संस्करण: 1 जुलाई -2013

मुखर्जी, धारा 370 और भाजपा

? सुभाष गाताड़े

               म्बे समय तक हिन्दु महासभा में सक्रिय और बाद में संघ सुप्रीमो गोलवलकर की सलाह/मार्गदर्शन/सहयोग से 'भारतीय जनसंघ' की स्थापना करनेवाले श्यामाप्रसाद मुखर्जी, को हर साल संघ-भाजपा की तरफ से उनके मृत्युदिन पर याद किया जाता है। न केवल इस बार जनाब मोदी एवं जनाब आडवाणी ने अलग अलग स्थानों पर सभाओं को सम्बोधित किया बल्कि मुखर्जी की याद के बहाने आडवाणी ने परोक्ष रूप से संघ-भाजपा के वर्चस्वशाली तबके पर हमला किया। मुखर्जी की सभी को साथ लेकर चलने की कोशिशों की उनकी चर्चा एक तरह से पार्टी के अन्दर उनको अलग थलग करने में मुब्तिला लोगों की आलोचना थी।

                 उन्हें याद करते हुए इन दोनों ने मुखर्जी की राय की बात करते हुए धारा 370 को हटाने की भी बात की। याद रहे धारा 370 कश्मीर को विशेष दर्जा प्रदान करता है। अपने ब्लॉग पर जनाब आडवाणी ने लिखा कि किस तरह भारतीय जनसंघ की पहली राष्ट्रीय बैठक में मुखर्जी ने ' एक देश में दो प्रधान, दो निशान, दो विधान, नहीं चलेंगे, नहीं चलेंगे' की बात की थी।

                इसमें कोई दो राय नहीं कि जनतंत्र में सभी को अपनी राय रखने का अधिकार है, मगर ऐसा प्रतीत होता है कि चाहे मोदी हों या आडवाणी हों  या समूचा संघ परिवार हो, उनके इस 'बलिदानी नायक' को बेहद सिलेक्टिवली ही याद करना चाहता है क्योंकि बेहद कम उम्र में कोलकाता विश्वविद्यालय के कुलपति से लेकर राजनीति का लम्बा समय तय करनेवाले श्यामाप्रसाद मुखर्जी के जीवन के कुछ ऐसे पहलू हैं, जिनपर उन्हें सफाई देना बेहद मुश्किल जान पड़ता है। निश्चित ही संघ-भाजपा के लोग भारत छोड़ो आन्दोलन के दिनों की उनकी विवादास्पद भूमिका के बारे में जानते ही होंगे। यह वही वक्त था जब एक तरफ भारत की अवाम अंग्रेजों भारत छोड़ो के नारे के साथ तमाम कुर्बानियां देने में जुटी थी, उन्हीं दिनों श्यामाप्रसाद मुखर्जी एक साझा सरकार में बंगाल का वित्त मंत्रालय सम्भाले थे। सत्ता में साझेदारी का मुस्लिम लीग एवं हिन्दु महासभा का यह प्रयोग महज बंगाल तक सीमित नहीं था, तत्कालीन नार्थ वेस्ट फ्रान्टियर प्रांविन्स तथा पंजाब जैसे अन्य दो स्थानों पर भी यह प्रयोग चला था।

                  विख्यात इतिहासकार रमेशचन्द्र मजुमदार अपनी किताब 'हिस्टरी आफ माडर्न बंगाल' (पार्ट 2, पेज 350-351) में जनाब मुखर्जी द्वारा भारत छोड़ो आन्दोलन के सन्दर्भ में बंगाल के गवर्नर को लिखे पत्रा के हवाले से लिखते हैं : अपने पत्रा के अन्त में मुखर्जी ने कांग्रेस द्वारा संगठित जनान्दोलन की चर्चा की। उनकी आशंका थी कि यह आन्दोलन आन्तरिक अव्यवस्था को जन्म देगा और जनता को आन्दोलित करके युध्द के दौरान आन्तरिक सुरक्षा को खतरे में डालेगा। उनका कहना था कि सत्ता में रहनेवाली हर सरकार को उससे निपटना होगा, मगर उनका मानना था कि यह महज दमन से मुमकिन नहीं है ...इसी पत्रा में उन्होंने उन कदमों की भी चर्चा की जो इस परिस्थिति से निपटने के लिए उठाए जा सकते हैं।''

                 उम्मीद की जा सकती है कि अपने ब्लॉग में श्री आडवाणी जनता को बताएंगे कि 'भारत छोड़ो आन्दोलन' के दमन हेतु गवर्नरमहोदय को सलाह देनेवाले उनके इस नायक के कदम को लेकर वह क्या सोचते हैं ? वैसे आजादी के आन्दोलन से दूरी बनाए रखे लोगों एवं उनके अनुयायियों से इस सन्दर्भ में किस किस्म की सफाई पेश होगी, इसका सहज ही अन्दाजा लगाया जा सकता है। फिलवक्त हम अपना धयान धारा 370 के प्रति कही जा रही बातों पर केन्द्रित करना चाहते हैं। दरअसल ऐसा प्रतीत होता है कि मुखर्जी के 'बलिदान' की गाथा सुनते सुनते वयस्क हुए संघ-भाजपा के तमाम लोगों ने उन तमाम खुलासों पर गौर नहीं किया है जो उनके अपने संस्थापक सदस्य की राजनीतिक सक्रियताओं से सम्बधित हैं। आक्सफोर्ड युनिवर्सिटी प्रेस जैसे प्रतिष्ठित प्रकाशन की तरफ से दो साल पहले प्रकाशित एक किताब के कुछ अंश समूचे कश्मीर विवाद पर नयी रौशनी डालते हैं और इस विवाद में शामिल रहे सभी अहम लोगों की जिम्मेदारी पर नया प्रकाश डालते दिखते हैं।

               ए जी नूरानी जैसे संविधान के जानकार एवं प्रख्यात कानूनविद द्वारा लिखी गयी प्रस्तुत किताब 'आर्टिकल 370 : ए कान्स्टिटयूशनल हिस्टरी आफ जम्मू एण्ड कश्मीर' में 92 ऐतिहासिक दस्तावेज पेश किए गए हैं जो धारा 370 -जिसके तहत जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा दिया गया है - को दी गयी मंजूरी को लेकर चली लम्बी जद्दोजहद पर रौशनी डालती है। इन दस्तावेजों में दुर्लभ पत्र, ज्ञापन, श्वेत पत्र, घोषणाएं और संशोधान शामिल किए गए हैं। किताब के आधिकारिक बने रहने के लिए शैलीगत बदलाव भी नहीं किए गए हैं। धारा 370 को मिली मंजूरी के बाद किस तरह विभिन्न सरकारों ने उसको खोखला करने की कोशिश की, इसका भी वह विस्तार से उल्लेख करती है। जम्मू कश्मीर के प्रस्तुत विवाद को लेकर ए जी नूरानी का मानना है कि अगर राजनीतिक इच्छाशक्ति का परिचय दिया जा सकें और अपने मकसद के प्रति गम्भीरता एवं समझौते की भावना से हम आगे बढ़ें तो यह बेहद कठिन नहीं होगा कि हम धारा 370 के अवमूल्यन को रोक सकें तथा उसकी सारवस्तु को बहाल कर सकें। वह मानते हैं कि जम्मू कश्मीर विवाद के समाधान के लिए इलाके की जनता की आकांक्षाओं की पूर्ति करते इस संवैधानिक समझौते पर अमल करना आवश्यक है।

               लेखक यह भी स्पष्ट करता है कि धारा 370 के तहत जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने को लेकर भाजपा के पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामाप्रसाद मुखर्जी की पूरी सहमति थी। गौरतलब है कि संविधान की इस धारा के प्रति अपने विरोधा को प्रगट करने के लिए भाजपा बिना अपवाद के श्यामाप्रसाद मुखर्जी की ही दुहाई देती रहती है। इतना ही नहीं प्रस्तुत किताब यहभी स्पष्ट करती है कि इस संवैधानिक प्रावधान के प्रति तत्कालीन गृहमंत्री सरदार पटेल की भी पूरी सहमति थी जिन्हें भी भाजपा अक्सर उध्दृत करती रहती है कि उन्होंने प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू द्वारा जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने की मुखालिफत थी। ध्यान रहे कि लोग इस तथ्य से भी वाकीफ नहीं हैं कि मसविदा कमेटी में चर्चा के बाद जब संविधान सभा में भारतीय संविधान के तमाम प्रावधानों पर चर्चा जारी थी, उन्हीं दिनों नेहरू एवं उनके सहयोगियों ने शेख अब्दुल्ला के साथ , जो जम्मू और कश्मीर के तत्कालीन प्रधानमंत्री थे, मई से अक्तूबर 1949 तक इस मसले पर चर्चा की और निष्कर्ष तक पहुंचे थे।

               फिलवक्त यह कहना मुश्किल है कि आए दिन कश्मीर के सवाल पर जनाब मुखर्जी के 'बलिदान' की चर्चा करनेवाली भाजपा ने आखिर आज तक उनकी इस समझदारी को लोगों के साथ सांझा क्यों नहीं किया और अपने संकीर्ण नजरिये के तहत किए जा रहे उपरोक्त धारा के विरोधा पर श्यामाप्रसाद मुखर्जी की मुहर लगाने का गलत प्रचार क्यों किया? दोनों सम्भावनाएं हो सकती हैं। एक, संघ-भाजपा परिवार में अध्ययन की जो बेहद क्षीण परम्परा है, उसके चलते उनके नेताओं ने भी जनाब मुखर्जी के इस पहलू को भूल जाना ही बेहतर समझा हो और अपने नेता की भी एक ऐसी छवि गढ़ी हो जो उनकी सियासत से मेल खाती हो। दूसरे, समूचा परिवार वास्तविक स्मृतिलोप का शिकार हो गया हो।

                 सामूहिक स्मृतिलोप की बात बहुत कमजोर जान पड़ती है, स्पष्ट है कि धारा 370 के निर्माण में मुखर्जी के 'योगदान' को जानबूझकर ठण्डे बस्ते में डालने का निर्णय लिया गया होगा।

                वैसे भाजपा के इस सूचक मौन से किसी को आश्चर्य नहीं होगा क्योंकि हाल के समयों में ऐसे कई मौके आए हैं जब भाजपा एवं उसके समविचारी संगठनों के लोग अपने लोगों द्वारा ही तैयार किताबों को, जिन्हें वह अपने ही द्वारा शासित किन्हीं राज्यों में लागू कर चुके हैं, उन्हें न पढ़ते देखे गए हैं या अपने आप को असुविधाजनक स्थितियों में पाकर उसे वापस लेने के लिए भी मजबूर होते देखे गए हैं।

              इस सन्दर्भ में इण्डियन एक्सप्रेस में छपी खबर (9 मई 2006) बहुत कुछ कहती है :

              ''मुंबई में भाजपा के पचीस साल पूरे होने के अवसर पर आयोजित भव्य समारोह में जनसंघ-भाजपा के आधिकारिक इतिहास के जिन सोलह खण्डों का विमोचन किया गया था, उसमें से एक को चार माह बाद वापस लेने की घटना आज भी रहस्यमयी बनी हुई है। मालूम हो कि इतिहासकार माखन लाल द्वारा भाजपा के वरिष्ठ नेता जे पी माथुर की देखरेख में तैयार इस श्रृंखला की प्रस्तावना लोकसभा में विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी ने लिखी थी।'

              आखिर एक समूचे खण्ड को वापस क्यों लिया गया था। जानकार बताते हैं कि इस खण्ड में गांधीजी का जो बेहद नकारात्मक चित्रण था, उसे लेकर भाजपा नेतृत्व ने अपने आप को खुद असहज महसूस किया था और पूरे खण्ड को वापस लेने में ही होशियारी समझी थी।

              मगर शायद उड़िशा का अनुभव संघ-भाजपा के तमाम कार्यकर्ताओं की बौध्दिक क्षमताओं का वास्तविक इम्तिहान लेता दिखता है, जिन्हें लगभग पांच साल लगे ताकि उनकी ही सरकार द्वारा (जिसे उस वक्त वह नवीन पटनायक के साथ सांझा कर रहे थे) तैयार एक पाठयपुस्तक की विसंगति को वह देख पाए, जबकि उन दिनों शिक्षा विभाग का महकमा संघ के प्रचारक रहे समीर डे के पास था।

इण्डियन एक्स्प्रेस की पहले पेज पर छपी रिपोर्ट ने इस ख़बर का भी खुलासा किया था ('इन एनडीए उड़िसा, ए टेक्स्टबुक इक्वेटस बीजेपी विथ लश्कर', 2 फरवरी 2007) कि किस तरह डिग्री के छात्रों की भारतीय राजनीति पर किताब में लश्कर ए तोइबा को भाजपा के समकक्ष रखा गया था। रिपोर्ट के मुताबिक

                ''आतंकवादी संगठनों के अस्तित्व विषय पर केन्द्रित आलेख बताता है: आतंकवादी संगठन देश में तनाव पैदा करते हैं। भाजपा, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ, बजरंग दल, हुर्रियत कान्फेरेन्स और लश्कर ए तोइबा जैसे संगठन हिंसा फैलाने के लिए जिम्मेदार हैं जिसके चलते देश में खासकर कश्मीर में सैकड़ों की तादाद में लोग मारे गए हैं।''

               गौरतलब था कि प्रस्तुत पाठयपुस्तक -जिसे किन्हीं अमरेन्द्र मोहन्ती और श्यामा चरण मोहन्ती, जैसे राजनीतिविज्ञान के अधयापकों द्वारा तैयार किया गया था, उसे उड़िशा की कक्षाओं में 2003 से पढ़ाया जा रहा था। यह मामला तभी उजागर हो सका जब सालेपुर नामक जगह के भाजपा के कार्यकर्ता ने इस बात को पढ़ा और पुलिस में जाकर प्रथम सूचना रिपोर्ट फाइल की।

 

? सुभाष गाताड़े