संस्करण: 1 जुलाई -2013

मोदी का हिमालयी चमत्कार

15000 गुजराती तीर्थयात्रियों को बचाने के बड़े-बड़े दावे दर्शाते है

कि उनके काम में प्रचारतंत्र कितना सक्रिय है।

? अभीक बर्मन

                 शुक्रवार, 21 जून 2013 की शाम को जब संपूर्ण भारतवर्ष उत्तराखण्ड और हिमालय क्षेत्र में आई प्राकृतिक आपदाओं के सदमें से चकराया हुआ था, तभी गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी कुछ अधिकारियों के साथ देहरादून में उतरे। रविवार को दावा किया गया कि उन्होने उत्तराखण्ड त्रासदी में फॅंसे 15000 गुजरातियों को सुरक्षित निकाल लिया है और उन्हे उनके घर वापस भेज दिया गया है।

                 इस चमत्कार को मीडिया में खूब बढ़ा-चढ़ाकर बताया गया। किन्तु यह अद्भुद कार्य एक या दो दिन में कैसे किया गया जबकि भारत की संपूर्ण सैनिक स्थापना ने लगभग 40000 लोगों को बचाने के लिये 10 दिन से अधिक संघर्ष किया?

                प्राप्त सूचनाओं के अनुसार मोदी ने यह सफलता 80 इनोवा गाड़ियों के एक बेड़े से प्राप्त की। ये कारें केदारनाथ जैसे स्थानों पर सड़क मार्ग से कैसे पंहुची जबकि वहाँ की सभी सड़कें पानी में बह गई है तथा वहाँ पंहुचने वाले समस्त मार्ग भूस्खलन के कारण नष्ट हो गये है?

                 किन्तु चलो हम यह मान लेते है कि मोदी की इनोवा गाड़ियों में हेलीकॉप्टर की तरह पंखें लगे हुये थे। इनोवा गाड़ी की बनावट के अनुसार उसमें ड्रायवर सहित 7 लोगों को ले जाया जा सकता है। यह मान लेते है कि कठिन परिस्थितियों में प्रत्येक कार में 9 लोग आ सकते है। ऐसी स्थिति में भी 80 इनोवा गाड़ियों का बचाव दल एक बार में 720 लोगों को पहाड़ों से देहरादून लाया होगा। 15000 लोगों को नीचे लाने के लिये इन 80 गाड़ियों को 21 चक्कर लगाने होंगे।

               देहरादून और केदारनाथ के बीच की दूरी 221 कि.मी. है। इसलिये 21 बार ऊपर जाने और नीचे आने में प्रत्येक इनोवा गाड़ी को 9300 किमी. चलना होगा।

                 मैदानी क्षेत्रों में चलने की बजाय पहाड़ों पर चलने में ज्यादा समय लगता है। इसलिये गाड़ी की औसत गति 40 किमी. प्रतिघंटा मान लेते है। इस हिसाब से इस अद्भुत कार्य को करने में 233 घंटे लगेंगे।

               उक्त समय में यह काम करने के लिये बिना रूके गाड़ी चलानी होगी। गुजरातियों को पहचानकर उन्हे बचाने तथा बाकी पीड़ितों को वहीं छोड़ देने में एक सेकण्ड का भी विश्राम नही करना होगा। किसी भी वक्त इन गाड़ियों को तत्काल भरना और खाली करना होगा और उन बहादुर बचावकर्मियों के लिये विश्राम का समय तो भूल ही जाइये। तब भी यह चमत्कार करने में लगभग 10 दिन लगेंगे। मोदी इसमें 1 दिन में सफल हो गये? वास्तव में एक दिन से भी कम में। मीडिया ने सांस लिये बगैर खबरें दी कि शनिवार तक 25 लक्जरी बसें गुजराती तीर्थयात्रियों के दल को दिल्ली ले आई है तथा चार बोइंग विमान भी पास के ही किसी अज्ञात स्थान पर खड़े है।

                सदैव शालीन रहने वाले मोदी ने हिमालयी त्रासदी से 15000 गुजरातियों को एक दिन में बचा लेने का दावा स्वयं नही किया। यह संभवतया उनकी जनसंपर्क एजेंसी ''एप्को वर्ल्डवाइड'' जो एक अमेरिकी संस्था है, के द्वारा मीडिया के सामने प्रस्तुत किया गया। गुजरात सरकार ने 2007 में 25000 डॉलर प्रतिमाह के भुगतान पर एप्को को काम पर रखा था। इसे प्रत्यक्ष रूप से तो ''वाइब्रेंट गुजरात'' समिट को प्रचारित करने के लिये रखा गया किन्तु वास्तव में इसका उद्देश्य मोदी की छवि को चमकाना था।

               मोदी अच्छी संगति में है। ''एप्को'' कजाखस्तान के तानाशाह नूरसुल्तान नजरबेव, मलेशिया और इजराइल की सरकार के लिये तथा अमेरिकी तंबाकू लॉबी के लिये काम कर चुकी है।

             ''एप्को'' ने अमेरिकी तंबाकू लॉबी के लिये काम किया। यह वही संस्था है जिसने तंबाकू से कैंसर होने के प्रमाणों की कटु आलोचना करने और उन्हे झूॅठा साबित करने के लिये अग्रणीय संगठन बनाये। एप्को दुनिया की सबसे निकृष्ट शासन व्यवस्थाओं जैसे अजरबेजान और तुर्कमेनिस्तान के लिये और नाइजीरिया के दबंग शासक सानी अबाचा के लिये काम कर चुकी है।

              ''एप्को'' की ताकतवर सलाहकार परिषद में पूर्व इजराइली राजनयिक इतामर रेबिनोविच और शिमोन स्टेइन के साथ ही दोरों बर्गरबेस्ट इलोन शामिल है जो इजराइल सुरक्षा एजेंसी में सर्वोच्च श्रेणी के अधिकारी थे।

               मोदी को बाह्य आवरणों से आच्छादित कर आकर्षक बनाने और उनके त्रिविमीय प्रचार का श्रेय एप्को को जाता है। एप्को से पूर्व वाइब्रेंट गुजरात एक नीरस मामला था। पहली तीन समिट में निवेश के जो अनुबंधा हुये वे 14 बिलियन डॉलर और 150 बिलियन डॉलर के बीच हुये। एप्को के आने के बाद 2009 से 2011 के बीच यह बढ़कर 253 बिलियन डॉलर और 450 बिलियन डॉलर हो गया।

              एप्को ने अमेरिका के निवेशकों की गुजरात में रूचि बढ़ाने के लिये रातदिन परिश्रम किया। इसके लिये उसने वाशिंगटन में राजनेताओं पर इस बात के लिये भी दबाव डाला कि वे मोदी को अमेरिका यात्रा के वीसा पर लगे प्रतिबंधा को हटा लें। 2002 में मोदी के नैतृत्व की गुजरात सरकार के संरक्षण में मुसलमानों के नरसंहार के कारण अमेरिका ने मोदी पर यह प्रतिबंध लगाया था। एप्को अभी तक मोदी को अमेरिकी वीसा दिलाने में सफल नही हो सकी है।

               वाइब्रेंट गुजरात के ऑंकड़े सब कोरी डींग है। मेरे एक साथी किंग्शुक नाग द्वारा मोदी पर लिखी गई जीवनी में किये गये विश्लेषण से पता चलता है कि 2009 के ऑकड़ों में केवल 3.2 प्रतिशत कार्यान्वित हुये है। 2011 के ऑंकड़ों में मात्र 0.5 प्रतिशत ही वास्तविकता में बदले है।

               किन्तु मोदी को झूॅठ बोलने के लिये एप्को की जरूरत नही है। 2005 में उन्होने घोषणा की थी कि राज्य के स्वामित्व की कंपनी ''जी.एस.पी.सी''. ने भारत की अभी तक की सबसे बड़ी गैस खोज की है। यह आंधा्रप्रदेश के तटीय क्षेत्र में है जो 20 ट्रिलियन क्यूबिक फीट है तथा इसकी कीमत 50 बिलियन डॉलर से अधिक है। यह रिलायंस द्वारा इसी क्षेत्र में खोजी गई गैस से 40 प्रतिशत अधिक है। इसके बाद मोदी ने जी.एस.पी.सी. को मिस्र, यमन और आस्ट्रेलिया में प्रोजेक्ट हासिल करने के लिये आगे बढ़ाया।

                इसमें अनेक लोगों को संदेह था कि मोदी का गैस का दावा एक डींग मात्र है किन्तु प्रमाणों के अभाव में ज्यादा लोग इस पर कुछ कह न सके। 2012में केन्द्रीय हाइड्रोकार्बन महानिदेशक जो सभी ऊर्जा संबन्धी खोजों का विश्लेषण करते है और उन्हे प्रमाणित करते है,ने कहा कि मोदी द्वारा किये गये दावे के विपरीत वहाँ मात्र 10 प्रतिशत गैस ही है। वहाँ सिर्फ 2 टी.सी.एफ. गैस है और इस क्षेत्र में उसे निकालना अत्याधिक कठिन है।

              इसी दौरान मोदी के शानदार नैतृत्व में जी.एस.पी.सी. को गैस की खोज के लिये 2 बिलियन डॉलर की राशि दी गई जिसमें से अधिकांश राशि ऋण के रूप में थी जो 20 टीसीएफ गैस मिलने की संभावना के आधार पर दी गई थी। जब गैस गायब हो गई तो जीएसपीसी ठप्प हो गई।

                जीएसपीसी को बचाने के लिये मोदी ने कंपनी से और अधिक क्षेत्रों जैसे- शहर में गैस वितरण आदि कार्य करने की बात कही। इन व्यवसायों के साथ कई समस्यायें रही है जिसमें बारबाडोस में एक कंपनी के साथ अत्याधिक संदिग्ध लेनदेन भी शामिल है।

               प्रत्येक क्षेत्र में मोदी की गाथा डींग और आत्मप्रशंसा से भरी हुई है किन्तु उनका हिमालयी चमत्कार तो एक सफेद झूॅठ है।      

? अभीक बर्मन