसके विरुध्द एक फक्कड़ किस्म के पत्रकार ने एक जबरदस्त लेख लिखा ताकि जनता को इनकी कुटिल चालों के प्रति सतर्क किया जा सके। पत्रकार अपना लेख ले कर एक प्रतिष्ठित दैनिक समाचार पत्र के कार्यालय में पहुंचा जिसमें उसने कई साल तक लेख लिखे थे। अखबार वालों ने उस लेख को बहुत सराहा किंतु छापने में असमर्थता व्यक्त कर दी। उन्होंने बताया कि अभी कल ही हमें विज्ञापन का सवा करोड़ रुपये का चेक राज्य शासन से प्राप्त हुआ है। यह लेख सत्ताधारी दल के विरुध्द है, अगर हमने आपका लेख छाप दिया तो सवा करोड़ तो क्या, सवा रुपये का भी विज्ञापन मिलना मुश्किल हो जायगा। अगर विज्ञापन नहीं ला सके तो मालिक को क्या जवाब देंगे। अब आप ही बताइये निर्भीक पत्रकारिता को महत्व दें या विज्ञापन को। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि उनके समाचार पत्र का सर्कुलेशन पहले से काफी कम हो गया है (कदाचित पत्रकारिता के गिरते स्तर के कारण) किंतु विज्ञापन पर्याप्त मिल रहे हैं इसलिये चिंता की कोई बात नहीं है, मालिक भी खुश हैं।

         कहते हैं पत्रकारिता लोकतंत्र का आधा स्तंभ हैं। प्रेस, राजनीति, शासन, प्रशासन, समाज सभी के ऊपर पहरेदारी करता है। पहले अधिकांश पत्रकार तथा अखबार चलाने वाले फक्कड़ स्वभाव के होते थे। भौतिकवाद उन पर हावी नहीं हो पाता था इसलिये कोई भी राजनेता या उद्योगपति उन्हें प्रभावित नहीं कर पाता था। वे किसी की परवाह नहीं करते थे। बड़े से बड़े सफेदपोश को एक मिनट में बेनकाब कर देते थे। उनसे सभी डरते थे। समाज उन्हें सम्मानपूर्ण दृष्टि से देखता था। उनकी महत्वकांक्षायें तथा आवश्यकतायें कम थी किंतु अब शहरों के फाइव स्टार कल्चर ने प्रेस को भी अपनी चपेट में ले लिया है। आज प्रेस का एक सेक्शन पत्रकारिता के मायने बदलने में लगा हुआ है। अब ईमानदारी, फक्कड़पन तथा निर्भीक पत्रकारिता बीते जमाने की बातें हो रही हैं। कुछ पत्रकार कलम के सिपाही के बजाय भाड़े के कलमकार बन रहे हैं। वे वह नहीं लिखते जो उन्हें एक पत्रकार के नाते लिखना चाहिए, वे वह लिखते हैं जो उन्हें लिखने के लिए कहा जाता है जिसके लिये उन्हें पैसे दिये जाते हैं। यही हाल अखबार मालिकों का है। पहले वे थोड़ी कमाई में ही संतोष कर लेते थे, अब अधिकांश समाचार पत्र मालिक आय बढ़ाने को ही सर्वोच्च प्राथमिकता देते हैं। इसीलिये कई बार संपादक के पद पर ऐसे व्यक्तियों को नियुक्त कर दिया जाता है जिनकी योग्यता तथा अनुभव कम होते हैं किंतु विज्ञापन बटोरने की क्षमता अधिक होती है। 70 के दशक तक प्रिंट मीडिया की मोनोपली थी। सीमित अखबार और सीमित पत्रकार, ज्यादातर ईमानदार तथा निर्भीक। अखबार मालिक भी मूलत: पत्रकार ही होते थे जो न्यूनतम लाभ पर अखबार चलाते थे। उस समय के पत्रकार पूंजीपति नहीं होते थे। 80 के दशक में प्रेस में भ्रष्टाचार ने घुसपैठ की। कुछ पत्रकारों ने नेताओं, उद्योगपतियों, पुलिस अपराधियों तथा काले धंध करने वालों को ब्लैकमेल कर पैसे कमाना शुरू कर दिया। पत्रकारों के ठाठ देख कर अखबार मालिकों ने उक्त वर्गों से सीधो संपर्क कर डायरेक्ट कमाई शुरू कर दी। कुछ मालिकों तथा पत्रकारों ने भ्रष्ट अधिकारियों तथा कर्मचारियों के ट्रांसफर एवं पोस्टिंग तथा बड़े बड़े ठेके दिलाने एवं काले धंध करने वालों को प्रेस का सुरक्षा कवच प्रदान करने का कार्य प्रारंभ कर दिया। इससे उन्हें इतनी मोटी कमाई होने लगी कि अखबार उनका साइड बिजनेस हो गया। उन्होंने पत्रकारिता को सभी धंधों का मल्टी परपज लायसेंस की तरह प्रयोग कर दूसरे बड़े धंध खोल लिये और उद्योगपति बन बैठे। 80 के दशक में ही एक विशाल राज्य के मुख्यमंत्री ने बड़े अखबारों से जुड़े छोटे पत्रकारों के लिये प्रति माह दो ट्रांसफर का कोर्ट फिक्स कर दिया था ताकि वे कम से कम दो लाख रुपये प्रति माह कमा सकें। उस समय एक बहुचर्चित घटना हुई थी। उसी राज्य की राजधानी में लगभग 200 करोड़ की जल योजना बनी। एक प्रतिष्ठित समाचार पत्र के मालिक संपादक ने पाइप सप्लाई तथा लाइन बिछाने का ठेका अपने आदमी को दिलाने के लिये तत्कालीन पीएचई मंत्री पर दबाव डाला। मंत्री ने बगैर प्रक्रिया पूरी किये ठेका देने से इनकार कर दिया। दूसरे दिन उस समाचार पत्र की हेड लाइन थी कि मंत्री ने रिश्वत ले कर ठेका अपात्र कंपनी को दे दिया है। हड़कंप मचा तो मुख्यमंत्री ने मंत्री को तलब किया। मंत्री ने फाइल ला कर दिखा दी कि अभी तो टेंडर कमेटी रिकमंडेशन ही नहीं बनी है, ठेका देना तो बहुत दूर की बात है। आगे चल कर रोज रोज की ब्लैक मेलिंग से तंग आ र कई उद्योगपतियों, बिल्डरों, नेताओं तथा व्यवसाइयों ने स्वयं अपने अखबार निकालने शुरू कर दिये। कई आपराधिक पृष्ठभूमि वालों ने भी यही काम शुरू कर दिया। इसीलिये आज समाचार पत्रों तथा पत्रिकाओं की बाढ़ सी आ गई है।

         1990 के दशक में निजी टी.वी चैनल्स का पदार्पण हुआ जिनमें समाचारों का समय कम था। सामचारों के समय अधिक टीआरपी देख कई बड़े बिजनेस घरानों ने न्यूज चैनल्स डाल दिये। अब इतने चैनल हो गये हैं कि खबरों के लाले पड़ जाते हैं। पैसे कमाने की होड़ में इनमें आपस में ऐसी गलाकाट प्रतिस्पर्धा चल रही है जैसे पहले दिल्ली में रेड लाइन बसों में चलती थी। एंटरटेनमेंट चैनल अश्लीलता दिखा कर पैसे कमा रहे हैं। बीच बीच में सरकार उन्हें चेतावनी भी देती रहती हैं। न्यूज चैनल अश्लीलता तथा हिंसा को समाचार के रूप में दिखाते हैं इससे सरकार भी उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाती। कमाई के चक्कर में इन चैनल्स ने पत्रकारिता की जबरदस्त दुर्गति की है। देश में जगह-जगह अन्याय और अत्याचार हो रहे हैं किंतु ये उन पर ध्यान नहीं देते हैं। राहुल महाजन की मौजमस्ती, तथाकथित स्वयंवर शादी, फिर नई पत्नी, जिसका सीरियल नंबर जनता को नहीं मालूम है, से मारपीट, फिर समझौता, इस सारे घटनाक्रम का सिलसिलेवार निरंतर प्रसारण इन चैनल्स की प्राथमिकता है, जबकि राहुल महाजन की हैसियत एक ऐसे बिगड़ैल बेटे से अधिक कुछ नहीं है जो पिता की संपत्ति पर ऐश कर रहा है। पिछले दिनों तो इन चैनल्स ने ह ही कर दी। अयोध्या प्रकरण पर कोर्ट का फैसला आने पर पूरे देश में एक मच्छर तक नहीं भनभनाया किंतु ये चैनल फैसला आने के पंद्रह दिन पहले से यही दिखाते रहे कि पूरा देश एक टाइम ब पर बैठा है जो फैसला आते ही फट पड़ेगा और हाहाकार मच जायगा। भारत की धर्म निरपेक्ष्ज्ञ जनता ने इनकी चालों को नाकाम कर दिया फिर भी बेशर्मी की हद देखिये, ये दस दिनों तक यह दिखाते रहे कि इस फैसले से भारत का मुसलमान निराश है और हिंदू असंतुष्ट। पता नहीं किस मुसलमान ने इन्हें एप्लीकेशन दे कर फरियाद की या किस हिंदू ने इनसे संतोष प्राप्ति के लिये संपर्क किया। धन्य हैं इस देश के हिंदू और मुसलमान जिन्होंने इनके षडयंत्र को नाकाम कर आपसी सद्भाव कायम रखा। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की चकाचौध से प्रेरित हो कर प्रिंट मीडिया ने भी तेज कमाई का मार्ग अपना लिया है। अब बहुत से घपलों और घटनाओं के समाचार या तो छापते ही नहीं या छापा भी तो पार्टी को सेफ साइड करते हुये अंदर के पन्नों पर। जो समाचार पत्र कभी अश्लीलता के विरुध्द जिहाद छेड़ते थे, वही आज कमाई के लिये कामोत्तेजक दवाओं तथा लिंगवर्धाक यंत्र के सचित्र विज्ञापन धाड़ल्ले से छाप रहे हैं जिनका कुप्रभाव मासूम बच्चों तथा टीनएजर्स पर पड़ रहा है। लोकतंत्र के चौथे स्तंभ तथा समाज के सतत प्रहरी की यह दयनीय स्थिति शर्मनाक भी है और खतरनाक भी।


? मोकर्रम खान