संस्करण: 01 दिसम्बर- 2014

गोद लेने की हवा चली है, आप भी ले लो

? अंजलि सिन्हा

              दिल्ली एनसीआर के कुछ गांवों से खबर आयी थी कि वहां से चुने गए सांसद पर वह नाराज हैं, जिन्हें उन्होंने भारी वोटों से जीताया था। दरअसल नाराजगी की जड़ में प्रधानमंत्री द्वारा शुरू की गयी गांवों को गोद लेने की योजना है। समाचार के मुताबिक चूंकि सांसद महोदय ने उन्हें गोद न लेकर बगल का गांव गोद लिया इस वजह से वह नाराज हैं। निश्चितही उपरोक्त गांव की तरह देश के हजारों गांव हैं,उन्होंने भी उम्मीद पाली थी कि उन्हें भी कोई गोद लेगा,मगर वह भी ताकते ही रहे होंगे। विडम्बना ही है कि हमारे देश के सारे गांव टुअर/अनाथ/बेसहारा हैं, जिन्हें कोई सहारा, गोद चाहिए।

              देश में कुल गांवों की संख्या लगभग साडे छह लाख हैं, जबकि सांसदो की संख्या लोकसभा तथा राज्यसभा मिला कर आठ सौ बैठती है, जाहिर है अधिकतर गांव तो गोद लिये जाने से वंचित रह जाएंगे। सोचने का सवाल है कि कस्बं, छोटे शहरों ने क्या गुनाह किया है, जो उन्हें लेने की बात नहीं हुई।

              वैसे किन गांवों का चयन किया जाना चाहिए इसके बारे में अस्पष्टता है, उस वजह से नेतागणों के गांवों के चयन से उनके सरोकारों, रूझानों पर भी निगाह डाली जा सकती है। उदाहरण के तौर पर यू पी में भाजपा सांसदों द्वारा चुने गए 20 गांवों का जो सामाजिक विश्लेषण प्रकाशित हुआ है, वह बताता है कि इनमें से 16 चयनित गांवों में अल्पसंख्यक समुदाय का एक भी घर नहीं है। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव की भी इस बात के लिए आलोचना हुई कि उन्होंने भी पूर्णतः हिन्दूबहुल गांव को गोद लिया।

              खैर, अब चूंकि गोद लेने की हवा चली है तो यह भी सुनने में आया है कि रेलमंत्री सुरेश प्रभु ने भी रेल अधिकारियों का आवाहन किया है कि वह स्टेशनों के विकास के लिए उन्हें गोद ले लें। तर्क यह दिया जा रहा है कि चूंकि स्टेशनों पर साफ सफाई की जिम्मेदारी का ठीक से वहन नहीं हो पा रहा है, इसलिए इस योजना को आकार दिया जा रहा है। अभी 700 स्टेशनों को चिन्हित किया गया है, जिसे अगले महिने तक अधिकारी गोद ले लेंगे। अभी ज्यादा दिन नहीं हुआ प्रधानमंत्री के आवाहन पर रेलवे ने 2 अक्तूबर गांधी जयंती के अवसर पर स्वच्छता अभियान चलाया था, तत्कालीन रेल मंत्री सदानन्द गौड़ा ने खुद झाडू उठाया था, लेकिन रेलवे के अन्दर यह उत्साह ठंडा होते देर नहीं लगा।

               यूं तो जैसे बदहाल इंसान को किसी भी बहाने थोड़ा बहुत भी हासिल हो जाए तो उसे उस समय तो कुछ राहत महसूस होती है। देश हमारा गांवों का देश कहलाता है, मगर उन गांवों में विकास तथा सुविधाओं का जो आलम है, वह किससे छिपा है, सिवाय उन गांवों को छोड़ कर जहां पर कुछ नेतागणों की विशेष कृपादृष्टि रही है। कोई कह सकता है कि अगर इसी बहाने कुछ गांवों में थोड़ा बहुत विकास हो जाए तो क्या बुरा है। वैसे भी सांसद विकास निधि का जो ब्यौरा पेश होता है उसमें अक्सर यही देखा जाता है कि अधिकतर सांसद वह राशि खर्च नहीं कर पाते हैं, जो उन्हें अपने संसदीय क्षेत्र के विकास के लिए दी जाती है।

               बहरहाल, गांवों या रेलवे स्टेशनों को गोद लेने जैसी आइडिया की वाहवाही में फिलहाल कोई यह नहीं पूछ रहा है कि जिन जिम्मेदारियों को निभाने के लिए उपर से नीचे तक तंत्र का निर्माण हुआ है, गांवों के सर्वांगीण विकास के लिए - जिसमें लोगों की समुचित भागीदारी हो - पंचायती राज की योजना पर भी बीस साल से अमल हा रहा है, रेलवे के विकास के लिए रेलमंत्री के नीचे रेलबोर्ड तथा नीचे लाखों अधिकारियों-कर्मचारियों का जखीरा तैनात है, इसके बावजूद यह काम क्यों नहीं हो रहे है ? यदि विकास का ढिंढोरा न पीट कर सही मायने में विकास सुनिश्चित करने का मापदण्ड तय किया जाता और उसके केन्द्र में लोगों के जीवनस्तर को सुधारना होता तो लोगों की हर बदहाली का कारण पूछा जाता, न्यूनतम बुनियादी नागरिक हक बहाल नहीं करने के लिए कुछ सज़ा भी तय होती। कहने का तात्पर्य राज्य और उसके तंत्र की बदहाली के आलम ने स्थिति को इस मुकाम तक पहुंचाया है।
यह समझने की जरूरत है कि यह जो अभिभावक वाला माडल प्रमोट किया जा रहा है, वह राज्य की लोगों के प्रति जिम्मेदारी या आम लोगों द्वारा राज्य पर दबाव डाल कर कुछ हासिल करने की पूरी लोकतांत्रिक परम्परा को खारिज कर देता है। एक तरह से राज्य की आम जनजीवन से वापसी का रास्ता सुगम कर देता है। अब आप को कुछ चीजें जो मयस्सर होंगी, वह अपने अधिकार के तौर पर नहीं बल्कि खैरात के तौर पर, किसी अफसर या नेता की भलमनसाहत या कर्तव्यनिष्ठा के तौर पर मिलेंगी, उसी में खुश रहिएगा।

             कोईभी देख सकता है कि राज्य के कल्याणकारी माडल के स्थान पर जो नवउदारवादी चिन्तन हावी हो रहा है, जिसकी बुनियाद ही राज्य के कल्याणकारी भूमिका से हटने या उस रोल को कम करने पर टिकी है, उसी का यह प्रतिबिम्बन है। और यह हम चतुर्दिक देख सकते हैं। पहले अगर शिक्षा, स्वास्थ्य या सार्वजनिक कल्याण के कामों में राज्य की दखलंदाजी अनिवार्य थी, आज उसे बाजारशक्तियों के हाथों सौंपा जा रहा है। पहले शिक्षा के गिरते स्तर को लेकर आप लोकतांत्रिक ढंग से विरोध कर सकते थे, आज स्वीकार्य हो चले इस नए माॅडल के तहत आप को यही कहा जाएगा कि उसे बेहतर दाम देकर खरीद लो।

             इधर बीच चर्चित हो चले स्वच्छ भारत अभियान में भी इसकी झलक देखी जा सकती है, जिसमें जोर राज्य की अपनी कर्तव्यपूर्ति पर प्रश्न उठाना नहीं है बल्कि ऐसे काम जो राज्य को अपने एजेंसियों के जरिए करने चाहिए उसे आम लोगों पर सौंप देने पर है। यह एक तरह से राज्य के हटने की विचारधारा को भी अधिक स्वीकार्य बनाता है।

              हम एक और उदाहरण से बात को समझ सकते हैं। सुलभ इण्टरनेशनल ने कुछ सौ या कुछ हजार विधवाओं को - जो पारिवारिक एवं सामाजिक कारणों से वृन्दावन में गरीबी एवं बदहाली का जीवन जीने के लिए अभिशप्त हैं - उन्हें गोद लिया है। पिछली होली पर उन्होंने बड़ी संख्या में इन विधवाओं को उनके पश्चिम बंगाल स्थित उनके गृहनगर की यात्रा भी करायी। मीडिया ने भी इस काम को खूब सराहा। लेकिन पूछा तो यह जाना चाहिए कि क्या ये विधवायें यहां की नागरिक नहीं हैं। यदि ये उपेक्षित और निराश्रित हैं तो सरकार ने उनकी व्यवस्था क्यों नहीं किया ? इनके लिए रोजगार की व्यवस्था करना, इनका मानवीय हक बहाल करना आखिर किसकी जिम्मेदारी बनती है ? और समग्रता में बात करें तो ये विधवायें बेसहारा क्यों बनीं ? क्यों यह महिलाएं इस स्थिति में नहीं पहुंच पायी कि अपने पतियों के साथ बराबर की हैसियत हासिल न कर सकीं और पति जीवित होता तो भी और नहीं होता तो भी स्वयंसिद्धा नहीं बन पायीं। क्या इसके लिए समाज की अपनी असमानतामूलक परम्परायें जिम्मेदार नहीं हैं, उनको एजेण्डा पर लाने का, उन्हें आमूलचूल बदलने का काम कौन करेगा ?
 

? अंजलि सिन्हा