संस्करण: 1 जुलाई -2013

उत्तराखंड तबाही

अपनों को भी पसंद नहीं आया

मोदी की मदद का तमाशा  

? विवेकानंद

               हरहाल मोदी ने ऐसा क्यों किया इसके पीछे उनकी मनोवृत्ति स्पष्ट है। अहंकार जब हद से गुजर जाता है, तब अहंकारी व्यक्ति खुद ही अपयश के रास्ता अख्तियार कर लेता है। गुजरात में तीन बार सरकार बना लेने से मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी का अहंकार इतना विशाल हो गया है कि उन्हें अपने सामने हर व्यक्ति छोटा दिखता है। चंद लोगों के जयजयकार करने से न जाने मोदी के मन में यह भाव कहां से उत्पन्न हो गया कि वे जो कहेंगे, उसे सर्वसम्मति प्राप्त होगी और उसे ही सही मान लिया जाएगा। ऐसे ही अहंकारजनित द्वोषों के चलते देश का प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब बुन रहे गुजरात के मुख्यमंत्री ने आखिर खुद ही साबित कर दिया कि वे अभी इसके लिए उपयुक्त व्यक्ति नहीं हैं। हो सकता है कि वे बहुत अच्छे प्रशासक हों, लेकिन देश चलाने के लिए जिस संयम, सादगी और खुले दिल-ओ-दिमाग की जरूरत होती है, वह मोदी के पास नहीं है। शिवसेना नेता उध्दव ठाकरे और बीजेपी में वापस लौटीं उमा भारती यहां तक कि मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री के बयानों से असहमत होने की कोई गुंजाईश नहीं दिखती कि पहले देश फिर क्षेत्रीयता। उध्दव ठाकरे ने शिवसेना के मुखपत्र सामना में लिखा कि मोदी उत्तराखंड की मदद को लेकर संकीर्ण मानसिकता का परिचय दे रहे हैं, उन्होंने इस मामले में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण की प्रशंसा की। वहीं उमा भारती ने कहा कि उत्तराखंड इस वक्त राजनीति करने लायक नहीं है और शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि वहां मृत्यु से संघर्ष कर रहे लोगों को बचाना प्राथमिकता है, बाद में मंदिर की बात सोचेंगे। लेकिन इसके ठीक विपरीत प्रशंसा के भूखे नरेंद्र मोदी हैं, जिन्होंने मौत के तांडव के बीच भी अपनी तारीफ के रास्ते निकालने का प्रयास किया था।

              उत्तराखंड में कुदरत ने जो कहर बरपाया, उसके पीछे स्थानीय सरकार की सैकड़ों खामियां हो सकती हैं। यह ठीक वैसी ही होंगी जैसी हर राय में हर हादसे के पीछे दिखाई देती हैं। मसलन विशेषज्ञों की चेतावनियों पर ध्यान नहीं देना, भीड़ जुटने पर ध्यान नहीं देना, हादसे की सूरत में राहत कार्यों के लिए तैयारियां नहीं होना आदि-आदि। और यही सब बातें राजनीति का कारण बनती हैं। लेकिन मोदी ने रोते-बिलखते लोगों की राहत को लेकर जो राजनीतिक दुकान चमकाने का प्रयास किया वह कुदरत के कहर से यादा अफसोसनाक है। उत्तराखंड में हर राय का नागरिक था, लिहाजा हर राय के मुख्यमंत्री का यह दायित्व भी बनता था कि वह अपने नागरिकों को वापस लाने के लिए कम से कम उस स्थान से परिवहन सुविधा उपलब्ध कराए, जहां तक सेना के जवान दुर्गम पहाड़ियों से निकालकर उन्हें सुरक्षित छोड़ रहे हैं। यह व्यवस्था देश के सभी रायों के मुख्यमंत्रियों ने की, कुछ खुद उत्तराखंड गए तो कुछ ने जनता को ढांढस बंधाने के लिए अपने किसी मंत्री को भेज दिया। लेकिन किसी ने यह प्रचारित नहीं किया कि वे किसी जादुई शक्ति से अपने राय के नागरिकों को निकालकर ले गए। लेकिन गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी उत्तराखंड जाएंगे तो अपनी तमाशा करने की रणनीति को भी साथ ले आएंगे, इसका अंदेशा किसी को नहीं था। मोदी ने पहले उन दुर्गम क्षेत्रों में जाने की कोशिश की, जहां मौसम खराब था और लोग मर रहे थे। जाहिर है ऐसे स्थानों पर कोई सरकार उन्हें या किसी को जाने की इजाजत नहीं देती। इसके बाद उन्होंने केदारनाथ मंदिर बनवाने की पेशकश उत्तराखंड के मुख्यमंत्री से कर डाली। हालांकि इस पेशकश का इस वक्त में कोई मतलब नहीं था, जबकि हजारों लोगा मौत से जूझ रहे थे। जाहिर है, यह सब इसलिए कहा गया ताकि इसकी चर्चा हो कि देखिए मोदी कितने सहृदय हैं। रही सही कसर मोदी के उत्तराखंड से रवाना होने के बाद पूरी हो गई। जैसे ही मोदी उत्तराखंड से उड़े, मीडिया पर खबर चलने लगी कि मोदी दो दिन में 15 हजार लोगों को बचाकर ले गए। मानो मोदी के पास कोई दैवीय शक्ति थी कि वे आपदा क्षेत्र में पहुंचे और अपने नागरिकों को पहाड़ों से बटोर कर गुजरात भेज दिया। यह खबर कहां से निकली और इसे मोदी से किस तरह जोड़ा गया, यह समझना बहुत गूढ नहीं है। मोदी ने इसके लिए बाकायदा एक टीम बना रखी है, जो हर उस घटना को जिसमें मोदी का नाम आए कुछ ऐसी अदा से पेश करती है कि लगता है मानो सब कुछ मोदी ने किया हो। अपनी प्रसंशा के भूखे मोदी यह भी नहीं समझ पाए कि यह खबर मोदी के विरोध में ही जाती है, क्योंकि सभी देख रहे हैं कि दुरूह पहाड़ियों से अपनी जान पर खेलकर वहां फंसे श्रध्दालुओं को कौन और कैसे निकाल रहा है। यदि सेना मदद न करती तो वहां से कुछ सैकड़ा लोगों को भी निकाल पाना मुश्किल था। अब मोदी मौन हैं, क्योंकि उनके पास इसका कोई जवाब नहीं कि क्या यह जगह और वक्त भी इस लायक प्रतीत होता है, जिसमें नेता श्रेय लेने की राजनीति करें? क्या वाकई गुजरात के लोगों को मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने ही बचाया है? क्या इस समय वाकई केदारनाथ मंदिर के जीर्णोध्दार की जरूरत है। जाहिर है ऐसा नहीं है, क्योंकि भीषण तबाही के बीच भी केदारनाथ मंदिर सुरक्षित है। मामूली क्षति हुई है, जो सहजता से ठीक हो सकती है। यहां विश्व हिंदू परिषद के अंतराष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष प्रवीण तोगड़िया का बयान भी मायने रखता है कि जब केदारनाथ मंदिर को कोई क्षति हुई ही नहीं और वहां की सभी मूर्तियां भी सुरक्षित हैं तो फिर इस ऐतिहासिक मंदिर के जीर्णोध्दार को लेकर इतनी राजनीति क्यों हो रही है? इतना ही नहीं उन्होंने उत्तराखंड सरकार के राहत एवं बचाव कार्य के लिए किये जा रहे प्रयासों पर संतोष व्यक्त किया। जिसमें भाजपा को कमी नजर आ रही थी।

                 बहरहाल मोदी ऐसा क्यों करते हैं, यह समझना बहुत मुश्किल नहीं है। मोदी भले ही राष्ट्रीय राजनीति में आने की ओर बढ़ रहे हों, लेकिन वास्तव में वे एक क्षेत्रीय नेता ही हैं। उनकी मानसिकता भी वैसी ही है। जिस तरह क्षेत्रीय नेता जरा सा श्रेय मिलने पर फूल जाते हैं और जरा सी आलोचना में सहम जाते हैं या गुस्सा होकर अटपटे बयान देने लगते हैं, मोदी भी ठीक उसी तरह हैं। उनके काम करने का तरीका भी नेताओं की बजाए आम लोगों जैसा ही है। यह पहली बार नहीं है, जब मोदी ने किसी राहत कार्य को लेकर श्रेय लेने की कोशिश की है। इससे पहले भी वे ऐसा कर चुके हैं और मुंह की खा चुके हैं, लेकिन आदतें आसानी से नहीं छूटतीं।

                वर्ष 2008 में बिहार की कोशी नदी ने जमकर कहर बरपाया था। इस वक्त गुजरात सरकार की ओर से पांच करोड़ रुपए की आर्थिक मदद की गई थी। मोदी उस वक्त  तत्काल तो इसका श्रेय नहीं ले पाए, लेकिन 2010 में उन्होंने इसका श्रेय लेने की ठानी और बिहार के अखबारों में पन्ने भर-भर के विज्ञापन छपवाए गए, जिनमें उन पांच करोड़ रुपए देने को मोदी की महानता निरूपित किया गया। बताया गया कि बिहार में आई बाढ़ के दौरान गुजरात ने दिल खोल कर बिहारवासियों की मदद की। मोदी को आत्मप्रशंसा का यह दांव भी बड़ा महंगा पड़ा था। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उनके पांच करोड़ रुपए यह कहते हुए वापस कर दिए कि बिहारवासी किसी की मदद के मोहताज नहीं हैं। ताजजुब यह है कि मोदी सिर्फ तीन साल बाद इस घटना को भूल गए और उत्तराखंड में उन्होंने वही गलती दोहरा दी, जो बिहार में दोहराई थी। अंतर सिर्फ इतना रहा कि पहली बार वाकायदा विज्ञापन छपवाए थे और अब अपनी प्रचारक टीम से खबरें चलवाईं। जो व्यक्ति बात-बात पर अपनी प्रशंसा करे, दूसरों को खुद से कमतर समझे, बात-बात पर अपनी मदद का ऐहसान जताए, दूसरों का श्रेय लेने का प्रयास करे, क्या ऐसा व्यक्ति भारत जैसे विशाल और बहुसंस्कृति सभ्यता वाले देश का मुखिया होने योग्य है?

? विवेकानंद