संस्करण: 1 जुलाई -2013

बिना शह के भ्रष्टाचार संभव ही नहीं

? डॉ. महेश परिमल

                   ध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपने भाषण में कई बार लोकायुक्त को खुला हाथ देने की बात की है। पर यह उनकी आत्मप्रवंचना ही है। पिछले दिनों वन विभाग के एक अधिकारी के यहां मारे गए छापे में 40 करोड़ की बेनामी सम्पत्ति का पता चला। अब मंत्री की मेहरबानी के बिना क्या उच्च अधिकारी इतनी बड़ी सम्पत्ति के मालिक हो सकते हैं। यही हाल मत्स्य पालन अधिकारियों के यहां छापे से साबित हुई है। इन तमाम लोगों के यहां मारे गए छापे में 1200 करोड़ की बेहिसाबी सम्पत्ति का पता चला है। क्या मध्यप्रदेश में लोकायुक्त सो रहे हैं। उन्हें क्या नहीं पता है कि राज्य में कितना भ्रष्टाचार है। एक लोकायुक्त हुए हैं कर्नाटक के संतोष हेगड़े, जिन्होंने पद पर रहते हुए खनिज उत्खनन के घोटाले का पर्दाफाश किया। यही नहीं उन्होंने राज्य के मुख्यमंत्री येद्दियुरप्पा समेत कईअधिकारियों को सीखचों के पीछे भी पहुंचाया। अब यदि मध्यप्रदेश में लोकायुक्त के सक्रिय होने की जानकारी मिलती है, तो मुख्यमंत्री की हालत पतली होने लगी है। आखिर भ्रष्टाचार की लीपापोती कहां कहां करें? लालकृष्ण आडवाणी की प्रशंसा के बाद भी उन्हें राहत मिलती नजर नहीं आ रही है। अभी तक लोकायुक्त के जाल में प्रदेश के मंत्री नहीं फंस पाए हैं। जिस तरह से अधिकारियों की धारपकड़ हो रही है, उससे यही संकेत मिलता है कि इन सभी पर मंत्रियों का वरद्हस्त है। इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता कि मुख्यमंत्री अपने साथियों की इन हरकतों से अनजान हैं। इस समय मध्यप्रदेश लोकायुक्त के पास 11 मंत्रियों और 49 आईएएस अधिकारियों, 35 आईपीएस अधिकारियों एवं 108 अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले लंबित हैं।

                अब भोपाल नगर निगम के चतुर्थ वर्ग कर्मचारी के पास से यदि 23 करोड़ की अघोषित सम्पत्ति मिले, तो इसे क्या कहेंगे कि उसने अकेले ही पूरी सम्पत्ति बना ली? उस महाशय के पास 11 आलीशान बंगले हैं और कीमती गाडियों  का मालिक है।  पकड़े जाने के बाद उसने दो आईएएस और एक विधायक का नाम बताया, जो उसके इस काले कारनामें में सहभागी थे। किंतु सबूत के अभाव में लोकायुक्त उसका कुछ भी बिगाड़ नहीं पाई। कई मामलों में लोकायुक्त भी हाथ खड़े कर देते हैं, क्योंकि पहले सिरे पर अपराधी है, तो उसका दूसरा सिरा किसी न किसी मंत्री, विधायक या फिर और भी रसूखदार से जुड़ता है। फिर भी पिछले तीन वर्षों में मध्यप्रदेश के विभिन्न स्तरों पर चल रहे भ्रष्टाचार को लेकर जो कार्रवाई की गई है, उससे कई अधिकारियों का घर का रास्ता बता दिया है। यह बात समझ में नहीं आई कि जो उच्च अधिकारी अपने कार्यकाल के दौरान पूरे सौ करोड़ की सम्पत्ति इकट्ठी कर ले, इसकी भनक सरकार को न हो। सोचो यदि उसके पास सौ करोड़ केी सम्पत्ति है, तो उसने सरकार को कितने करोड़ का चूना लगाया होग? कितने अन्य अधिकारियों एवं विधायकों, मंत्रियों को उपकृत किया होगा? आखिर ये धन जनता का ही है ना?

                  अन्ना हजारे ने जनलोकपाल के लिए जो आंदोलन चलाया था, वह उनकी स्वयं की जिद के कारण गलत रास्ते पर चला गया। उसके साथ-साथ न जाने कितने ही सच्चे मुद्दे भी ताक पर रख दिए गए। सरकारी तंत्र जिस तरह से अमर्यादित हो रहा है, उच्छृंखल हो रहा है, इस पर अंकुश रखने के लिए लोगों को जागरुक करने का अभियान इस देश में चलते रहना चाहिए। लोकायुक्त और लोकपाल के कानून में अनेक खामियां हैं, जिसके कारण छोटी मछलियां जाल में आ जाती हैं, पर बड़ी मछलियों को कोई छू भी नहीं पाता। होना तो यह चाहिए कि जब भी कोई चतुर्थ वर्ग कर्मचारी या फिर उच्च अधिकारी अघोषित सम्पत्तिा को लेकर पकड़ा जाए, तो उसकी पूरी श्रृंखला का खुलासा होना चाहिए। सभी को सजा होनी चाहिए। पर इस देश का दुर्भाग्य यही है कि छोटी मछलियां अक्सर बड़ी मछलियों का शिकार हो जाती हैं।

                यह तो तय है कि कोई भी अधिकारी बिना किसी शह के अपने दम पर इतनी बड़ी रियासत खड़ी नहीं कर सकता। यह तो भारतीय अव्यवस्था ही है कि यहां सब कुछ किसी के इशारे से होता है, पर आखिर तक यह पता नहीं चल पाता कि इशारे करने वाला कौन है? उज्जैन में ही लोकनिर्माण विभाग को जो इंजीनियर पकड़ा गया, उसके पास से 15 करोड़ की अघोषित सम्पत्तिा होने का पता चला। बाद में यह भी पता चला कि उस रिश्वतखोर इंजीनियर के प्रदेश सरकार के दो मंत्रियों से अच्छे संबंध हैं। इसकी भनक लगते ही दोनों मंत्रियों ने ऐसा जाल बुना कि दोनों छटक गए। उन्होंने उस इंजीनियर को पहचानने से ही इंकार कर दिया। लोकायुक्त के हाथ बंधो हुए हैं। जब कभी उनके हाथ में बड़ी मछली आती है, तो कानून का हवाला देकर उनके हाथों का कमजोर कर दिया जाता है। क्या किया जाए, हमारे कानून में ही खामियां हैं, जिसके कारण रसूखदार बच जाते हैं। ये भी भला कोई बात हुई कि भ्रष्टाचार से जुड़े किसी मंत्री या विधायक पर किसी तरह की कार्रवाई करने के पहले लोकायुक्त  को राज्य सरकार की मंजूरी लेनी पड़ती है। अब भला राज्य सरकार क्यों चाहेगी कि उनके ही मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ भ्रष्टाचार का मामला चले? यदि लोकायुक्त के हाथ खुले होते, तो मंजूरी की आवश्यकता ही क्यों पड़ती? कांग्रेस-भाजपा दोनों ही परस्पर आरोप लगा रहे हैं। कांग्रेस कहती है कि मध्यप्रदेश सरकार भ्रष्टाचार को बढ़ावा दे रही है। भाजपा सरकार कहती है क हम तो कानून को और कड़ा करना चाहते हैं, पर केंद्र सरकार सहयोग नहीं कर रही है। इस परस्पर दोषारोपण से हालात संभलने वाले नहीं हैं।

                  भ्रष्टाचार से देश रसातल में ही जाता है। पर इस अंकुश रखना आवश्यक है, पर कानून यदि इतने सख्त हो जाएं कि भ्रष्टाचार करने वाला उसकी कल्पना से ही दहशत में आ जाए, तो भ्रष्टाचार हो ही नहीं। केवल मंत्री, विधायक ही नहीं, बल्कि बड़े बड़े उद्योगपति घराने भी इसमें लिप्त हैं। आखिर उन्हें भी अपना कारोबार चलाना है। इसलिए बहती गंगा में हर कोई हाथ धो लेता है।

? डॉ. महेश परिमल