संस्करण: 1 जुलाई -2013

मप्र को खोखला करती शिव सरकार

? महेश बाग़ी

                  हते हैं कि जब दो देशों की सेनाएं युध्द मैदान में होती हैं और एक सेना को अपनी पराजय महसूस होती है तो वह धीरे-धीरे पीछे हटने लगती है। ऐसा करते समय वह अब अपने साथ लाई गई रसद सामग्री नष्ट कर देती है और कुएं, बावड़ी, तालाब आदि जलस्रोतों में बम फेंक देती है। ऐसा इसलिए किया जाता है ताकि शत्रु सेना इन संसाधनों का इस्तेमाल न कर सके। मध्यप्रदेश मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान भी यही कर रहे हैं। संभवत: उन्हें यह अहसास हो गया है कि अब सत्ता में वापसी संभव नहीं है। इसलिए वह लोक-लुभावन योजनाओं के नाम पर कर्ज का बोझ बढ़ाते जा रहे हैं। हालिया संपन्न मजदूर पंचायत में उन्होंने घोषणा कर डाली कि मजदूरों को 50 फीसदी रियायत पर कर्ज दिया जाएगा। अर्थात कर्ज ली हुई राशि का आधा भाग ही लौटाना पडेग़ा। इस घोषणा से मजदूरों और भाजपा को कोई फायदा हो या न हो परंतु प्रदेश पर कर्ज का भार और बढ़ जाएगा।

                गौरतलब है कि शिवराज सरकार की तथाकथित लोक-लुभावन योजनाओं के चलते सरकारी खजाना तो कभी का खाली हो चुका है और सरकार पर 98 हजार करोड़ से अधिक का कर्ज हो चुका है। ऐसी स्थिति में 50 फीसदी रियायत पर कर्ज देना इस प्रदेश को और गर्त में धकेलने की दिशा में ही एक और कदम है। चुनावी साल में मतदाताओं को रिझाने के लिए यह सरकार मुख्यमंत्री तीर्थदर्शन योजना भी लागू कर चुकी है। जिसमें वरिष्ठ नागरिकों को तीर्थ यात्रा पर ले जाया जा रहा है। इसमें मंदिर, मठों के साथ ही दरगाह, मजारों पर जियारत की व्यवस्था भी की गई है। सरकार की इस योजना को अल्पसंख्यक समुदाय ने कितनी गंभीरता से लिया है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों ऐसी ही एक यात्रा के लिए यात्री ही नहीं जुट पाए।

                 शिवराज सरकार की ऐसी ही एक और योजना है-मुख्यमंत्री कन्यादान योजना। इसके तहत गरीब परिवार के विवाहितों को गैस सिलेंडर और टीवी सेट मुफ्त में दिया जाता है। ये चीजें मुफ्त पाने के फेर में शादीशुदा लोग दोबारा शादी का स्वांग रचते हैं और सरकारी योजनाओं को पलीता लगाते हैं। ऐसे कई उदाहरण सामने आने के बावजूद यह योजना अब भी जारी है। किसी गरीब का घर बसे और उसे चूल्हे के साथ मनोरंजन का साधन भी नसीब हो जाए, तो इसमें कोई बुराई नहीं है, लेकिन इसमें फर्जीवाड़ा न हो इसकी जिम्मेदारी प्रशासन की है और वह यह जिम्मेदारी निभाने में नाकाम रहा है। ऐसे अधिकारियों पर दंडात्मक कार्रवाई क्यों नहीं की गई? क्या यह सरकार का नाकारापन नहीं है?

                 लोकतांत्रिक पध्दति से चुनी गई सरकार का यह दायित्व होता है कि वह प्रदेश का विकास करे, नए उद्योग लगाए और उद्योगों को प्रोत्साहन दे। सड़क, पानी, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं का विस्तार करे और रोजगार के नए अवसर उपलब्ध कराए। दुर्भाग्य से शिवराज सरकार ऐसा कोई कदम नहीं उठा सकी। उद्योगों के नाम पर इस सरकार ने इन्वेस्टर्स मीट की खूब नौटंकियां की, जिन पर पानी की तरह पैसा बहाया गया। सरकार ने जितने उद्योग लगाने का दावा किया था, उनमें से 25 फीसदी भी धरातल पर नहीं उतर सके। इसके विपरीत प्रदेश के तीन औद्योगिक क्षेत्रों-मंडीदीप, पीथमपुर और  मालनपुर में डेढ़ हजार से यादा औद्योगिक इकाइयों में ताले लग गए हैं। सरकार उन्हें मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने में नाकाम साबित हुई है। जिससे हजारों हाथों से काम छिन गया। अपने चुनावी घोषणा पत्र में हर साल 50 हजार लोगों को नौकरी देने का वादा करने वाली शिवराज सरकार अपने इस वादे को तो पूरा नहीं कर पाई उल्टे हजारों लोगों को बेरोजगार कर दिया।

                   इसी नाकारा सरकार के 'खेवनहार' शिवराज सिंह चौहान की जुबान फिसलने के कारण सरकारी खजाने को साढे बारह करोड़ की चपत लग गई है। दरअसल, ओंकारेश्वर बांध प्रभावितों के परिवारों को ढाई लाख रुपए का पैकेज दिया जाना था, जिसमें से लगभग 50 हजार रुपए का भुगतान किया जा चुका है और दो लाख रुपए दिए जाने शेष थे। लेकिन मुख्यमंत्री ने एक कार्यक्रम में ढाई लाख रुपए के पैकेज की घोषणा कर डाली, बाद में वरिष्ठ अधिकारियों उन्हें बताया कि डूब प्रभावितों को दो लाख ही देने थे और आपने ढाई लाख की घोषणा कर दी। इस पर शिवराज ने कहा कि घोषणा की है तो उसे पूरा करना ही होगा। अब एनएचडीसी के अधिकारी नया पैकेज बनाने में जुटे हुए हैं।

                    इसी सरकार के नाकारापन को नियंत्रण एवं महालेखा परीक्षक (कैग) की ऑडिट  रिपोर्ट में भी उजागर किया गया है। रिपोर्ट के अनुसार बीते चार साल में प्रदेश में खनिज राजस्व में 2600 करोड़ की चपत लगाई गई है। खनिज विभाग इसकी वसूली में नाकाम रहा। खास बात यह है कि कैग ने इस संबंध में सरकार और खनिज सचिव से कुछ सवाल पूछे थे जिनका जवाब भी नहीं दिया गया। गले-गले तक कर्ज में डूबे प्रदेश को इतनी बड़ी चपत लगने से स्पष्ट है कि सरकार खनिज माफियाओं का हित संरक्षण कर रही है। हाल ही में मुख्यमंत्री के निर्वाचन क्षेत्र में कांग्रेस नेताओं ने अवैध रेत खनन करते 140 ट्रक और डंपर जप्त करवाए हैं। इनमें से कुछ पर कमल के फूल बने हुए थे, कहने की जरूरत नहीं कि भाजपा के लोग अवैध खनन कर सरकार को चपत लगा रहे हैं और सरकार मूकदर्शक बनी हुई है। शिवराज सरकार ने अपने चहेते उद्योग समूहों को बैंक गारंटी भी दे रखी है। यह समूह कर्ज की किस्त नहीं चुका रहे हैं और सरकार को पेनाल्टी भरना पड़ रही है। इससे प्रदेश को 40 करोड़ की चपत लग चुकी है। ऐसे एक नहीं अनेकानेक उदाहरण हैं जिनसे साफ होता है कि शिवराज सरकार प्रदेश को बर्बाद करने पर तुली हुई है और दावा स्वर्णिम मध्यप्रदेश का किया जा रहा है। क्या ऐसी सरकार को, जो कि प्रदेश का बंटाढार कर चुकी है, फिर से सत्ता में लाना प्रदेश के हित में होगा?

? महेश बाग़ी