संस्करण: 01 दिसम्बर- 2014

शरिया अनुकूल फंड: माजरा क्या है ?
 

? सुभाष गाताड़े

               बर आयी है कि स्टेट बैंक आफ इंडिया अगले माह शरियत के हिसाब से संचालित म्युच्युअल फंड की शुरूआत कर रहा है। ब्रिटेन के बाद मुस्लिमबहुल देशों में ऐसी सुविधा शुरू करनेवाला भारत दूसरा मुल्क बना है। अभी जून माह में ही ब्रिटेन ने स्वयंभू इस्लामिक बाण्ड जारी किए हैं।

               मालूम हो कि स्टेट बैंक को इस उद्यम के लिए रिजर्व बैंक की तरफ से तथा सरकार की तरफ से हरी झंडी मिल चुकी है। प्रस्तुत योजना की व्यावहारिकता को लेकर विगत सरकार के दिनों में ही सरगर्मी शुरू हुई थी, जब अल्पसंख्यक मामलों के तत्कालीन मंत्री जनाब रहमान खान के सुझाव पर सरकार ने स्टेट बैंक आफ इंडिया को इसके अध्ययन का आदेश दिया था। अभी पिछले साल ही बाॅम्बे स्टाक एक्स्चेंज ने भारत का पहला शरिया सूचकांक -एस एण्ड पी बीएसई 500शरिया - शुरू किया था। बीएसई का शरिया सूचकांक पिछले एक माह में सेन्सेक्स से दस फीसदी बेहतर रहा है।

               आखिर क्या है शरिया अनुकूल फंड ?

                इंडियन एक्स्प्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक /26 नवम्बर 2014/ शरियत सूद लेना और देना हराम समझा गया है। ..शरिया अनुकूल फंड अन्य फंड की तरह होते हैं, मगर वे उन्हीं कम्पनियों या इन्स्टुमेंट में निवेश किए जाते हैं जो शरिया अनुकूल हों। मिसाल के तौर पर शराब, जुआंघर और गैरहलाल खाने के पदार्थ और सूद पर आधारित पारम्पारिक वित्तीय संस्थाओं में उनका निवेश नहीं किया जाता।.. शरिया फंड में बढोत्तरी और गैरबढोत्तरी का विकल्प होता है। अगर कोई निवेशक सूद या लाभांश/डिवीडंड नहीं चाहता है तो वह बढोत्तरी का विकल्प चुन सकता है और परिसम्पत्तियों के दाम में बढोत्तरी से लाभान्वित हो सकता है।

                यूं तो कुछ अन्य बड़े उद्यमियों की तरफ से भी एक व्यापक पूंजी मार्केट के दोहन के लिए इस किस्म के बाण्ड शुरू किए गए हैं -उदाहरण के तौर पर -बेंचमार्क, टाटा और टौरस द्वारा शरिया अनुकूल योजना लागू की गयी है - मगर सरकारी स्तर पर इस दिशा में कदम बढ़ाने में केरल में सत्तासीन पिछली वामपंथी सरकार ने पहल ली थी,जब उसने एक हजार करोड़ रूपए की लागत से शरिया सिद्धान्तों के आधार पर अल बराक फाइनानिशयल सर्विसेसके नाम से एक नानबैंकिंग फाइनान्शियल कम्पनी की नींव डाली जिसमें केरल राज्य इंडस्टियल डेवलपमेण्ट कार्पोरेशन ने 11 फीसदी निवेश किया और बाकी राशि केरल के आप्रवासी भारतीयों के निवेश से पूरी की। धर्मविशेष को निशाना बना कर बनी इस पहल को अदालत में चुनौती दी गयी, जिसमें कहा गया कि यह योजना देश के सेक्युलर संविधान के खिलाफ है। इस मसले पर दिए अपने अन्तरिम फैसले में उच्च न्यायालय ने इस पर रोक लगायी, मगर बाद में इस स्थगनादेश को हटा कर उसे अपनी मंजूरी प्रदान की।

               आखिर अन्य बैंकों से इस्लामिक बैंक किस मामले में अलग समझे जाते हैं ? दरअसल इस्लामिक बैंक अलग अलग वित्तीय उत्पाद आफर करते हैं जैसे सुकूक बाण्ड या इक्विटी फंड, जहां सूद नहीं लिया जाता क्योंकि इस्लाम में सूदखोरी पर प्रतिबन्ध है। निवेश पर आधारित परिसम्पत्तियों के परफार्मंस के आधार पर ही उनका निपटारा किया जाता है, जिसमें मुनाफा और घाटा, दोनों साझा किया जाता है। ऐसी आर्थिक गतिविधि जो पाप समझी जाती है, जैसे सटटेबाजी या अल्कोहोल तथा अन्य नशीली चीजों में, इसमें इस पैसे का निवेश नहीं किया जाता है।जैसे कि उम्मीद की जा सकती है कि आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड तथा मुस्लिम हितों के लिए सक्रिय संगठनों, नेताओं ने इस घोषणा का स्वागत किया है।

              यूं तो शरिया अनुकूल फण्ड के लिए रिजर्व बैंक ने अनुमति दी है, मगर गनीमत समझी जाएगी कि अभी भी उसने विशुद्ध इस्लामिक बैंकिंग के लिए रजामंदी नहीं दी है। उसके द्वारा तैयार एक रिपोर्ट के मुताबिक एक ऐसी प्रणाली जिसमें सूद को लिया-दिया नहीं जाता है, वह अस्तित्वमान कानूनों से मेल नहीं खाती है। रिजर्व बैंक का मानना है कि भारत में बैंकों के संचालन के लिए बैंकों को कर्ज लेने पड़ते हैं, जिस पर उन्हें सूद देना पड़ता है। इसके अलावा बैंकों को रिजर्व बैंक के पास कैश रिजर्व रेशो के तहत नगदी जमा करनी पड़ती है, जिस पर उन्हें सूद मिलता है। इसैी वजह से बैंक ने सरकार को सलाह दी है कि अगर इस्लामिक बैंकिंग को अनुमति देनी हो तो उसे इसी के अनुरूप विधेयक लाना पड़ेगा।

               अगर दुनिया के पैमाने पर देखें तो इस्लामिक बैंकिंग के नाम पर संचालित परिसम्पत्तियों का आंकड़ा - जिसका दोहन एचएसबीसी और स्टेण्डर्ड चार्टर्ड बैंक जैसे अन्तरराष्टीय बैंक करते हैं - 1.8 टिलियन डाॅलर/ जो राशि 112 लाख करोड़ तक आती है/ तक पहुंचा दिखता है।

                दिलचस्प है कि जब ब्रिटिशों के आगमन के बाद -जब भारत में आधुनिक बैंक प्रणाली की नींव पड़ी - भारतीय उपमहाद्वीप का उलेमा समुदाय भी इसी नज़रिये का था कि बैंक से दिया जानेवाला सूद और कुराण में वर्णित रिबा अर्थात बड़े महाजनों द्वारा वसूले जानेवाला भारी भरकम सूद में कोई सम्बन्ध नहीं है। उस वक्त के बड़े आलिमों ने इस मामले में फतवे भी जारी किए थे। अलीगढ मुस्लिम विश्वविद्यालय के संस्थापक सर सैयद अहमद हों या इस्लाम के अन्य विद्वतजन इसी बात के हिमायती थे। आप इसे इस्लाम के अन्दर हावी होती रूढिवादी धारा का परिणाम कह सकते हैं कि विगत दो -तीन दशकों से ही फिजां बदल रही है।

              हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अधिकतर मुस्लिमबहुल देशों में भी भले ही इस प्रणाली को प्रतीकात्मक तौर पर शुरू किया गया हो, मगर उनकी बैंक प्रणाली की मुख्यधारा बैंकिंग के आम नियमों से ही संचालित होती है। यहां तक कि अपने पेटोडाॅलर के बलबूते अपने यहां के अधिक कटटर वहाबी इस्लाम को दुनिया भर में फैलाने में तत्पर सउदी अरब के बैंक भी सूद की लेन देने से ही संचालित होते हैं। सउदी बैंक एक तरह से अपने इस काम को वैधता देने के लिए सूद के बजाय मुनाफा और घाटे में सांझापन की बात करते हैं। पड़ोसी मुल्क पाकिस्तान का उदाहरण काबिलेगौर है, जहां इस सम्बन्ध में वहां के सर्वोच्च न्यायालय ने ही 90 के दशक में अपना फैसला सुना दिया। पाकिस्तानी विश्लेषक मोहम्मद फारूक ने मेनस्टीम नामक अंग्रेजी पत्रिका में /10 मार्च 2012/ में अपने आलेख इस्लामिक बैंकिग - एन एनेथेमा टू पाकिस्तानी डेमोक्रेसी में इसपर रौशनी डाली थी। उनके मुताबिक सर्वोच्च न्यायालय के इस निर्णय के पहले ऐसा नहीं था कि जिया उल हक के संक्षिप्त दौर को छोड़ दें तो पाकिस्तानी बैंक प्रणाली मुख्यधारा के अनुकूल नहीं थी। पाकिस्तान के निर्माण के बाद ही उसके संस्थापक जिना ने खुली बैंकिंग प्रणाली की हिमायत की थी.. उनकी अन्तिम इच्छा थी कि पाकिस्तान में सेन्टल बैंक आफ पाकिस्तान की तरह कोई नियामक हो और उनका अन्तिम सार्वजनिक कार्यक्रम था स्टेट बैंक आफ पाकिस्तान का उदघाटन।
ध्यान रहे कि पाकिस्तान में जब अस्सी के दशक में जब इस्लामीकरण की बढ़ती प्रक्रिया में सूद आधारित बैंक प्रणाली को शरिया आधारित बैंक प्रणाली से पुनस्र्थापित करने की बात चली तब आया सुप्रीम कोर्ट का फैसला एक नज़ीर बना। न्यायमूर्ति वजिहुददीन अहमद ने सूद आधारित आधुनिक बैंक प्रणाली की हिमायत करते हुए स्पष्ट कहा कि अगर शरिया आधारित बैंकों को बढ़ावा दिया गया तो देश की अर्थव्यवस्था के पास अपने कर्जे चुकाने के लिए पैसे नहीं होंगे। /पीएलडी 2000, सुप्रीम कोर्ट 780-1, मेनस्टीम के लेख में उदधत,/ जैसा कि सभी जानते हैं कि विदेशी सरकारों एवं अन्तरराष्टीय संस्थाओं के प्रति पाकिस्तान की देनदारी कई बिलियन डालरों की है। इस देनदारी के ऐवज में सरकार को समय समय पर भुगतान करना पड़ता है। चूंकि राष्टीय अर्थव्यवस्था की स्थिति ऐसी नहीं है कि सरकार खुद अपने संसाधनों से इसे चुकता करे, इसके अलावा भी सरकार को समय समय पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कर्जे की जरूरत पड़ती है।..अगर इस पुनर्भुगतान में गड़बड़ी हुई तो पाकिस्तान को अन्तरराष्ट्रीय बाजार में दिवालिया घोषित किया जाएगा।

                प्रश्न उठता है कि एक ऐसी योजना, जिस पर सरकार की भी मुहर लगी हो, एक राज्य की उच्च अदालत उसे संविधान के दायरे में ठहरा चुकी हो, समुदायविशेष के एक हिस्से के आग्रह पर इसे शुरू किया गया हो,, की पड़ताल की आवश्यकता है या नहीं। निश्चित ही है, जिसकी कई वजहें हैं: एक भले ही यहां अभी इस्लामिक बैंकिग की शुरूआत नहीं हुई, शरिया अनुकूल फंड शुरू हो रहा है, मगर यह शुरूआती कदम इसके लिए जमीन तैयार कर सकता है। और यह समझने की जरूरत है कि एक ऐसे मुल्क में जहां गैरमुस्लिमों का बहुमत है, जहां मुसलमानों की माली हालत एक समुदाय के तौर पर बहुत खराब है, जो अपने से किसी बैंकिंग प्रणाली को मजबूत आधार नहीं दे सकते, वहां ऐसी कोई भी योजना पहले से अलगाव में पड़े अल्पसंख्यक समुदाय के अलगाव को और बढ़ावा देगी।

               दूसरे, चूंकि इस्लामिक बैंक में निवेश से आम बैंकों की तरह सूद नहीं मिलता है, मुनाफा और घाटा दोनों साझा करने की बात होती है,लिहाजा इसका असर यही होगा कि मुस्लिम आबादी का एक हिस्सा जो अन्य बैंकों के बजाय ऐसे में निवेश करेगा तो उसे अपनी मेहनत की कमाई में वाजिब बढ़ोत्तरी का लाभ भी नहीं मिलेगा।

                तीसरे, ऐसी कोई योजना जो किसी खास सम्प्रदाय की आस्थासम्बन्धी मान्यताओं की बुनियाद पर शुरू की जा रही हो, वह धर्मनिरपेक्षता के बुनियादी मूल्यों के प्रति एक समझौता होगी, जो दूरगामी तौर पर अधिक समस्याओं को जनम देगा।


? सुभाष गाताड़े