संस्करण: 1 जुलाई -2013

मोदी उत्तराखंड पीड़ितों की खातिर नहीं

अपनी इमेज बनाने के लिए गए थे

? एल.एस.हरदेनिया

               पिछले कुछ दिनों से गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठतम नेता लालकृष्ण आडवानी फिर सुर्खियों में हैं। नरेन्द्र मोदी उनकी उत्तराखंड यात्रा के कारण और उनके द्वारा अभी हाल में दिए गए बयानों के कारण समाचारों में छाए रहे और आडवाणी, कश्मीर से धारा 370 को हटाने की अपनी मांग को लेकर समाचारों में रहे।

                जहां तक नरेन्द्र मोदी की उत्तराखंड यात्रा का सवाल है, उसके बारे में अनेक लोगों ने आपत्तियां उठाई हैं, यद्यपि भाजपा ने उनकी यात्रा को उचित बताया है। इस संबंध में स्वयं नरेन्द्र मोदी से एक सवाल पूछा जा सकता है; वह यह कि 2002 में जब गुजरात में मुसलमानों का सामूहिक हत्याकांड किया गया था, उस समय यदि पीड़ितों की खोजखबर लेने किसी और राज्य का मुख्यमंत्री जाता तो उन्हें कैसा लगता। जहां तक उत्तराखंड की उनकी यात्रा का सवाल है, आपत्ति केवल यात्रा को लेकर नहीं है वरन् उस यात्रा के पहले और उसके बाद जो कुछ कहा गया, वह भी आपत्तिजनक है। जैसे, मीडिया में यह प्रचारित किया गया कि मोदी के प्रयासों से दो दिन में गुजरात के 15 हजार तीर्थयात्रियों को बचा लिया गया है। दो दिन में इतने तीर्थयात्रियों को बचा लेने का दावा पूरी तरह अविश्वसनीय है। इसके अतिरिक्त उनकी यात्रा के बारे में कुछ और आपत्तियों का जिक्र किया गया है। प्रसिध्द पत्रकार करन थापर ने हिन्दुस्तान टाइम्स में अपने साप्ताहिक कालम में अनेक आपत्तियों का जिक्र किया है। उन्होंने सर्वप्रथम तो यह सवाल किया है कि क्या मोदी ने उत्तराखंड जाने के पूर्व, वहां के मुख्यमंत्री को सूचित किया था? क्या मोदी ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री से वहां आने की इजाजत ली थी? कोई भी व्ही.आई.पी. जब किसी जगह जाता है तो वह न सिर्फ संबंधित क्षेत्र के प्रशासन को इसकी जानकारी देता है वरन् वह भी जानना चाहता है कि उसकी यात्रा से प्रशासन को कोई असुविधा तो नहीं होगी। इस बात के कोई सबूत नहीं है कि मोदी ने प्रोटोकोल की इस अपेक्षा का पालन किया था। करन थापर ने जानना चाहा है कि नरेन्द्र मोदी की यात्रा का असली उद्देश्य क्या था। क्या वे पीड़ितों की पीड़ा कम करना चाहते थे? मुझे नहीं लगता कि यह उनका एकमात्र उद्देश्य था। मुझे यह संदेह है कि उत्तराखंड में फंसे लोगों की त्रासदी का लाभ उठाकर वे स्वयं की इमेज बनाना चाहते थे। वे दुनिया और देश को दिखाना चाहते थे कि वे एक ऐसे नेता हैं जो पीड़ितों की, चाहे वे कहीं भी हों, खबर लेते हैं। परन्तु मोदी से मैं भी जानना चाहूंगा कि मोदी ने 2002 के दंगा पीड़ितों की अभी तक खबर क्यों नहीं ली है।

                  नरेन्द्र मोदी ने उत्तराखंड की त्रासदी की चर्चा करते हुए एक ऐसी घोषणा कर दी जिसकी आलोचना उनके विरोधियों ने तो की ही स्वयं उनकी ही पार्टी के नेताओं ने भी की। मोदी ने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री को संबोधित करते हुए यह कह डाला कि केदारनाथ के मंदिर के पुन:निर्माण की जिम्मेदारी वे लेने को तैयार हैं। जब मोदी की इस घोषणा के बारे में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि इस समय सबसे ज्यादा प्राथमिकता का काम है वहां फंसे लोगों को मुसीबत से छुटकारा दिलाना। मंदिर की बात अभी करना अप्रसांगिक है। इसी तरह की बात मध्यप्रदेश के प्रभारी और भाजपा के वरिष्ठ नेता अनंत कुमार ने भी कही है। यहां नरेन्द्र मोदी से यह पूछना उचित होगा कि क्या वे मंदिर का निर्माण सरकारी कोष से करेंगे और यदि वे ऐसा करने वाले हैं तो वह हमारे धर्मनिरपेक्ष संविधान के प्रावधानों के विपरीत होगा। नरेन्द्र मोदी की खातिर मैं, यहां उनके ही राज्य में स्थित सोमनाथ मंदिर से संबध्द एक घटना का उल्लेख करना चाहूंगा। आजादी मिलने के बाद सरदार पटेल ने पंडित जवाहरलाल नेहरू से मिलकर यह इच्छा प्रगट की कि सोमनाथ मंदिर का जीर्णोद्वार किया जाए। नेहरू जी ने कहा अवश्य किया जाए परन्तु सरकारी पैसे से नहीं। नेहरू जी ने सुझाव दिया कि पटेल इस कार्य के लिए एक ट्रस्ट बनायें और फिर उसके माधयम से सोमनाथ के मंदिर का निर्माण करें। बाद में नेहरू जी के सुझाव के अनुसार ही काम हुआ। मोदी को भी केदारनाथ मंदिर के बारे में कोई निर्णय लेने के पूर्व, सोमनाथ मंदिर से संबंधित निर्णय को ध्यान में रखना चाहिए।

                यह देखा गया है कि जब भी चुनाव पास आते हैं भाजपा की तरफ से एक विशेष राग का गायन प्रारंभ हो जाता है। उस राग के तीन मुख्य स्वर हैं (1) भव्य राम मंदिर का निर्माण (2) समान नागरिक संहिता (3) कश्मीर से 370 धारा का हटाया जाना। इस त्रिस्वरी राग में से एक का गायन लालकृष्ण आडवाणी ने अभी हाल में किया है। आडवाणी ने फिर मांग की है कि कश्मीर से धारा 370 हटा ली जाए। इस संबंध में उन्होंने जनसंघ के पहले अध्यक्ष और उसके पहले हिन्दू महासभा के वरिष्ठ नेता डा. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के बलिदान का उल्लेख किया। यहां यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि डा. श्यामाप्रसाद मुखर्जी की कश्मीर के जेल में मृत्यु हुई थी। डा. मुखर्जी वहां धारा 370 के विरूध्द आंदोलन करने गए हुए थे। जेल में ही उनकी मृत्यु हो गई। उस समय जनसंघ की ओर से यह आरोप लगाया गया था कि डा. मुखर्जी की हत्या की गई है। परन्तु आश्चर्य की बात है कि डा. मुखर्जी की मृत्यु के बाद दो बार जनसंघ सत्ता में आया। पहले मोरारजी भाई की मंत्रिपरिषद में जनसंघ के सदस्य मंत्री बनें। बाद में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में बनी सरकार में भी जनसंघ के नए अवतार भारतीय जनता पार्टी का शासन रहा। दोनों समय यदि वाजपेयी या आडवाणी चाहते तो डा. मुखर्जी की हत्या के कारणों को जानने के लिए उच्च स्तरीय जांच की जा सकती थी। परन्तु ऐसा नहीं किया गया। दिनांक 23 जून को डॉ. मुखर्जी की याद में आयोजित एक सभा में बोलते हुए आडवाणी ने डॉ. मुखर्जी की मृत्यु को रहस्यपूर्ण बताया परन्तु न तो आडवाणी व ना ही भाजपा का कोई और नेता, मृत्यु के कारणों की जांच की मांग नहीं करता है।

             इस तरह, यदि धारा 370 कश्मीर के लिए इतनी हानिकारक है तो मोरारजी के शासन में और बाद में अटल बिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल में धारा 370 क्यों नहीं हटाई गई। इसी तरह,  समान नगारिक संहिता बनाने की दिशा में क्यों कोई सार्थक कदम नहीं उठाये गए? राम मंदिर के निर्माण के लिए क्यों गंभीर पहल नहीं की गई? स्पष्ट है ये तीनों नारे जनता को आकृष्ट करने के लिए दिये जाते हैं। एक बार उनके भरोसे चुनाव जीतने के बाद, उन नारों को भुला दिया जाता है। आखिर भाजपा धारा 370 हटाने की हिम्मत कैसे करती? क्योंकि धारा 370 के समर्थक फारूक अब्दुल्ला भाजपा के सहयोगी थे और वाजपेयी मंत्रिपरिषद के सदस्य भी थे। विश्व हिन्दू परिषद के नेता बार-बार मांग करते हैं कि केन्द्रीय सरकार राम मंदिर के निर्माण में जो कानूनी बाधाएं हैं, उन्हें दूर करे। आश्चर्य की बात है कि सिंहल ने वाजपेयी और आडवाणी से उन बाधाओं को क्यों नहीं दूर करवाया। कहावत है कि हाथी के खाने के और, दिखाने के और होते हैं। भाजपा और संघ परिवार पर यह कहावत अक्षरश: लागू होती है। सत्ता में आने के बाद आडवाणी ने यह दावा किया था कि राम मंदिर आंदोलन के कारण उन्हें केन्द्र में राज करने का अवसर मिला है। सत्ता में आने के बाद राम को भी भुला दिया गया। क्या भगवान राम, आडवाणी और भाजपा द्वारा की गई इस वायदा खिलाफी के लिए उन्हें माफ करेंगे? शायद नहीं।

? एल.एस.हरदेनिया