संस्करण: 1 जुलाई -2013

राजनीति करने के चक्कर में

भूल गये लोग शालीनता और प्रेम की वाणी

?  राजेन्द्र जोशी

               'वाणी' एक तरह से व्यक्ति का चारित्रिक प्रमाण है। वह जैसा बोलेगा समाज के सामने उसका वैसा चरित्र उजागर होगा। व्यक्ति यदि मृदुभाषी है प्रेम, सौहार्द और शालीनता की भाषा बोलता है तो सहज ही वह सबका दिल जीत लेता है। यदि उसकी  वाणी में कटुता, छल-कपट, वैमनस्यता या राग द्वेष है तो स्वाभाविक तौर पर लोग उसे पसंद नहीं करते हैं। ऐसे लोग कटुवाणी और छल-कपट की भाषा बोलकर स्वयं यह मान बैठते हैं कि वह अपने प्रतिद्वंद्वी पर आक्रमण कर रहे हैं और उसे परास्त करके ही पीछा छोड़ेंगे ! ऐसे लोगों का दंभ केवल उन्हीं तक सीमित रह पाता है किंतु समाज उनकी विष वाणी का जरा भी स्वागत नहीं करता है।

                  वर्तमान दौर राजनीति का है और इन दिनों जितने बोल प्रचारित होते हैं, वे सब राजनैतिक क्षेत्र के लोगों के मुख से ही निकले होते हैं। प्रिंट मीडिया हो या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सुबह से शाम तक अखबारों और समाचार चैनलों में राजनीति के क्षेत्र के लोगों के मुख से ऐसी ऐसी वाणी सुनने और पढ़ने में आती है कि हैरत होने लगती है। देश में राजनीति और राजनैतिक लोग इतने ज्यादा हावी हो गये हैं कि सब तरह वे ही दिखाई दे रहे हैं। वह दौर अब गुजर चुका जब गांवों और नगरों में कथावाचकों, संतों, विद्वानों और चिंतकों की ऐसी ऐसी वाणी सुनने को मिलती थी जिनमें उपदेश होता था। समाज के लोग संतों, विद्वानों की मधुरवाणी सुन सुनकर अपने जीवन को धन्य मानते थे। न तो अब उस तरह का माहौल रहा और न ही उस तरह के लोग जिनके मुख से सदैव ऐसे शब्द निकलते थे जैसे फूल झड़ रहे हों।

               बस्तियों में कथा-भागवत-रामायण और महाभारत के विद्वानों के श्रृंखलाबध्द आयोजन होते थे। 'सप्ताह' नाम के इन आयोजनों में गांव भर के लोग बड़े ही भक्तिभाव से अपनी उपस्थिति दर्ज कराते थे। अब कुछ इस तरह का बदलाव आ गया है कि गांवों का भी माहौल बदल गया है। आपस में गांव के लोग परस्पर मेल मुलाकात भी करते थे तो सदैव शालीनता और मधुरता की भाषा बोला करते थे। इसका कारण यह भी था कि लोग ज्यादा समय धर्म-कर्म में लगाते थे और महान संतों, विद्वानों के प्रवचनों का उनके व्यक्तिगत जीवन पर अच्छा खासा, प्रभाव पड़ता था। उन दिनों राजनीति के क्षेत्र का इतना बड़ा दायरा भी नहीं हुआ करता था। यदि था भी तो उससे उस तरह के लोग जुड़ते थे जो समाजसेवी, भद्र, शालीन और मीठी वाणी बोलने वाले होते थे। इस दृष्टि से उस दौर में समाज के सामने ऐसे कटु और अपशब्दों का उपयोग नहीं हुआ करता था जितना आज के दौर में राजनीति में हो रहा है।

                हमारे देश में प्रजातांत्रिक सिस्टम अस्तित्व में है। देश की आजादी के बाद कांग्रेस पार्टी को केंद्रीय सत्ता का उत्तरदायित्व मिला और उसने देश के विकास में अनेक योजनाएें लागू की और सामाजिक और आर्थिक दृष्टि से देश की मजबूती को प्राथमिकता दी। प्रजातांत्रिक व्यवस्था में पक्ष और प्रतिपक्ष दोनों की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस दृष्टि से संसद और विधान मंडलों में इन दोनों पक्षों के अस्तित्व को नकारा नहीं जा सकता। किंतु सत्ताओं पर काबिज होने सकी लालच ने राजनीति को एक अलग ढंग से परिभाषित कर दिया है। आजादी के बाद से जिस दल के कंधों पर सत्ता का उत्तरदायित्व मिला उसके प्रति अन्य राजनैतिक दलों का नज़रिया सदैव से ही विरोधात्मक रहा आया है। आजादी के बाद अनेक ऐसे राजनैतिक दलों का गठन हुआ जिनका उद्देश्य मात्र सत्ता को हड़पना ही रहा। केन्द्र और राज्य स्तर में अनेक क्षेत्रीय दलों के नाम गिनाये जा सकते हैं। इन दलों की राजनीति में कई तरह की विचारधाराओं के लोग शामिल होने चले। दलों के गठन में कई दलों ने तो इस ओर धयान ही नहीं दिया कि उसमें जो लोग शामिल हो रहे हैं उनके आचरण क्या है, उनके बोलचाल का ढंग क्या है और उनमें समाजसेवा की ललक और समर्पण भी है कि नहीं ! स्वाभाविक हैं जब इस स्तर के लोगों को मंच मिल जाता है तो उनकी भाषा तो बदल नहीं सकती।

                 सत्ता पर काबिज होने के जुनून में विपक्ष की राजनीति करने वाले कतिपय दलों के लोग इतने ज्यादा उच्छृंखल हो गये हैं कि वे जब बोलने के लिए खड़े होते हैं तो पता नहीं कहां कहां के शब्दों के वे उच्चारण करते हैं। आरोप-प्रत्यारोप भी शालीन भाषा में लगाये जा सकते हैं किंतु कतिपय नेताओं की वाणी से निकले हुए कटु शब्द ऐसे लगते हैं जैसे उनके मुंह से फूल नहीं कांटे झड़ रहे हो। एक अलग तरह की शब्दावली हो गई है प्रतिपक्ष के नेताओं की। यह शब्दावली कुछ ऐसी होती है जिसमें न तो किसी की मान-मर्यादा या लिहाज का ध्यान होता है और न राजनैतिक शुचिता का। ऐसे नेताओं की जुबान से निकले मर्यादाविहीन शब्दों की जब छिछालेदार होने लगती है तो अपने बोले हुए शब्दों को वापिस लेने में भी शर्म नहीं खाते हैं। शालीनता, मर्यादा, मान-सम्मान और प्रेम की भाषा राजनीति के क्षेत्र से निष्कासित हो चुकी है। अब तो वहीं नेता महान माना जाने लगा है जिसकी वाणी में कर्कशता हो छल-छदम् और राग द्वेष हो।

   
? राजेन्द्र जोशी