संस्करण: 1 जुलाई -2013

उत्तराखंड की विनाशलीला

शिव की जटा से न खेलें

? उपेन्द्र प्रसाद

                पौराणिक कथाओं के अनुसार राजा भगीरथ की तपस्या के बाद गंगा धरती पर आई है। भगीरथ की तपस्या के बाद जब गंगा स्वर्ग से धरती पर आने के लिए तैयार हुई तो एक बड़ा सवाल यह खड़ा हो गया कि वह यदि धरती पर उतरी तो अपने वेग के कारण वह सबकुछ तबाह कर देगी। उस समस्या का हल निकाला गया। हल यह था कि गंगा सीधे धरती पर नहीं आएगी, बल्कि वह शिव की जटा पर गिरेगी और फिर वहां से वह धरती पर जाएगी।

                गंगा के धरती पर आने की इस पौराणिक कहानी का क्या अर्थ है, यह केदारघाटी व उत्तराखंड के अन्य इलाकों में हुई भारी तबाही के बाद आसानी से समझा जा सकता है। हिमालय की अनेक धाराएं मिलकर गंगा बनती हैं। एक धारा का नाम है मंदाकिनी, जो केदार घाटी से होकर बहती है। इसका उद्गम स्थल केदार पहाड़ी का वह ऊचा शिखर है, जहां सालों भी बर्फ रहता है। मंदाकिनी में पानी का आखिरी स्रोत तो वर्षा ही है, जो स्वर्ग यानी आसमान से होती है।

             केदार पर्वत की चोटी पर बादल फटे। फटे हुए बादलों से गंगा धरती पर आई, लेकिन वहां शिव की जटा नहीं थी। शिव की जटा नहीं होने के कारण गंगा फटे बादलों से सीधे धरती पर गिरी और प्रलय आ गया। मंदाकिनी ने अपनी धारा ही बदल ली और बदली हुई धारा ने केदार की घाटी में तबाही मचा दी। केदारनाथ धाम को मटियामेट कर दिया। सिर्फ वह प्राचीन मंदिर शिव लिंग के साथ सुरक्षित बचा।

                 आखिर शिव की जटाओं का हुआ क्या? शिव की जटा वस्तुत: हिमालय पर्वत के वे पेड़ पौधो हैं जो बरसात के समय पानी के वेग को रोकती है और धारा को कमजोर करती है। अनेक धाराओं से निकलने वाली गंगा की प्रबल धारा को हिमालय के वे पेड़ पौधो धीमा करते हैं और उसकी प्रलय शक्ति पर नियंत्रित हो जाता है। सच कहा जाय तो हिमालय की चोटियां की षिव हैं और उन पर उगे पेड़ शिव की जटाएं। गंगा से जुड़ी इस पौराणश्निाक कहानी का निहितार्थ भी यही है।

                  पर शिव और गंगा में आस्था रखने वाले हम भारतीयों ने उस पौराणिक कहानी के निहितार्थ की उपेक्षा कर दी है। विकास के नाम पर हिमालय के पेड़ पौधों को हटाया जा रहा है। चटानों को भी अपनी मूल जगह से हटाया जा रहा है। विस्फोटको से उन्हें उड़ाया जा रहा है, ताकि पहाड़ के कुछ टुकड़ों के समतल बनाकर हम भव्य मकान बना सकें। हमने अनेक भव्य मकान वहां बना भी दिए हैं। उनमें से कुछ भव्य मकानों को हमने अभी गंगा के क्रोधा का शिकार होते देखा भी है। एक कमजोर कच्ची पहाड़ी पर पक्के मकान बनाकर हम उसमें रहना चाहते हैं, लेकिन हम भूल जाते हैं कि वैसा करके हम हिमालय के उस स्वरूप का विनाश कर रहे हैं, जो स्वरूप बादल फटने के बाद स्वर्ग से नीचे उतरी गंगा को लपककर पकड़ लेता है और उसे शांत कर धरती पर लाता है। शिव की उन जटाओं के साथ हम लगातार खिलवाड़ कर रहे हैं। और यदि हम ऐसा करते हैं, तो फिर हम गंगा के क्रोध का ही नहीं, बल्कि शिव के रौद्र रूप का सामना करने के लिए भी तैयार रहें।

               पर्यावरणवादी पिछले कई दशकों से चीख चीख कर कह रहे हैं कि हिमालय पर हो रहे कथित विकास के काम को रोका जाय, क्योंकि विकास की खाल में वहां विनाश की भूमिका तैयार की जा रही है। अभी पिछले दिनों जो घटित हुआ, वह तो ट्रेलर मात्र है। यदि हमने हिमालय की पारिस्थितिकी( इकालॉजी) को बिगाड़ने का काम जारी रखा यानी शिव की जटा के साथ खिलवाड़ जारी रखा, तो आने वाले दिनों में इससे भी ज्यादा भयंकर तस्वीर देखने को मिल सकती है। हमारा पूरा देश अपने अस्तित्व के लिए हिमालय पर निर्भर है। इसके कारण देश भर में तो वर्षा होती ही है, इससे निकली नदियां उत्तरी भारत को सिंचित भी करती हैं। जीवन का अमृत भारत को हिमालय से ही मिलता है, लेकिन हम हैं, जो उस अमृत को विश बनाने में लगे हुए हैं। हमारे लिए जो प्रकृति का वरदान है, उसके साथ छेड़छाड़ कर हम उसे ही अपना अभिशाप बनाने पर तुले हुए हैं।

               विकास के लिए वहां के पेड़ों को तो काटा ही जा रहा है, चटानों को भी विस्फोटकों से तोड़ा जा रहा है। सैकड़ों परियोजनाएं वहां चलाई जा रही हैं और सैकड़ा अभी पाइपलाइन में है। जबर्दस्त निर्माण कार्य वहां चल रहे हैं और उसके लिए जहां तहां जमीन को समतल करने के लिए विस्फोटको का इस्तेमाल किया जाता है। यदि पिछले 50 साल में वहां इस्तेमाल किए गए विस्फोटकों की मात्रा का पता किया जाय, तो यह हजारों क्या लाखों टन में पहुंच गया होगा। हम हिमालय की छाती को विस्फोटकों से उड़ा रहे हैं और उसे उसका विकास कह रहे हैं। हम क्षेत्र के विकास और पर्यटन को बढ़ावा देने के नाम पर सबकुछ कर रहे हैं।

                 हिमालय में दर्जनों तीर्थस्थल हैं। हजारों साल से वहां धार्मिक आस्था के कारण लोग जाते रहे हैं। पर वहां की यात्रा करने के पहले लोग यह मान लेते थे कि षायद लौट कर वापस नहीं आएं, क्योंकि रास्ते बहुत दुर्गम थे। अब हम उन तीर्थस्थलों की राह को सुगम बना रहे हैं। और इधर आस्था का स्थान उपभोक्तावाद ने ले लिया है। वर्तमान उपभोक्तावाद आस्था और तीर्थाटन को भी उपभोग की चीज बना रहा है और हम उस प्रकार के उपभोक्तावाद को बढ़ावा दे रहे हैं। हिमालय जितने लोगों को संभालने की क्षमता रखता है, उससे कई गुना ज्यादा लोगों को वहां रहने का इंतजाम कर रहे हैं। उपभोक्तावाद का कचरा वहां फैल रहा है, जिसके कारण पहाड़ों द्वारा जल को सोखने की क्षमता कम हो रही है। निर्माण कार्य अपने आपमें पहाड़ों के जल सोखने की षक्ति को कम कर ही रहे हैं, निर्माण कार्य के मलबे भी वहां के पर्यावरण को तबाह कर रहे हैं।

               विकास के नाम पर हम वहां वह सबकुछ कर रहे हैं, जिनसे हमारा अंत में विनाश ही होना है। भारत की यह सभ्यता हिमालय की देन है। हिमालय से खिलवाड़ कर हम अपनी सभ्यता से ही खेल रहे हैं। शिव और शिव की जटाओं का पौराणिक प्रतीक कोई हवा में पैदा नहीं हुआ है, बल्कि वह हमारी धरती से निकली है। लेकिन हम गंगा के धरती पर आने के पहले शिव की जटा में समाने की पौराणिक कथा को महज कथा मानते हैं या अंधविश्वास। और जो इनमें आस्था रखते हैं, वे भी इसके निहितार्थ को समझने से इनकार कर देते हैं। अभी भी हमारे पास समय है। हमें हिमालय से संबंधित अपनी नीति बनानी पड़ेगी और यह निर्णय करना पड़ेगा कि हम झणिक विकास चाहते हैं या अंतिम विनाश। यदि हम हिमालय के पेड़ पौधों और पहाड़ियों के साथ खेलते रहे तो हमारा विनाश अवश्यंभावी है। बेहतर होगा कि हम ऐसा न करें और शिव की जटा से खेलना बंद करें।

? उपेन्द्र प्रसाद